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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ५८ ]

उत्तरतन्त्रम्

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मूत्रप्रवाहण करते करते मूत्र बस्ति में या मूत्रनालमें अथवा मेहन की मणि (अग्रभाग) में सहसा बन्द हो जाये (रुक जाये) या प्रवाहण करते समय रक्त के साथ, धीरे, थोड़ा-थोड़ा, वेदना के साथ अथवा वेदना के बिना प्रवाहित हो, वह मूत्रोत्सृज्य रोग है। यह रोग विमार्गगामि वायु (अपानवायु) के कारण उत्पन्न होता है। (इससे मेहन में भारीपन होता है) ॥१६॥

रुक्षस्य कलान्तदेहस्य बस्तिस्थौ पित्तमारुतौ। सदाहवेदनं कृच्छ्रं कुर्यात् मूत्रसंक्षयम् ॥१७॥

रुक्ष एवं कलान्त शरीरवाले पुरुष के बस्ति में स्थित पित्त और वायु कष्टदायक दाह, वेदना उत्पन्न करते हैं, इसको मूत्रसंक्षय कहते हैं।

वि० मन्तव्य—इसमें—मूत्र का निर्माण ही नहीं होता अथवा बहुत थोड़ा होता है, वातात् मूत्रे शुष्यति संक्षयः च० सि० अ० ६ अर्थात् वायु के कारण मूत्र सूखने पर मूत्रक्षय नामक रोग हो जाता है ॥१७॥

अभ्यन्तरे बस्तिमुखे वृत्तोत्पन्नः स्थिर एव च। वेदनावानति सदा मूत्रमार्गनिरोधनः ॥१८॥ जायते सहसा यस्य ग्रन्थिरशमरिलक्षणः।

स मूत्रग्रन्थिरित्येवमुच्यते वेदनादिभिः ॥१९॥

बस्तिद्वार के अन्दर, गोल, छोटी, स्थिर सदा वेदना युक्त, मूत्रमार्ग को रोकनेवाली, अशमरी के लक्षणों से युक्त, ग्रन्थि जिस पुरुष में सहसा उत्पन्न हो जाती है, इसे मूत्रग्रन्थि कहते हैं, वेदना आदि से अशमरी के लक्षण होते हैं।

वक्तव्य—अशमरी और मूत्रग्रन्थि में भेद—अशमरी में रक्त का सम्बन्ध होता है। “रक्तं वातकफादृष्टं बस्तिद्वारे सुदारुणम्। ग्रन्थि कुर्यात् स कृच्छ्रेण सृजेन्मूत्रं तदावृतम् ॥ अशमरीसमशूलं तं मूत्रग्रन्थि प्रवक्षते ॥”

चरक सि० अ० ६।४० ॥१८,१९॥

प्रत्युपस्थितमूत्रस्तु मैथुनं योऽभिनन्दति। तस्य मूत्रयुतं रेतः सहसा संप्रवर्तते ॥२०॥ पुरस्ताद्वाऽपि मूत्रस्य पश्चाद्वाऽपि कदाचन। भस्मोदकप्रतीकांश्च मूत्रशुक्तं तदुच्यते ॥२१॥

मूत्र वेग के उपस्थित होने पर जो पुरुष मैथुन करता है, उसमें वीर्य के साथ मूत्र सहसा प्रवृत्त होता है। यह वीर्य कभी मूत्र के पहले या कभी मूत्र के पीछे प्रवृत्त होता है। इसमें मूत्र का रंग राख मिश्रित पानी के समान होता है, इसको मूत्रशुक्त कहते हैं ॥२०,२१॥

व्यायामाध्वतापैः पित्तं बस्ति प्राप्यानिलावृतम्। बस्ति मेढं गुदं चैव प्रदहनं ह्रावयेदधः ॥२२॥ मूत्रं हारिद्रमथवा सरक्तं रक्तमेव वा। कृच्छ्रात् प्रवर्तते जन्तोरुष्णवातं वदन्ति तम् ॥२३॥

व्यायाम, सुखाफरी, धूप आदि से वायु द्वारा आवृत पित्त बस्ति में पहुँच कर बस्ति, मेहन गुद को जलाता हुआ मूत्र को नीचे की ओर प्रवृत्त करता है। इसमें मूत्र का रंग हल्दी के समान या रक्त मिश्रित या केवल रक्त ही आता कठिनाई से प्रवृत्त होता है, इसको उष्णवात कहते हैं ॥२२,२३॥

विश्वदं पीतकं मूत्रं सदाहं बहलं तथा। शुष्कं भवति यच्चापि रोचनाचूर्णसन्निभम् ॥२४॥ मूत्रौकसादं तं विद्याद्वोगं पित्तकृतं बुधः। पिच्छिलं संहतं श्वेतं तथा कृच्छ्रप्रवर्तनम् ॥२५॥ शुष्कं भवति यच्चापि शङ्खचूर्णप्रपाण्डुरम्। मूत्रौकसादं तं विद्यादामयं द्वादशं कफात् ॥२६॥

जब मूत्र—विशद (पिच्छिल विपरीत), पीत वर्ण, दाह-युक्त, घट्ट होता है। इसका रंग सूखने पर गोरोचना के चूर्ण के समान होता है। इस रोग को मूत्रौकसाद कहते हैं, इस रोग को बुद्धिमान् पित्तजन्य कहते हैं। जब मूत्र पिच्छिल, घट्ट, श्वेत, क्लेश से प्रवृत्त होता है, तथा सूखने पर शंख के चूर्ण के समान श्वेत वर्ण होता है, इसको मूत्रौकसाद कहते हैं, यह कफ के कारण से होता है, ये बारह मूत्राधात कह दिये हैं ॥

कषायकलकसर्पीषि भक्ष्यान् लेहान् पर्याप्ति च। क्षारमद्या (धवा) सवस्वेदान् बस्तीश्रोत्रसंज्ञितान् २७ विदध्यान्मतिमास्तत्र विधिं चारमरिनाशनम्। सामान्यचिकित्सा—कषाय, कलक, घृत, भक्ष्य, लेह, दूष, क्षार, मद्य, आसव, स्वेद, उत्तरवस्ति और अशमरि नाशक विधि बुद्धिमान् इनमें बरते ॥२७॥

मूत्रोदावर्तयोगांश्च कास्तन्यं नात्र प्रयोजयेद् ॥२८॥ मूत्रजन्य उदावर्त के योग (सौवर्चलाख्यां मदिरा इत्यादि) भी मूत्राधातों में बरते ॥२८॥

कलकमेवार्कबीजानामक्षमात्रं ससैनधवम्। धान्याम्लयुक्तं पीतैव मूत्रकृच्छ्रात् प्रमुच्यते ॥२९॥ ककड़ी, खीरे आदि के बीजों का कलक एक कर्ष, सैनधव के साथ मिलाकर कांजी के साथ पीने पर मूत्रकृच्छ्र से मुक्त हो जाता है ॥२९॥

सुरां सौवर्चलवती मूत्रकृच्छ्रीं पिबेन्नरः। मधु मांसोपदंशं वा पिबेद्वाऽप्यथ गौडिकम् ॥३०॥ मूत्रकृच्छ्र युक्त रोगी सौवर्चल युक्त सुरा को पीये। मांस भक्षण करके मधु मद्य या गुड़ का बना मद्य पीये ॥३०॥ पिवेत् कुड्डुमकर्षं वा मधुदकसमायुतम्। रात्रिपर्युषितं प्रातस्तथा सुखमवानुयात् ॥३१॥ केसर को एक कर्ष मात्रा में मधु के शर्बत से पीये। इस शर्बत को रात में बनाकर रख दे, और प्रातः पीये ॥३१॥