सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 848, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें७६२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६१ ]
काकोली, खीर काकोली, वज्रकन्द, गिलोय, काकड़ाशुद्धी, मोहनवल्लीका (बट पत्रिका), आक का मूल, त्रिकुट, प्रियङ्गु, क्षोतोजन, मैनशिल, हरताल, श्वेत सरसों, (अथवा गुग्गुल आदि जो रक्षोन्न द्रव्य हैं, इनको तथा सिंह, व्याघ्र, रीछ, बिल्ली, चीता, घोड़ा, गाय, सेह, श्वावित् (बड़ी सेह), गोह, ऊंट, नेवला इनकी विष्ठा, त्वचा, रोम, वसा, मूत्र, रक्त, पित्त नख आदि लेकर इनसे वैद्य तैल और घृत अलग-अलग सिद्ध करे। इन तैल या घृतों को जाननेवाला वैद्य पान, अश्वंग नस्य आदि में बरते। इनसे गोलियाँ बनाकर अवपीडन नस्य, अंजन करे। इनका क्वाथ परिषेक-स्तन बरते, इनका चूर्ण शरीर पर छिड़के, इनको बारीक पीसकर शरीर पर लेर करे। वह मनोजन्य सब रोगों का अपराजित रहता है। योड़े ही समय में सब मानसिक रोगों को नष्ट करता है, स्नेहन, धूपन आदि उपचार भी करे।
“विशेषतः पुराणं च घृतं तं पाययेद् भिषक्। उग्रगन्धं पुराणं स्याद् दशवर्षस्थितं घृतम् ॥ लाक्षारुचिभिं शीतं तद्धि सर्वग्रहापहम्। मेध्यं विरेचनेष्वग्र्यं प्रपुराणमतः परम् ॥ नासाधयं नाम तस्यास्ति यत्स्याद् वर्षशतस्थितम्। दृष्टं स्पृष्टमथाभ्रातं तद्धि सर्वं ग्रहापहम् ॥”
चरक चि० अ० ६ ॥४६-५३॥
न चाचौक्षं प्रयुञ्जीत प्रयोगं देवताग्रहे ॥४४॥
देवता आदि पवित्र ग्रहों में अपवित्र प्रयोग नहीं करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—च अ चौक्षं—अपवित्र—उक्त पुरीष एवं रोम आदि अपवित्र द्रव्यों के धूप, अञ्जन, परिषेचन एवं लेप आदि प्रयोग न हो ॥५४॥
ऋते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूलं न चाचरेत्।
वैद्यातुरौ निहन्तुस्ते ध्रुवं कुट्टा महौजसा ॥५५॥
पिशाच ग्रह को छोड़कर अन्यत्र प्रतिकूल कार्य न करे, क्योंकि महान् शक्तिवाले ये ग्रह कुट्ट होकर वैद्य और रोगी दोनों को निश्चित मार देते हैं।
देवर्षिपितुराग्ध्ववेः उन्मत्तस्य तु बुद्धिमान्।
बर्जयेदक्षनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकमं च ॥
सर्पिष्यानादि तत्स्येह मुदु भेषज्यमाचरेत्।
पूर्णा बलि उपहारंश्च मंत्राञ्जनविधीस्तथा ॥
चरक । चि० अ० ६ ॥
वि० मन्तव्य—मूतोन्माद में—ताड़न, त्रासन एवं तर्जन आदि का भी विधान है, परन्तु वह केवल पिशाच ग्रह से पीड़ित में ही करना चाहिये। अन्यान्य देव, यक्ष एवं पितृग्रह आदि में नहीं करना चाहिये ॥५५॥
हिताहितीये यद्योक्तं नित्यमेव समाचरेत्।
ततः प्राप्स्यति सिद्धिं च यज्ञश्च विपुलं भिषक् ॥५६॥
हिताहितीय अध्याय में जो आहार कहा है, उसे सदा बरते।
इस प्रकार करने से ग्रह से मुक्ति, रोगों को मिलती है, और वैद्य को यज्ञ मिलता है ॥५६॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते भूतविद्यातन्त्रेऽमानुषोपसर्गप्रतिषेधो नाम (प्रथमोऽध्यायः, आदितः) पश्चिमोऽध्यायः ॥६०॥
एकषष्ठितमोऽध्यायः
अथातोऽपस्मारप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यस्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अत्र इसके आगे अपस्मारप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
स्मृति (याददास्त स्मरण) मूतार्थ (अनुभव किया विषय), इनके ज्ञान का नष्ट होना या भूल जाना, अपस्मार कहा है, यह अपस्मार रोग विनाशकारक है।
वक्तव्य—“अपस्मारं पुनः स्मृतिबुद्धिसत्त्वसंख्ण्वाद्भीमत्सचेष्टमावस्थिकं तमःप्रवेशमावक्षते ॥” चरक।
स्मृतेरपगमं प्रादुरपस्मारं भिषग्विदः ॥”
चरक चि० अ० १०, ३ ॥१॥
स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपश्च परिवर्जने।
अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽयं व्याधिरन्तकृत् ॥३॥
मिथ्यातियोगेन्द्रियार्थकर्मणामभिसेवनात्।
विरुद्धमलिनाहारविहारकुपितैर्मैलैः ॥४॥
वेगनिग्रहशोठानामहिताशुचिभोजिनाम्।
रजस्तमोभिभूतानां गच्छुतां च रजस्वलाम् ॥५॥
तथा कामभयोद्गक्रोधशोकादिभिर्भुञ्जम्।
चेतस्यभिहते पुंसामपस्मारोऽभिजायते ॥६॥
इन्द्रियों के विषय और कर्मों के मिथ्या योग, अथवा अतियोग के सेवन से, विरुद्ध एवं मलिन आहार, विहार से कुपित हुए दोनों से, उपस्थित मल मूत्रादि के वेगों को रोकने के स्वभाववाले, अहित, अपवित्र भोजन करनेवालों में, रज एवं तम से आक्रान्त मनवालों में रजस्वला के साथ सम्भोग करने से, तथा कामशोक-भय-उद्वेग, क्रोध आदि से मन पर बहुत आघात होने पर पुरुषों में अपस्मार उत्पन्न होता है।
“त एवंविधानां प्राणभूतां क्षिप्रमभिनिवर्त्तन्ते, तद्यथा—रजस्तमोभ्यामुपहतचेतसामुद्भ्रान्तविषयबहुदोषाणां समलविकृतोपहितानि अशुचीनि अभ्यवहारजातानि वैषम्ययुक्तोपयुञ्जानानां