सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६२ ]
ब्राह्मीस्वरसंयुक्तं यत् पंचगव्यमुदाहृतम् ।
तत्सेव्यं शाखपुष्पी च यच्च मेधं रसायनम् ॥
वि० मन्तव्य—सु० शा० अ० ८ में अपस्मार के विना शार्प हनु की सन्धि में विद्यमान खिरा का वध करने का विधान है, परन्तु खिरा सर्वाङ्ग शोथन होती है, अतः अन्य स्थान में भी खिरावध किया जा सकता है ॥४१॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते भूतविद्यातन्त्रेऽपस्मार-
प्रतिषेधो नाम (द्वितीयोऽध्यायः आदितः)
एकषष्टितमोऽध्यायः १.६१॥
द्विषष्टितमोऽध्यायः
अथातो उन्मादप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे उन्मादप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
मदयन्त्युद्ध(द्वग)ता दोषा यस्मादुन्मार्गमाश्रिताः ।
मानसोऽयमतो व्याधिरुन्माद इति कीर्तितः ॥३॥
उपचित हुए दोष उन्मार्ग में आश्रित होकर क्योंकि मन को चलायमान (विश्रमयुक्त) कर देते हैं, इसलिये यह उन्माद रोग मानस-मनोजन्य कहा है। मनोवहस्तों के दूषित होने से यह मानस रोग होता है। यथा—
विषद्वदुद्युशुचि भोजनानि
प्रधर्षणं देवगुरु द्विजानाम् ।
उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो
मनोऽभिधातो विषमाश्र चेष्टाः ॥
तैरत्यसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा
बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रदूष्य ।
स्रोतांस्यविष्टाय मनोवहानि
प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥
चरक० चि० अ० ६.५ ।
वि० मन्तव्य—उन्मार्ग आश्रितः—पुरुष (चेतना धातु-आत्मा) कर्मेन्द्रियों द्वारा चेष्टा (कर्म) करता है, ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है, मनस् द्वारा मनन-चिन्तन करता है बुद्धि द्वारा बोध-सत् असत् का विवेक करता है और अहंकार द्वारा अहं—मैं हूँ आदि भावना करता है। जिन मायों द्वारा यह सब होता है वे उन्मार्ग कहे जाते हैं। उनमें जब वातादि दोष आश्रित हो जाते हैं तब उक्त सब कार्य अन्ध-वस्थित-विश्रंखल हो जाते हैं और इसी दशा का नाम “उन्माद” है ॥३॥
एकैकशः समतैश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः ।
मानसेन च दुःखेन स पञ्चविध उच्यते ॥४॥
विषाद्ववति षष्ठश्च यथास्वं तत्र भेषजम् ।
स चाप्रवृद्धस्तस्यो मदसंज्ञां बिभर्ति च ॥५॥
उन्माद, बात, पित्त, कफ इन तीन दोषों के पृथग पृथग, अतिशय मिले हुए तीनों दोषों को सन्निपात से एक, मानसिक दुःख के कारण एक, इस प्रकार से उन्माद पांच प्रकार का है। विष के कारण से भी छठे प्रकार का उन्माद होता है, परन्तु इसमें विष की अपनी चिकित्सा की जाती है। यह छठा उन्माद अल्प लक्षणोंवाला, तथा अल्प मात्रा में होने से ‘मद’ नाम से कहा जाता है।
उन्मादं पुनः मनोबुद्धिर्द्वयंज्ञानस्मृतिभक्तिशीलचेष्टाचार-विभ्रमं विद्यात् ॥ चरक ।
वि० मन्तव्य—विष तथा तदगुणयुक्त मद्य से जो उन्माद होता है उसकी प्रारम्भिक अवस्था में बड़ी दशा होती है जो मद्य (भांग-सुरा आदि मादक द्रव्य) के सेवन में होती है जिसको मद या नशा कहते हैं। मद की दशा से आगे चलकर जो मदमत्त की दशा होती है वही उन्माद से उन्मत्त की दशा हो जाती है ॥४,५॥
मोहोद्वेगो स्वप्नः श्रोत्रे गात्राणामपकर्षणम् ।
अत्युत्साहोऽरुचिश्चान्नने स्वप्ने कलुषभोजनम् ॥६॥
वायुन्यूनोन्मथनं चापि श्रमश्चक्रगतस्य वा ।
यस्य स्यादचिरेणैव उन्मादं सोऽधिगच्छति ॥७॥
पूर्वरूप—मोह (मन की विचित्रता), उद्वेग, कानों में शब्द, अंगों में क्रशता, अतिशय, उत्साह, अन्न में अरुचि, स्वप्न में (सुपने में), मलिन भोजन वायु से हृदय का उन्मथन, चक्कर पर चढ़े हुए के समान चक्कर आना, ये लक्षण जिनमें होते हैं, उसे शीघ्र ही उन्माद रोग होगा ॥६,७॥
रुक्षन्च्छ्विः परुषवाग्धमनीततो वा
शीतातुरः कृशतनुः स्फुरिताङ्गसन्धिः ।
आस्फोटयत्यटति गायति नृत्यशीलो
विक्रोशति श्रमति चाप्यनिलप्रकोपात् ॥८॥
वातिक उन्माद में रोगी की कान्ति रुक्ष, वाणी कर्कश, शरीर पर धमनियों का जाल, शीत से पीड़ित, शरीर कृश, अंगों की सन्धियों में स्फुरण, सन्धियों को चटकाता है, वे मतलब घूमता है, गाता है, नाचता है, चिल्लाता है, चक्कर काटता है।
अनियतानां च सततं गिरामुत्सर्गः । फेनागमनमास्यात् ।
स्मितहसितनृत्यगीतवादित्रादिप्रयोगश्रास्थाने । यानमयाने;
कार्यं, पारुष्यम्, उत्पिण्डता, अरुणाक्षता । चरक ॥८॥
तृट्स्वेददाहबहुलो बहुभुग्विनन्दि-
रुक्षायहिमानिलजलान्तविहारसेवी ।
तीक्ष्णो हिम्साबुन्निचयेऽपि स बह्विगङ्घी
पित्ताहिवा नभसि परयति तारकाश्च ॥९॥
पित्तोन्माद में प्यास, स्वेद, दाह की अधिकता, बहुत भोजन करना, नींद न आना, छाया, शीतल, वायु, जल के