सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशीघ्र शान्त हो जाता है ॥३८,२६९॥
| खीर आदि से नानाप्रकार की बलि देवे ॥३६॥।
क्षण ६० | अघुराय यथाकारं बिदभ्याचत्वरादिषु ।२३॥
अपुर मरह के व्यि सन्ध्याकाल मे चौराहे पर वहि देवे ॥
गन्धवेंस्य गवां मध्ये मयमांसाम्बुजाङ्गरम् ।
गन्धर्वं ग्रह के ल्थि गोओंके ब्रीचमें मद्र मांस पानी
जीर जांगल मांस की बलि देवे ।
हये वेश्मनि यक्षस्य ल्माषाखकूसुरादिभिः ॥३४॥
अतिञुक्तकङ्कन्दान्जेः पुष्पेश्च वितरेद्रसिम् ।
यक्षग्रह के ल्यि मनके अनुकूक सुन्दर घर मं-कुल्माष
(अस्विन्न जौ), उड़द, रक्त, सुरा आदि मदय, अतिमुक्तक
(माधवी कता); कुन्द, कमल इनके पएूरछो से बलि देवे ॥२४॥।
न्यां पिवप्रहाये्ठं कुगास्तरणमूषितम् ॥२५॥
पितृप्रह के ल्यि नदी के किनारे कुशा विशछाकर उसमें
तिल, गुड, जो की वि देवे ॥३५॥ तत्नेवोपहरेच्चापि नागाय वित्रिधं बसिम्।
नाग (सप) के व्यि नदी के किनारे पर ही गुड़, मधु,
चतुष्पथे राक्षसस्य भीमेषु गहनेषु वा ॥३६॥
शून्यागारे पिशाचस्य तीव्रं बखिमुपाहरेत् ।
राक्चस के ल्यि चौराहे पर या गहन-भयानक वनां में
मस, रक्त, सुरा आदि की बलि देवे । पिशाच के व्यि खारी
धर मँ--तीव्र बलि (कचा मांस, पशु बलि) को देवे ॥३६॥
पूवंमाचरितेभेन्त्रमूः तविद्यानिद नितेः ॥२७॥
न शक्या बङिभिजंतं योगेस्तान् समुपाचरेत् ।
भूतविद्या मँ के हृए- मंब के प्रथम प्रयोग करने से
तथा बङि देने से जो ग्रह शान्त नदीं हो सके, उनको शन्त
करने के ल्यि- योगों को बरते ॥३७॥। अजक्षेचमरोमाणि अस्यकोदूकयोस्तथ ॥२८॥
दिङक मूत्रं च वस्तस्य धूमनस्यं प्रयोजयेत् ।
एतेन शाम्यति क्षिप्रं बङ्बानपि यो अहः ॥२९॥
बकरा, रीछ, सेद, उल्क्--्नकी खा, रोम, दग बकरे
क मून, इनका धुवा रोगी को देषे । इससे बलवान् भह मी
गजाहपिप्पटीम्रव्योषामल्कसषेपान्। `
गोधानङ्कऊमाजगैर छष्यपित्तप्रपेषिताच् ॥४०॥
नस्याभ्यञ्लनसेकेषु विदभ्यायोगतरववित् । ६
गजपिप्पली, पिप्पलीमूछ, तरिकट, वलाः सरसो इन्
गोह, नेवा, विल्छी, रौ इनके पिततो से पीकर, इसे
नस्य, अभ्यंग, परिक आदि मँ योगतत्त्व कौ जाननेवाला
ू भ्रते ४०|| । । =
खरारवतरोलूककरभश्वश्गाठजम् ॥४५॥
पुरीषं गृधकाकानो बरादस्य च पेषधेत् ।
छत्तरतन्त्रम्
` ब्तमूमेण तत्पद्धं डं स्यात पूेवद्धितम्॥४२। दूर्वा, रषतवूष, सूतरेश)
७९१ गघा, घोड़ा, खचर, उल्द्, ऊंट, कुत्ता, गीदड़, गीध,
कोओआ, सूअर इनकी पुरीष (मल) इनको पीखकर (इनके कल्क
से) वक्रे के सूत्रम तेल सिद्ध करे । ( इखका प्रयोग नस्य,
अभ्यंग तथा से चन) ॥४१,४२॥
शिरीषबीजं ख्शनं ण्ठां सिद्धाथेकं वचाम्
मञ्जिष्ठ रजनीं कृष्णां बस्तमूत्रेण पेषयेत् ॥४३॥। वत्यंर्छायाविशष्कास्ताः सपित्ता नयनाञजनम्।
शिरीष के बीज, लहसुन, सोढ, सरसो, वच, मजीठ,
हल्दी, पिप्पली इनको बकरे के मूत्र से पीखकर गाय का पित्त
मिलाकर-वर्ियां बनाक्रर छायाम सुखा के। ये बत्तियां
धिषकर आंखों म अंजन् करे ।४३॥
नक्तमारषटं उ्योषं मृं श्योनाक बिल्वयोः ॥४४॥
हरिद्रे च कृता वर्यः पूबेवन्नयनाञ्नम् ।
करंज का फल, सोढ, मरिच, पिप्पली, श्योनाक ओर
बिल्व का मूढ, हल्दी, दाखदल्दी से बनाई व्या; (पूवं की
भाति से बनाई बकरे के मूत्र म पीसकर, छाया में सुखाकर;
पित्त के साथ) अंजन करे ॥४४॥
सेन्धवं कटुकां हिक वयःस्थां च व चामपि।
बस्तमनत्रेण संपिष्टं मसस्यपित्तन पूवेवत ॥४५॥ ये ये बरहा न सिध्यन्ति सर्वषां नयनार्जनम् ।
सैन्धव, कुटकी, हींग, गिलोय (या आंवला) बच, इनको
बकरे के मूत्र से पीसकर, छाया मे सुलाकर बनाई बि महली
के पित्त के साथ अंजन करे। जो जो प्रह शान्त नदीं होते;
उनमें आंखों म इसका अंजन करे ॥४५॥
पुराणसर्पिखशनं दिग सिद्धाथेकं वसा ॥४६॥
गोरोमौ चाजखोमी च भूतकेशो जटा तथा ।
कुरा सरपगन्धा च तथा काणविकाणिके ॥५०॥
वजनपरोक्ता वयःस्था च ङ्गी मोहन क्षिका ।
अेमृखं त्रिकटुकं ता खोतोजमजनम् ॥४०।
सैपारी हरितारुं च रश्षोष्ना ये च कोतिताः।
सिह्याघ्क्षेपाजौ रद्र पिवाजिगवां तथा ॥४९॥
श्वाविच्छल्यकगोधानासुष्स्य नङ्गखस्य च ।
विटखभोमवसामञ्ररक्तपित्तनखादयः ॥५०॥ . = अस्मिन् वग भिषक कयोत्तङानि च घृतानि च ।
पानाभ्यज्ञननस्थेषु तानि योऽ्यानि जानता ॥५९॥
अवपीडेऽञ्लने चैव विद्भ्याद्गुटिकोकृतम् ।
विदधीत परषेके क्वथितं, चूणितं तथा ॥५२॥
'उदुभूज्ने, श्छर्णपिष्टं देहे चाव चारयत् ।
एष स्वविकारास्तु मानसानपराजितः ॥ 9 द. र भ २ र + चँ
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