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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 838

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५८ ]

वि० मन्तव्य—मूत्राघातों में मूत्र को बढ़ानेवाले शुद्ध करनेवाले, प्रवृत्त करनेवाले आहार, विहार तथा औषध का प्रयोग किया जाता है। श्लो० २७ में कहे उपचारों के साथ २ वस्ति प्रदेश तथा समस्त उदर पर शीतल अथवा उष्ण जल का सेवन, राई एवं सौंफ आदि का लेप एवं शीतल जल में अवगाह आदि का प्रयोग भी किया जाय ॥१,२॥

वातकुण्डलिकाऽधोला वातवस्तिस्तथैव च।

मूत्रातीतः सजठरो मूत्रोत्सङ्गः क्षयरस्तथा ॥३॥

मूत्रग्रन्थिर्मूत्रशुक्रमुण्णवातस्तथैव च।

मूत्रौकसादौ द्वौ चापि रोगा द्वादश कीर्तिताः ॥४॥

वातकुण्डलिका, अधोला, वतवस्ति, मूत्रातीत, मूत्रजठर, मूत्रोत्संग, मूत्रक्षय, मूत्रग्रन्थि, मूत्रशुक्रमुण्णवात, मूत्रौकसाद (द्वौ) इस प्रकार से बारह प्रकार के मूत्राघात कहे हैं।

वक्तव्य—चरक में वाताधोला माना है। अधोला का अर्थ प्रोस्टेट ग्रन्थि से है। अधोला के लिये पत्थर या लोहारों की नेह का जो अर्थ किया है, वह इसकी कठोरता का द्योतक है। यह ग्रन्थि भी बढ़कर कठोर होती है। प्रोस्टेट ग्रन्थि से उत्पन्न मूत्राघात में प्रायः यह होता है कि रोगी का मन जब इधर मूत्र प्रवाहण में लगा रहता है, तभी मूत्र रुकता है, मन अन्यत्र लगा हो तो मूत्र आता रहता है। सम्भवतः इसीलिये इसे वाताधोला नाम दिया हो। चरक में वस्तिकुण्डल नामक एक अन्य मूत्राघात माना है, इसको मानकर तेरह मूत्राघात माने हैं। यह रोग असाध्य है, यथा—दुताख्वलंघनायासादभिघातात्प्रपीडनात्। स्वस्थानाद् वस्तिरुद्वृत्तः स्थूलस्तिष्ठति गर्भवत् ॥ शूलस्थानदवाहानां विन्दुं विन्दुं क्षवत्यपि। पीडितस्तु क्षजेद्वधारां संस्तम्भोद्वेधनात्तिमान् ॥ वस्तिकुण्डलमाहुस्तं घोरं शस्त्रविशेषमम्। पवनप्रबलं प्रायो दुर्निवारम्बुद्धिमिः ॥ चरक सि० अ० ६। ४४-४६ ॥३,४॥

रौदयाद्वैगविघाताद्वा वायुरन्तरमाश्रितः।

मूत्रं चरति संगृह्य विगुणः कुण्डलीकृतः ॥५॥

सृजेदल्पमथवा सरुजस्कं शनैः शनैः।

वातकुण्डलिकां तं तु न्याधि विद्यात् सुदारुणम् ॥६॥

वातकुण्डलिका-लक्षता से या मलमूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने के कारण वस्ति में आश्रित वायु मूत्र को साथ में लेकर (रोककर), वर्चुलाकार बनकर, विरुद्ध गति होकर गति करती है। इससे मूत्र थोड़ा थोड़ा वेदना के साथ, धीरे-धीरे प्रवृत्त होता है। इस अवस्था को वातकुण्डलिका कहते हैं, यह अतिदारुण है।

गतिसंगाद् उदावृत्तः समूत्रस्थानमार्गयोः। मूत्रस्य विगुणो वायुः भग्नव्याविद्धकुण्डली ॥ मूत्रं विहन्ति संस्तम्भमङ्गुरोववे-

धनैः। तीव्ररक्त मूत्रवित्संगैः वातकुण्डलिकेति सा ॥ चरक सि० अ० ६ ॥५,६॥

शकुन्मार्गस्य वस्तेश्च वायुरन्तरमाश्रितः।

अधोलावद्धनं ग्रन्थि करोत्यचलमुत्रतम् ॥७॥

विष्णुमूत्रानिलसङ्गश्च तत्राध्मानं च जायते।

वेदना च परा वस्तौ वाताधोलेति तां विदुः ॥८॥

गुद और मूत्राशय के मध्य में स्थित अपान वायु अधोला के समान कठोर ग्रन्थि को उत्पन्न करती है। यह ग्रन्थि स्थिर, ऊँची उठी होती है। इसके कारण मल-मूत्र वायु का अवरोध होता है, मूत्राशय में आध्मान होता है। वस्ति में तीव्र वेदना होती है, इसे वाताधोला कहते हैं ॥७,८॥

वेगं विधारयेद्यस्तु मूत्रस्याकुशलो नरः।

निरुणद्धि मुखं तस्य वस्तेर्वस्तिगतोऽनिलः ॥९॥

मूत्रसङ्गो भवेत्तेन वस्तिकुक्षिनिपीडितः।

वातवस्तिः स विज्ञेयो न्याधिः कृच्छ्रप्रसाधनः ॥१०॥

जो मूत्र व्यक्ति मूत्र के उपस्थित वेग को रोकता है, उसमें वस्तिगत अपान वस्ति के मुख को बन्द कर देता है, इससे मूत्र की रूकावट हो जाती है, वस्ति (मूत्राशय) और कुक्षि में वेदना होती है। इस रोग को वातवस्ति जानना, यह कष्टसाध्य है ॥९,१०॥

वेगं सन्धार्य मूत्रस्य यो भूयः सङ्गुमिच्छति।

तस्य नाभ्येति यदि वा कथञ्चिस्संप्रवर्तते ॥११॥

प्रवाह्यतो मन्दरुजमल्पमरूपं पुनः पुनः।

मूत्रातीतं तु तं विद्यान्मूत्रवेगविघातजम् ॥१२॥

मूत्र के प्रवृत्तोनमुख वेग को रोककर जब फिर से मनुष्य प्रवृत्त करना चाहता है तब उसका मूत्र प्रवाहित नहीं होता, यदि किसी प्रकार होता भी है, तो मूत्र धीरे-धीरे, थोड़ा थोड़ा, बार बार (रुक-रुक कर) आता है। इसको मूत्रातीत कहते हैं, यह रोग मूत्र वेग के रोकने से उत्पन्न होता है ॥११,१२॥

मन्त्रस्य विहते वेगे तदुदावर्ततेहुतुना।

अपानः कुपितो वायुरुदरं पूरयेद् भुगम् ॥१३॥

नाभेरधस्ताद्वाध्मानं जनयेत्तीव्रवेदनम्।

तं मूत्रजठरं विद्यादधःक्षोतोनिरोधनम् ॥१४॥

उदावर्त के कारण मूत्र के वेग के रुक जाने से कुपित हुआ अपान वायु उदर में अतिशय रूप से भर जाता है। इससे नामि के नीचे तीव्र वेदना युक्त आध्मान होता है। इसको मूत्र जठर कहते हैं, इससे मूत्र और मलवाही क्षोत बन्द हो जाते हैं। (यह उदावर्त प्रायः वातजन्य होता है) ॥१३,१४॥

वस्तौ वाऽप्यथवा नाले मणी वा यस्य देहिनः।

मूत्रं प्रवृत्तं सज्जेत सरक्तं वा प्रवाह्यतः ॥१५॥

क्षवेच्छनेरल्पमरूपं सरुजं वाऽथ नौरुजम्।

विगुणानिलजो न्याधिः स मूत्रोत्सङ्गसंज्ञितः ॥१६॥

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