सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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१ मत्! ती विरेचन, तीचण
अण ६९ | उतरतन्चरम् ७€७
किनारे पर २ या घूमनेवाला, तीण ( क्रोधी ), शीतल पानी | सरो के तेढ म मिढाकर नानाप्रकार ॐ अवपीडन ( नस्य )
क संचय मे भी अस्मि की शंका रखनेवाला, दिनम भी | देवे। सरो का चृणं रोगी कौ नाखा मे प्रमन करे ।१४,१५।
आकाश में तारका देखता ह ॥६॥ छम्रिसादसद नारुचिकासयुक्तो योषिद्धिविक्तर तिरत्पमतिप्रचारः। निद्रापरोऽल्पकथनोऽल्पयुगुष्णसेवौ रात्रौ भृशं भवति चापि कफप्रकोपात् १०
कफोन्माद मे-- वमन, अभ्चिमान्य, अरुचि, कास, लिया
से एकान्त मे प्रीति करने को चाह; थोड़ी बुद्धि, थोडा चलना,
गिरना, सोने की आदत, थोड़ा बोल्नेवाला, थोड़ा खानेवाला,
उष्य वस्तु की चाह करता ई । कफके प्रकोप से उन्माद् रातं
अधिक बद़ जाता है । (चरक म.धयथुरानने-यह चिह भी दै) ॥
सवौरमके पवन्पित्तकफा यथास्वं
संहर्षिता इव च छिङ्खमुदीरयन्ति ॥१९॥
सन्निपातजन्य उन्माद मे वायु, पित्त, कफ, अतिशय बढ़-
कर् (एक दूसरे से होढ़ टेकर) अपने अपने रक्षणा को उलन
करते द | ( इसी से यह् असाध्य होता हं ) ॥१६॥ चौरन॑रेन्द्रपुरुषैररिमिस्तथाऽन्ये-- विन्नासितस्य धनबान्धवसखक्षयाद्रा ।
गां क्षते मनसि च प्रियया रिरंसो-
जीयेत चोत्कटतरो मनसो विकारः ।१२।
चोरो से, राजपुरूषों से, शच॒ओं से, तथा दूसरे पुरषो से
राये जाने के कारण, धन-बान्धव के नाश हो जाने से, मन
पर तीत्र आघात पर्हुचने के कारण अथवा इच्छित प्रियख्री से
रमण करने की इच्छा होने के कारण ( उखके न मिलने से )
अतिशय प्रर मानसिक विकार से उन्माद उतपन्न होता ई ॥
चिन्न स जल्पति मनोदुगतं विसंज्ञो
गायत्यथो हसति रोदिति मूढसंज्ञः ।
वह् मन मे आई वस्तु को अबुद्धि पूवक ने सोचे समभे-
चेतना के बिना भिन्न भिन्न सूप मे वकतां दै, गाता द, हसता
है, रोता द, मूर्छित दो जाता ई । |
रक्तेक्षणो हतबटेन्द्रियभाः सुदानः
इ्यावाननो विषद्तेऽथ भवेत् परासुः १२
विषोन्माद म-आंखं खाल) बर् एव इन्द्रियां की कान्ति
नष्टो जाती 8, अतिशय गरीब, यख म॒ काङापन तथा
उपेक्षा करने से मर जाता है ॥१३॥ र
स्निग्धं स्विन्नं ठ मलुजयुन्मादातं विशोषयेत् ।
तीच्णैरुभयतोभागेः शिरसश्च विरेचनैः ॥९४॥ `
विविधैरवपीडेश्च सषेपस्तेदसंयुतेः । ख
योजयित्वा च॒ तश्चणं घ्राणे तस्य प्रयोजयत् ॥९५॥
` उन्माद रोगी मनुष्य का, स्नेहन. ओर स्वेदन करके तीण
शिरोविरेचनों से शोधन करे । ।.
सततं धूपयेच्वेनं श्रगोमसेः सुपृतिभिः।
सषेपानां च तैटेन नस्याभ्यङ्गौ हितो सदा ॥१६॥
, अच्छी प्रकार पवित्र खाफ किये कुत्ते ओर गोमांख से इको
निरंतर धुप देवे । सरो के तेर से नस्य एवं अभ्यंग करना
सदा उत्तम है ॥१६॥ द्ङयेदद् सुतान्यस्य वदेन्नाशं प्रियस्य वा ।
भीमाकारनेरेनीगेदौन्तेग्यरेश्च निर्विषः ॥१८॥
भीषयेत् संयतं पाडः कञाभिवोऽथ ताडयेत् ।
यन्त्रयित्वा सुराप बा त्राखयेत्त तृणाभ्निना ॥९८॥
जडेन तज्येद्राऽपि रज्नुघतेर्बिभावयेत् ।
बटर्वाश्चापि संरेत् जञेऽन्तः परिवासयेत् ।
भ्रुदेदारया चनं ममाधातं विवजयेत्।
वेहमनोऽन्तः परविश्यैनं र्सतद्वश्म दीपयेत् ॥१९॥
सापिधाने जरत्करूपे सततं वा निवासयेत् ।
जो वस्तु न देखी हो, एेसे विचित्र स्प इसको दिखाये ।
प्रिय वस्व का नाश के सुनाये । भीषण आकारवाडे मनुष्यां
से, शिक्षित हाथियों से, विष रदित खापोसे इसको राये ।
पाशों से-रस्वियों से बांधकर) कया ते.चाब्ुक से इसको मारे ।
बाधिकर सुरश्चित सूप में तिनको की आग से इसका डराये ॥
मग्र जल से कम्पाये | रस्सी की चोट से मारे । बलवान् व्यक्ति
इसको बचाते हए जल मे ङवाने का नाय्कः क्रं । मोटी ना
सहसे चुभाये, परन्द॒ ममे स्थानो पर चाड न करे । घर के
अन्दर छे जाकर इखको बचति हृ ध्र मे आग ख देषे |:
जल रहित कुएं मे इसको रखकर ठ देवे ।
वि० मन्तव्य-इस प्रकार के उपायों से उसका मन ठिकाने
आ जाता है, क्योकि शारीरिक दुःखो के भय की अपेषठा प्राण
का मय महान् होता है ओर प्राणभय होने पर- मृत्यु का भय
उपस्थित होने पर इधर.उधर भटकता हना मन् शान्ति
| प्राप्त कर छेता दे ॥ कशामिस्ताडयित्वा वा सुब्रडधं विजने ण्डे ।
रन्ष्याचेतो हि विभान्तं त्रजव्यस्य यथा सम् ॥
देषदुःलभयेभ्यो हि परं प्राणमयं महत् ।
तेन याति शमं तस्य सवतो विप्लुतं मनः ॥
इष्टद्रव्यविनाशात्त॒ मनो यस्योपहन्यते ।
तस्य तत्छदश्रािशान््याश्वासेः शमं नयेत् 1 चरकं
ञयदायहाद्यवागृञ्च तपेणान् वा प्रदापयेत् ।॥२०॥
केवखानम्डुस्तान बा छतापाय् वा बशः । ह ^
हथं यदहीपनीयं च तत्पथ्य तस्य् सो (यो) जयेद् ।२९५॥ ` (बिडङ्गन्निफकायुस्तमजिषठादाडिमोत्पकेः। भ
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