सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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दाडिमाम्खां युता सुख्यामेखाजीरकनागरेः । पीत्वा सुरां सख्वणां स॒च्रकृर्छात् प्रमुच्यते ॥३२॥
अनार का रस (या अनारदाना), इलायची, जीरा, साठ,
थोड़ा सा नमक, पिष्टिसे बनी सुरा में सिलाकर पीने पर मूत्नङच्छ से रोगी सक्त हो जाता है ॥३२॥
परथक्पण्यौदिवगंस्य सूलं गोज्धरकस्य च । अधंप्रस्थेन तोयस्य पचेत. क्षीर चतुग णम् ॥३३॥ छषीरावशिषटं तच्छीतं सिताक्ष ्रयुतं पिवेत. ।
नरो मारुतपित्तोस्थमव्राघातनिवारणम् ॥३४॥
विदारीगन्धादिवगं, गोखरू का मू, इसके आधे प्रस्थ से,
दूध से चार राणे पानी मेँ दृध का पाककरे। दुध मात्र शेष
रहने पर, इसे शीतर करके इसमे शकरा ओर सधु मिलाकर
पीये । इससे वात पित्तजन्य मू्राधःत न्ट होते हँ ॥३३,३४;;
तिष्पीडय वाससा सम्यग्वर्चो रासभवाजिनोः। रसस्य कुडवं तस्य पिवन्मृत्ररजापदम् ॥३५॥
गघे ओर धोडेकी टीद को कपड़ेमें से भटी प्रकार
निचोड़कर दस रख का एक कुडव पीये | यह मूत्र वेदना को नष्ट करता है ।२५॥ मुस्ताऽभयादेवदासुमवाणां सधुकस्य च पिवेदक्षसमं कल्कं स्रदोषनिवारणम् ॥३६॥
मस्ता, हरड़, देव द्।ख, मवा, मुख्दटी इनका कल्क, एक
अक्षमात्रा मे पीये । यह मूत्र दोष को नष्ट करता ३ ॥१६॥
अभयामङ्कृाक्षाणां कल्क बदरसंमितम् । अस्भसाऽख्वणोपेलं पिवन्मूत्रुजापहम् ॥३७॥
हरड़, आंवला, वहेडा, प्रत्येक आधा क्षं ठेकर-इस्मे थोड़ा
सा नमक मिलाकर जले पीये । मूत्र वेदनाको नष्ट करता ६ ॥ उबुम्बरसम कस्क द्राक्चाया जर्सयुतम् ।
पिवेत् पयु षितं रात्रौ शीतं मृन्ररुजापहम् ३८ द्राक्षा का कल्क एक कषं केकर जल मे भिगोकर रातभर पडा रहने देवे । प्रातःकाठ इसको शीतर पीये-मूत्रवेदना को
नष्ट करता है ॥३८॥
निदिग्धिकायाः स्वरसं पिवेत. कुडवसं मितम् । मून्रदोषहरं कल्कमथवा क्षौद्रसंय॒तम् ॥३९॥ कटेरी का स्वरस चार पल सात्रा मे प्रातः पीये । यह मूच दोष नाशक दे ॥३६॥ क प्रपीडथामल्कानं तु रसं ुडवसंमितम्। . पीतवाऽगदी भवेजन्तुमू ्रदोषरुजातुरः ॥४०॥
अथवा आख को निचोडकर उनका स्वरस एक एक
- । मूत्र दोष - ~ - - जन्य वेदना ५ स्वस्थ होता हे ॥४०॥
कुडव ( चारपल ) मात्रा मे मधु के साथ पीये । इसके पनि से ना से पीड़ित मनुष्य
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सुश्रतसं हितो | अ० ५८
आंबे के फलके स्वरससेही छोटी इलायची का चूणं
मनुष्य पीये | पिष्ाऽथवा सुश्जीतेन शाछितण्डर्वारिणा ॥४१॥
तारस्य तरुण मृड चपुसस्य रसं तथा ।
श्वेतं ककंटकं चेव प्रातस्तु पयसा पिबत् ॥४२।॥
ताड के नूतनमृलकोयाखीरेके रस को शाली चावलें के शीतक जल से पीकर पीये अथवा खीरेको दूधके साय
प्रातःकाल पीये ((४१,४२॥
श्तं वा मधुरे: क्षीरं सपिरभिश्रं पिबेन्नरः । म॒त्रदोषिञुद्धयथ तथेवारमरिनाञनम् ॥४३॥
काकोल्यादि मधुर गणसेसिद्ध किया दूधघी मिलाकर
मठष्य पीये | इसे मूत्र दोष एवं अश्मरी नष्ट होते ३ ।।४३॥ वञाधदष्रा्रश्चास्थिकोकिलाक्षकतण्डुलान् | रतपवेकमृलं च देवदारु सचित्रकम् ॥४४॥ अक्षबीजं च सुरमा कल्कीकृत्य पिबेन्नरः । मूत्रदोषविुद्धयथे तथेवाईमरिना्चनम् ॥४५॥ बढा, गोखरः कोच की अस्थि, ताल्मखाना, चावल, शतपवक मूल (जर गण्डीर दुब) देवदारु, चित्रक, बहेडे की मजा इनको सुरा के साथ पीसकर (सुरा से) मनुष्य पीये । इससे मूत दोषां का शोधन होता दै, ओर अश्मरी न होती है (४४,४।
पाट्लक्षारमाहस्य सप्तकृत्वः परिखुतम् । पिबन्मन्रविकार्नं संसष्ट' तेखमात्रया ॥४६॥
पाटला केक्षार को जल मे घोलकर नितारे, इस प्रकार सात बार करे । इसमे थोड़ा सा तैक सिलाकर पीये, यह मूत्र विक्रार को नष्ट करता है । ( क्षार ओर जल का प्रमाण क्षार कल्प विधि से जानना । इसमें क्षार को चौगुने जलम घोलकरं
छानना चाहिये ) ॥४६॥ ` | <
` नखाडमभेददभंङत्रपुसेबौरुषोजकान्
क्षीरे परिश्तान् तत्र पिबेत् सर्षिःसमायुतान् ॥४७॥
नडसर, पाषाणभेद, दभं, ईैल, खीरा, ककड, एवं त्रिजयसार इनको दघ मं पकाकर घी मिलाकर पीये ।
वक्तव्य- बद्ध काश्यपीयसंहिता के वचन से खीरा "ककड के बीज ठेने चाहिये । यह ठीक मी दै, विजयखार ( अखन )
मूत्र नहीं है । यहाँ पर मूत्रङ वस्तुओं का ग्रहण है ॥४७॥
पाटस्या यावशकाच्च पारिभद्राश्िखादपि ।
क्षारोदकेन मतिमान् स्वगेडोषणचुणेकम् ॥४८॥
पिबेद्गुडेन मिश्रं वा टिष्याल्लेहान् प्रथक् प्रथक् ।
पाटला, यवश्चार, पारिभद्र (करहदः या बकायन)) ति न
क क्षारोदक से दाख्चीनी, इलायची पिप्यली इनका चूण पीव ।
अथवा पाटला आदि प्रतयेकके प्रथक् २ क्षारोदक म दाठचीन
= आदि का चूण मिलाकर गुड के साथ ठे बनाकर खाये ।४८।
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॥
1 क ककक्क्ककक कद्ककका