सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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करष्णाव चासुस्तकाययुक्तमारग्वधादिके ।
पक्वं च मूच्रवग तु इरेष्मापस्मारिणे हितम् ।३०॥
पिप्पल्यादि, वचादि, मुस्तकादि, इनके क्वाथ मे आरग्वधादिगण का कल्क प्रत्तेप देकर आटो मूर्नोंके साथ सिद्ध
किया घत कफजन्य् अपस्मार में उत्तम हे ॥३०॥।
सुरद्रुमब चाङु्ठसिद्धाथव्योषदहिङ्कभिः। मञिष्ठारजनीयुग्मसमङ्गात्रिषएरम्बदेः ॥३१॥ करञ्जबीजर'रीषगिरिकर्णीहूताशनः ।
सिद्धं सिद्धाथंकं नाम सर्पिमू त्रचतुगु णम् ।३२॥।
कर.भिृष्टगरश्चासबरासविषमञ्वरान् ।
सवभूतग्रहोन्मादानपस्मारांश्च नाशयेत् ॥३३॥
सिद्धार्थक धृत-देव दाङ, वच, कूठ, सरसों सोऽ, मरिच,
पिपरी, हींग, मंजीट, हल्दी, दारुहल्दी, मजीठ, त्रिफला,
मुस्ता, करंज के बीज, शिरीष के वीज, श्वेत स्यन्द (सफेद कोयल), इनके कल्क से चार गुणे मृत्रमे सिद्धक्रिया षी;
सिद्धाथक धृत दै। यह घृत कृमि, कुष्ठ, गर, श्वाख, कफ,
विषमञ्वर, सवर प्रकार की भूत बाधा, अह; उन्माद, अपस्मार,
को नष्ट करता है ॥३१-३३॥।
दशमङेन्द्रवृक्षसवङम बीभार्गीषूडतरिकेः। उम्पाकश्रेयसीसप्रपणापामागेष्टस्गुभिः॥२४॥ श॒तैः कर्केश्च भूनिम्बपूतिकम्योषचित्रके
त्रिबृसाठानिश्चायुग्मसारिवाद्रयपोष्करेः ॥३५ कटकायासदन्द्युग्रानीङिनीङमिशतुभिः।
सर्पिरेभिश्च गोक्षीरद धिमूत्रञक् रसेः ॥२६॥
साधितं पञ्च गन्याख्यं सवापस्मारभूतयुत्।
चातुथकक्षयश्ासानुन्मादां श नियच्छति ॥३५॥
पंचगव्यघत-दशमल, कुटज की छाल, मूवा, भागीं
त्रिफला, अमलतास, गजपिष्यटी, सक्षपण, चिरचिटा, कट गूर
इनके क्वाथ में, चिरायता, करंज, त्रिकटु, चित्रक; निशोथ
पाटा, हल्दी, दारुहल्दी, सारिवा, कष्ण सारिवा; पुष्कर मूख
। रकी, धमासा, दन्ती, वच, नलिनी, विडंग इनके कल्क से.
गायका दुघ, दही) मुन्न, गोबर का स्वरस ओर घी (ये सब
` परस्पर समान भाग केकर) इनसे धृत सिद्ध कृरे | यह पंचगग्य
धृत सब \कार के अपस्मार को, मूतबाधा को नष्ट करता हे ।
। चातुथिक ज्वर, श्चय, श्वास, ओर उन्माद को नष्ट करता दै ॥ |
भार्गीते पचेत् क्षीरे आ्तिण्डल्पायसम्। ~ `
चयं शद्धाय तं भोक्त बराहायोपकल्पयेत् ॥२६॥ ज्ञार्वा च मधुरीभूतं ` तं विश्षस्यान्तसुद्धरेत् ।
जीन् भागस्तस्य चणस्य किण्वभागेन संसजत् ।१९॥
सण्डोदकाथे देयश्च भार्गीक्वाथः सुशीतलः
शद्धे म्भे निदभ्याल्च संभारं तं सुरां ततः ॥४०॥
( ` जातगन्धां जातरसां पाययेदातुरं भिषक् ।
उत्तरतन्त्रभ ७९५
मागींसे षिद्ध क्रियि दुध म शालि .चाव्छों की खीर
बनाये । सुभर को तीन दिन भखा रखकर खीर खने को
देवे | जव्र॒ खीर में मधुरता (विदाहं प्रथम अवस्था पाक) आ
जाय, तवर सुर को मारकर इस अन्न को उसके पेट में (आमाशय से) निकाल ठे | इस अन्न को सुखाकर चूण कर ख्व |
इस चूणके तीन भाग केकर इसमे एक भाग सुरा बीज
(किण्व) मिकाये । सन्धानके ल्यिमार्गी का क्वाथ दण्डा
करके इसमे भिलाये । इस संभार को शुद्ध साफ धड़े मे रख
देवे । फिर जब इस सुरा मे गन्ध ओर रस उन्न हो जाये,
तव रोगी को पिलाये |
वक्तव्य--दुधर पाक विधि- दूध से चोथाई मागं का
कल्क मिटाकर, दुध से चार गुणा जक डाक्कर दूध का पाक्
करे । दूध मात्र शष रहने पर उतार लेव । सूअर को खिलाया
अन्न आमाश्चयसे अगेन जाने पाये उस अन्न मे केवल
आमाशय की ही क्रिया हो, इतने तक मे वह अन्न निकाल
ठेना चाष्टिये। अर्थात् निशस्ता भाग अभी अकरा मेही
परिणत हआ हो । यथा--
अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षडरसस्य प्रपाकतः ।
मधरात्प्राक् कफो भावात्फेनम्ृत उदीयते ।च०।३८-४०।
शद्ध कुम्भ--चावुर्जातक, मधु, पिप्पली आदि से किमि
किये ॥३८-४०॥
सिरां बिध्येदथ प्राप्तं माङ्गल्यानि च धारयेत् ॥४१॥
हनुसन्धिमध्यगत सिरा का वेधन करे । ब्रणितोपासनीय
ध्याय मे कही छत्रा, अतिच्छत्रा आदि मांगल्यं वस्ठ॒ओं को
धारण करे ।
वक्तव्य-चरक मे अतस्त्वाभिनिवेश एक रोग कहादै
यथा- अतत्वाभिनिवेशो यस्तद्धेतवाकेतिभेषजम् ।
- तंत्र नोक्तं तत. श्रोतुमिच्छामि तदिहोच्यताम् ॥
: . शुभूषवे वचः श्रुता शिष्यायाइ पुनवयुः ।
महामदं सौम श्णु सदेत्वाङृतिभेषजम् ॥
` मलिनाहारशीलस्य वगान्प्राप्तान् निण्हतः
शीतोष्णस्निग्धरूक्षायेः देठभिश्ातिसेवितेः ॥
हदयं समुपाभििव्यं सनोबुद्धहताः सिराः
` - दोषाः सन्दृष्य तिष्ठन्ति रजोमोहाइृतास्सनः ॥
` रजस्तमोभ्यां इद्धाभ्यां बुद्धो मनसि चा इते ।
हृदये व्याक्रके दोषरथ मूढाल्पचेतसः ॥
करोति विषमां बुद्धि नित्यानि हिताहिते ।
अतत््वाभिनिषेश तमाइुगत्ता सहागदम् ॥ ष स्तेदसेदोपपन्तं तं संशोध्य बमनादिभिः॥ ~