सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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हल्दी, दाहहल्दी, भागी, कुष्ठ, चित्रक इनको पीसकर मेढ़े के मूत्र में लेह की भांति पकाये। (३) पाठा, वंशलोचन, अतीस पिण्ड-हरिद्रा इनको पीसकर इनसे हाथी के मूत्र में लेह बनाये। (४) मण्डूकि (ब्राह्मी या जलशुक्ति), आक, गिलोय, कलिहारी इनको मैस के मूत्र में विधि पूर्वक बनाये। इन चार लेहों को चाटनेवाले व्यक्ति में गुल्म, अरुचि, श्वास, कण्ठरोग, हृदय-रोग नहीं होते।
वक्तव्य—लेह की परीक्षा—लेहपाक लक्षणं तन्तु यावद्गुडादि जायते तावत् पचेद्।
वि० मन्तव्य—हमारे विचार में यहाँ “लाङ्गलाख्यम्” लाङ्गल नाम से कलिहारी-नहीं समझना चाहिये। क्योंकि कलिहारी विष है, अपितु तुणराज अर्थात् ताड़ अथवा नारियल समझना चाहिये। भले ही इल्लनार्चार्य ने भी “लाङ्गलीकलि-कारिका” लिखा है ॥११॥
सात्म्यान् स्वदेशरचितान् विविधांश्च भक्ष्यान् पानानि मूलफलषाडवरागयोगान्। अद्याह्रसांश्च विविधान् विविधैः प्रकारैः सुंक्षीत चापि लघुरूक्षमनःसुखानि ॥१२॥
जिस देश में जैसे भक्ष्य बनाये जाते हैं, उन भक्ष्यों को, अपने देश के नानाप्रकार के भक्ष्यों को, मन के अनुकूल भक्ष्यों को, मूल, फल, पाडव, राग (रायता) के साथ खावे। पान पेशों को पीये। नानाप्रकार के मांसरसों को नानाप्रकार से खाये। लघु, रूक्ष, मन के अनुकूल भक्ष्यों को खाये।
वक्तव्य—पाडवरसालादि—“सितारूचकसिन्धूरयैः सवृक्षा-रूपरूपकैः जम्बूफलरसैर्युक्तो रागो राजकिया कृतः ॥ मधुराम्ल-कंदूनां तु संस्कारा पाडवा मताः ॥ राग-द्राक्षाकवाथ. शालिस-कृत्पन्नो मध्वांशाळ्याः सत्रिजातस्सधान्यः। गौलोपेतः शर्करा-पांसुमिश्रो रागो ज्ञेयः पाडवो दाडिमांरुः ॥ रागपाडव—कवथितं तु गुडोपेतं सहकारफलं नवम। तैलनागरसंयुक्तो विज्ञेयो रागपाडवः ॥ पाडव से कोई यमानी पाडव लेते हैं।
वि० मन्तव्य—राग एवं खाडव या पाडव—विविध प्रकार के खटमिटे एवं चटपटे—चटनी, अचार मुरम्बा आदि पदार्थ ॥१२॥
आस्थापनं विविधदन्न विरेचनं च कुर्यान्मृदूनि शिरसश्च विरेचनानि।
इस अरोचक में विधिपूर्वक निरूह देवे। मृदुविरेचन, शिरोविरेचन (मृदु) देवे।
त्रिषयूषणानि रजनीत्रिफलायुतानि चूर्णाकृतानि यवशुक्रविमिश्रितानि ॥१३॥
क्षौद्रायुतानि वितरेन्मुखबोधनार्थ-मन्यानि तित्तकदुकानि च भेषजानि।
त्रिकटु, हल्दी, त्रिफला, इनका चूर्ण करके, यवश्वार मिठाकर मधु के साथ मुख में रखोत्वत्ति के लिये अवलेह रूप में चटाये।
वि० मन्तव्य—मुखबोधनार्थ—रसनेन्द्रिय को जगाने के लिये। जिससे रस का भलीभांति ग्रहण हो—अनुभव हो ॥१३॥
मुस्तादिराजतरुवर्गदशाङ्गसिद्धैः क्वाथैर्जयेन्मधुगुतेर्विविधैश्च लेहैः ॥१४॥
मूत्रासवैर्गुडकृतैश्च तथा स्वरिष्टैः क्षारासवैश्च मधुमाधवतुल्यगन्धैः।
मुस्तादिगण, आरगवधादिगण, दशमूल इनके क्वाथ में तित्तक-दुग्धों से बनाये लेह मधु के साथ खाये। मूत्र से बनाये आसव, गुड से बनाये अरिष्ट, पलाशश्वार पानी के साथ बनाये क्षारासव, मधु (मद्यमेद), माधव (मधुकृतमद्य) इनके समान गन्धवाले मद्य पीये ॥१४॥
स्यादेष एव कफवातहते विधिश्च शान्तिं गते हुतसुजि प्रशमायतस्य ॥१५॥
कफ वात के कारण अग्निमान्य होने पर उनकी शान्ति के लिये यह विधि बरते ॥१५॥
इच्छाभिधातभयशोकहतेऽन्तरगतौ भावान् भवाय वितरेत् खलु शाक्यरूपात्।
अर्थेषु चाप्यपचितेषु पुनर्भवाय पौराणिकैः श्रुतिशतैरनुमानयेत्तम् ॥१६॥
दैन्यं गते मनसि बोधनमत्र शस्तं यद्यत् प्रियं तदुपसेव्यमरोचके तु ॥१७॥
वांछित वस्तु की अप्राप्ति से, भय से, शोक से अन्तरगिन-जठराग्नि के नष्ट हो जाने पर प्राप्य पदार्थों को रुचि उत्पन्न करने के लिये रोगी को देवे। अप्राप्त विषयों के फिर से प्राप्त होने के लिये पुरातन सैकड़ों कथायें (राम, नल, युधिष्ठिर-आदि की) सुनाकर उसे समझाये। मन में दीनता (न्युर्बस-थेनिया) हो जाने पर-आश्वासन देना उत्तम है। अरोचक में जो जो प्रिय हो, वह-वह सेवन करना चाहिये ॥१६,१७॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रेऽरोचक-प्रतिषेधो नाम (एकोनविंशोऽध्यायः, आदितः) सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥१७॥
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अथातः मूत्राघातप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥११॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे मूत्राघातप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे-जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।