सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६२ ]
दोषों का संचय आदि क्रम से रोगोत्पत्ति करने के कारण, अपस्मार दोषजन्य है। वातादि दोषों के क्षणिक होने के कारण अपस्मार दोषजन्य है। जब तक दोष का वेग रहता है, तब तक रोग रहता है। आगम (चरक में) अपस्मार को दोषजन्य कहा है। विश्वरूप होने से वात, पित्त, कफ एवं रज और तम ये दोष विश्वरूप हैं, इसलिये अपस्मार दोषजन्य है। इसलिये विद्वान् अपस्मार को दोषजन्य मानते हैं। जिस प्रकार बादल के बरसने पर भी कुछ बीज शरद् काल में उगते हैं, इसी प्रकार रोग भी अपने समय पर उत्पन्न होते हैं। अवश्य अस्थायी वातादि दोष इसी थोड़े से समय के लिये बढ़कर नानाप्रकार के रोगों को अपने स्वाभाविक दूषण स्वभाव के कारण दिखाते हैं। इसलिये अपस्मार नामक महारोग दोषजन्य ही है।
वक्तव्य—“इह खलु चत्वारोऽपस्मारा भवन्ति, वात-पित्त-कफ-सन्निपातनिमित्ताः ॥” (२) पक्षाद्वा द्वादशाद्वाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः। अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिद्वात्परम् ॥ (३) अधिशेते यथा भूमि बीजं काले च रोहति। अधिशेते तथा धातुं दोषः काले च कुप्यति”॥
वि० मन्तव्य—कुछ आचार्य श्लो० १७ के अनुसार अपस्मार को आगन्तु मानते हैं जैसे विषम ज्वरों को, परन्तु कुछ आचार्य इसको “दोषज” मानते हैं, अस्तु। इस विवाद का समाधान भगवान् पुनर्वसु ने इस प्रकार किया है कि—
यदा दोषनिमित्तस्य भवति आगन्तुः अन्यवः।
तदा साधारणं कर्म प्रवदन्ति भिषग्वराः। च० नि० अ० ८
अर्थात्—जब किसी दोषज व्याधि में आगन्तु कारण भी होता है तब विद्वान् चिकित्सक साधारण अर्थात् दोनों के लिये उपयोगी कर्म-उपचार करते हैं। जैसे विषम ज्वरों में तथा उन्मादों में। भगवान् धन्वन्तरि ने उक्त दोनों मतों का उल्लेख कर दिया है ‘दोषज एव तु’ पाठ अपस्मार को दोषज मानने वालों का है, क्योंकि—अग्रिम श्लो० २३ में ‘उपयोगो ग्रहोक्तानां योगानां तु विशेषतः’ पाठ में ग्रह शामक योगों के उपयोग का निर्देश किया गया है। और श्लो० २६ में रुद्र एवं रुद्र के गणों की पूजा का निर्देश किया है, अतः भगवान् धन्वन्तरि जी दोनों मतों को मानते हैं ॥२१॥
तस्य कार्यों विधिः सर्वो य उन्मादेषु बह्यते।
पुराणसर्पिषः पानमभ्यङ्गश्चैव पूजितः ॥२२॥
उपयोगो ग्रहोक्तानां योगानां तु विशेषतः।
ततः सिध्यन्ति ते सर्वे योगैरन्यैश्च साध्येत्।
शिमृकटवृक्षकिण्वाहिनिम्बत्वप्रससाधितम् ॥२३॥
चतुर्गुणे गवां मूत्रं तैलमभ्यञ्जने हितम्।
अपस्मार में उन्माद में कहीं जानेवाली सम्पूर्ण विधि बरतनी चाहिये। पुरातन घृत का पान कराये और पुरातन घृत का अभ्यंग करे। ग्रहों में कहे योगों को विशेष रूप में बरते। इनसे सब अपस्मार अच्छे होते हैं, अन्ययोगों से भी चिकित्सा करे। यथा—शोभांजन, श्योनाक, किण्ही (कटमी), नीम को छाल, इनके स्वरस (रस में) और कल्क से तैल से चार गुणे गोमूत्र में तैल सिद्ध करे। यह तैल अभ्यंग में उत्तम है।
“कटमी निम्बकटवृक्षमधुधिगुत्वचां रसे।
सिद्धं मूत्रसमं तैलमभ्यङ्गार्थं प्रशस्यते ॥” चरक ॥२२,२३॥
गोधानकुलनागानां पृषतक्षगवामपि ॥२४॥
पित्तेषु सिद्धं तैलं च पानाभ्यङ्गेषु पूजितम्।
गोह, नेवला, हाथी, चित्रलमृग, रीछ, गाय, इनके पित्त से सिद्ध किया तैल पान और अभ्यंग में प्रशस्त है ॥२४॥
तीक्ष्णैरुभयतोभग्नैः शिरश्छापि विशोधयेत् ॥२५॥
तीक्ष्ण वमन, तीक्ष्ण विरेचन और तीक्ष्ण शिरो-विरेचन से चिकित्सा करे ॥२५॥
पूजां रुद्रस्य कुर्वीत तद्गणानां च नित्यशः।
रुद्र की ओर उनके गणों की नित्यप्रति पूजा करे।
वातिकं बस्तिभिश्चापि पैत्तिकं तु विरेचनैः ॥२६॥
कफजं वमनैर्धार्मानपस्मारमुपाचरेत्।
वातिक अपस्मार की बस्तियों से, पैत्तिक की विरेचनों से, कफज अपस्मार की वमनों से बुद्धिमान् चिकित्सा करे ॥२६॥
कुल्लथयवकोलानि शणबीजं पलङ्कषाम् ॥२७॥
जटिलां पञ्चमूल्यौ द्वे पथ्यां चोक्ताश्च यत्नतः।
बस्तमूत्रयुतं सर्पिः पचेत्तद्व्रातिके हितम् ॥२८॥
कुल्लथी, जौ, बेर, सन के बीज, गुग्गुलु, जटामासी, दश-मूल, हरड इनको सावधानी से क्वाथ करके, इस में बकरे का मूत्र मिलाकर घृत सिद्ध करे, यह घृत वातिक अपस्मार में हितकारी है ॥२७,२८॥
काकोल्यादिप्रतीवापं सिद्धं च प्रथमे गणे।
पयोमधुसितायुक्तं घृतं तत् पैत्तिके हितम् ॥२९॥
विदारीगन्धादिगण के क्वाथ में काकोल्यादि गण का प्रक्षेप देकर, घी को सिद्ध करे। इस घी को दूध, मधु शर्करा के साथ खाये। यह घृत पित्तज अपस्मार में हित है।
वक्तव्य—डल्हन ने दूध, मधु, शर्करा के साथ घी सिद्ध करने को कहा है। इसमें मधु के साथ घी सिद्ध करने में मधु जल जायेगा। अथवा रोगप्रभाव से विधेय होगा। यथा—‘क्षीरादिप्रक्षेपयुक्तं घृतं हितम् ॥’ कहा है ॥