सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६० ]
वि० मन्तव्य—गुरु, बुद्ध, सिद्ध तथा ऋषि भी यदि योगी हैं तो वे अन्यमानव के शरीर में आवेश कर जाते हैं, क्योंकि यह अणिमा आदि तथा आवेश आदि आठ गुण-योगियों का ईश्वरीय बल है और शुद्ध सत्त्व (मनस्) के समाधान (समाधि) से यह सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥२०॥
न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति
न वा मनुष्यान् क्वचिदाविशन्ति ।
ये स्वाविशन्तीति वदन्ति मोहा-
त्वे भूतविद्याविषयादपोद्याः ॥२१॥
ये देवगण मनुष्यों के साथ कभी एकत्रित नहीं होते और न मनुष्य शरीरों में कभी प्रविष्ट होते हैं । जो वैद्य अज्ञान के कारण इनका शरीर में प्रविष्ट होना कहते हैं, उन वैद्यों को भूतविद्या के विषय से अनभिज्ञ जानना चाहिये ॥२१॥
तेषां महाणां परिचारका ये
कोटीसहस्रायुतपद्मासंख्याः ।
असुरवसामांसमुजः सुभौमा
निशाविहाराश्च तमाविशन्ति ॥२२॥
इन देवता गणों के जो करोड़ों, हजारों, लाखों, पद्म असंख्य नौकर हैं, जो नौकर रक्त, वसा, मांस का भोजन करते हैं, देखने में बहुत भयानक, रात में विहार करनेवाले हैं वे पुरुषों में प्रविष्ट होते हैं ।
“निवृत्तामिषमद्यो ये हितार्थी प्रयतः शुचिः ।
निजागन्तुमिन्द्रमादैः सत्त्ववान् न स युज्यते ॥” चरक ॥२२॥
निशाचराणां तेषां हि ये देवगणमाश्रिताः ।
ते तु तत्सत्त्वसंसर्गद्विज्योस्तु तदुज्ञनाः ॥२३॥
उन राक्षसों के अनुचर (नौकर) जिस देवगण के आश्रित हैं, (नौकर होते हैं), वे नौकर, उस देवता आदि के सत्त्व के संयोग से उसी देवता के लक्षणोंवाले जानने चाहिये ।
वक्तव्य—गवर्नर का जो नौकर है, उस नौकर को भी गवर्नर के प्रतिनिधि रूप में मानकर व्यवहार किया जाता है ॥
देवग्रहा इति पुनः प्रोच्यन्तेऽशुचयश्च ते
देववच्च नमस्यन्ते प्रत्यर्थ्यन्ते च देववत् ॥२४॥
इनमें जो नौकर पवित्र होते हैं, वे देवग्रह कहे जाते हैं । इनको देवता के समान नमस्कार किया जाता है और देवता के समान इनसे याचना की जाती है ॥४२॥
स्वामिशौलक्रियाचाराः क्रम एव सुरादिषु ।
निश्चंतेर्या दुहितरस्तासां स प्रसवः स्मृतः ॥२५॥
ये नौकर स्वामी के स्वभाव, क्रिया के समान आचरण-वाले होते हैं, यह नियम देवग्रह आदि में है । क्योंकि ये नौकर निश्चंति (राक्षसों का पितामह) की स्त्रियों की संतान हैं, इस-लिये प्रसूति के गुणोंवाले हैं ॥२५॥
सत्यत्वाद्पवृत्तेषु वृत्तिस्तेषां गणैः कृता ।
शान्त्रोक्त सत्यव्यवहार के छोड़ देने से ही इनकी गणों से अनुचर वृत्ति बना दी जाती है ।
हिंसाविहारा ये केचिहवभावमुपाश्रिताः ॥२६॥
भूतानोति कृता संज्ञा तेषां संज्ञाप्रवक्तृभिः ।
जो देवता भाव में आश्रित होकर हिंसा की इच्छा करते हैं, उनकी ‘भूत’ यह संज्ञा, संज्ञा बनानेवालों ने की है । (जो ग्रह देवता रूप होकर भी हिंसा की रुचि करते हैं, उनको भूत कहते हैं) ॥२६॥
ग्रहसंज्ञानि भूतानि यस्माद्धेत्यनया भिषक् ॥२७॥
विद्याया भूतविद्यात्वमत एव निरुच्यते ।
क्योंकि वैद्य इस विद्या से ग्रह संज्ञक भूतों को जानता है, इसलिये इस विद्या को भूत विद्या कहते हैं ॥२७॥
तेषां शान्त्यर्थमन्विच्छन् वैद्यस्तु सुसमाहितः ॥२८॥
जपैः सनियमैर्होमैरांभेत चिकित्सितुम् ।
इन ग्रहों की शान्ति की इच्छा करनेवाला वैद्य अति सावधानी से जप, नियम, होम के द्वारा चिकित्सा करनी आरम्भ करे ।
‘शान्तिकर्मणिहोमांश्च जपस्वस्ययनानि च ।
वेदोक्तान् नियमांश्चापि प्रायश्चित्तानि चाचरेद् ॥
भूतानामधिपं देवमीश्वरं जगतः प्रभुम् ।
पूजयन् प्रयतो नित्यं जयत्युन्मादजं भयम् ॥” चरक ।
रक्तानि गन्धमाल्यानि बीजानि मधुसपिषां ॥२९॥
भदयाश्च सर्वं सर्वेषां सामान्यो विधिरुच्यते ।
लालवर्ण के गन्ध, माला (केशर, लाल कनेर, गुडहल का फूल आदि) सरसों, तिल, जो आदि बीज, मधु, घी सब प्रकार के भक्ष्य (लड्डू आदि), यह सब के लिये सामान्य विधि है ॥
वष्णानि गन्धमाल्यानि मांसानि रुधिराणि च ॥३०॥
यानि येषां यथेष्टानि तानि तैश्चः प्रदापयेत् ।
हिंसन्ति मनुजान् येषु प्रायशो दिवसेषु तु ॥३१॥
दिनेषु तेषु देयानि तद्भूतविनिवृत्तये ।
वस्त्र, सुगन्ध, माला, मांस, रक्त और जो जो जिस जिस ग्रह को इष्ट हो, वह उनके लिये देवे । जिन दिनों में मनुष्यों को प्रायः करके ये पीड़ित करते हैं, उन दिनों में, उस भूत की निवृत्ति के लिये उपर्युक्त वस्तुयें वस्त्र, सुगन्ध माला आदि देवे ।
देवग्रहे देवगृहे हृत्वाऽग्निं प्रा (दा) पयेद्वलिम् ॥३२॥
कुशस्वस्तिकपूपाज्यच्छत्रपायससंभूतम् ।
देवग्रह में मन्दिर के अन्दर अग्नि में होम करके बलि देवे । इसके लिये कुशा, स्वस्तिक (X), अपूप, घी, छत्र, खीर, इनसे बलि देवे ॥३२॥