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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३ ]

बर्हिष्ठरजनीकुष्ठपरिणीनीसारिवाह्यैः ।

हरेणुकात्रिबुहन्तीवचातालीसकेसरैः ॥२३॥

द्विक्षीरं साधितं सर्पिमालतीकुमुभैः सह ।

गुल्मकासज्वरश्वासखयोन्मादनिवारणम् ॥२४॥

एतदेव हि सम्पक्वं जीवनीयोपसंभूतम् ।

चतुर्गुणं दुग्धेन महाकरुणामुच्यते ॥२५॥

अपस्मारं ग्रहं शोषं क्लेद्यं कार्यं मबीजताम् ।

घृतमेतन्निहन्त्याशु ये चादौ गदित्वा गदाः ॥२॥

एक एक दिन छोड़कर इसको थवागू, तर्पण (जी का मन्थ या लाजा सत्) देवे । इन सत्तुओं को अकेले जल के साथ देवे । बहुत विचक्षण वैद्य कुल्माष (अर्धस्विन्न जी) देवे । हृदय के लिये प्रिय (हितकारी) और दीपनीय (अग्निवर्धक), जो पथ्य भोजन हो, वह इस रोगी को देवे । (विडंग, त्रिफला, मुस्ता, मजीठ, अनारदाना, नौलोफर, निशोथ, ऐलबालुक, इलायची, चन्दन, देवदारु, बर्हिष्ठ, हल्दी, कूठ, सुद्रापर्णी, सारिवा, कृष्णसारिवा, हरेणु, त्रिदूत, दन्ती, वच, ताळीस, केसर, चमेली के फूल, इनके कल्क से, घी से दुगुने दूध में सिद्ध किया घी गुल्म, कास, ज्वर, श्वास, क्षय, उन्माद को नष्ट करता है । उपर्युक्त द्रव्यों में जीवनीय गण के द्रव्य मिलाकर चार गुणे दूध से सिद्ध किया घृत महाकरुण्य कहा जाता है । यह घृत अपस्मार, ग्रह, शोष, क्लीवता, कृशता, नपुंसकता को तथा पूर्वोक्त कहे रोगों की शीघ्र नष्ट करता है ।

वि० मन्तव्य—अबीजताम्—अबीजता शुक्र का वह विकार है जिसमें मैथुन शक्ति तो होती है परन्तु उस शुक्र से गर्भोत्पत्ति नहीं होती ॥२०-२६॥

बर्हिष्ठकुष्ठमज्जिहाकटुकैलनिशाह्यैः ।

तगरत्रिफलाहिङ्कुवाजिगन्धामरदुग्धैः ॥२७॥

वचाऽजमोदाकाकोलीमेदामधुकपदुमकैः॥

सशर्करं हितं सर्पिःपक्वं क्षीरं चतुर्गुणम् ॥२८॥

बालानां ग्रहजुष्टानां पुंसां दुष्टालपरेतसाम् ।

ख्यातं फलघृतं क्षीणां वन्ध्यानां चाशु गर्भदम् ) ।

फलघृत—बर्हिष्ठ, कूठ, मजीठ, कुटकी, इलायची, हल्दी, तगर, त्रिफला, हींग, अश्वगन्धा, देवदारु, वच, अजवाइन, काकोली, मेदा, मुलेहठी, पद्माल, इनके कल्क से शर्करा के साथ चार गुणे दूध में (घी से) सिद्ध किया घी—ग्रहों से पीड़ित बालकों के लिये दुष्ट एवं अल्प शुक्रवाले पुंसों के लिये उत्तम है, वन्ध्या स्त्रियों के लिये शीघ्र ही गर्भप्रद है ) ॥२७, २८॥

ब्राह्मीसेन्द्रौ विडङ्कानि व्योषं हिङ्कु सुरां जटाम् ।

विषधन्तीं लघुनं रास्तां विशलयां सुरसां वचाम् ॥२०॥

१ कल्याणक घृत में क्षीर के स्थान में जल लेना उत्तम है । चरक में जल ही पाठ है, यथा—चतुर्गुणे जले सम्यक् घृतप्रस्थं विपाच्येत । महाकल्याणक में 'गृष्णिरी चतुर्गुणे' पाठ है ।

व्योतिषमती नागरं च अनन्तामभयां तथा ।

सौराष्ट्रीं च सर्मांसानि गजमूत्रेण पेययेत् ॥३१॥

छायाविशुष्कास्तद्वर्तीयोजयेद्विधिकोविदः ।

अवपीडेऽन्नैऽभ्यङ्गं नश्ये धूम्रे प्रलेपने ॥३२॥

ब्राह्मी, इन्द्रवाष्णी, विडंग, त्रिकटु, हींग, देवदारु, जटामांसी, विषधन्ती (हल्दी), लहसुन, रास्ता, विशलया, (कलिहारी), तुलसी, वच, मालकांगनी, सोंठ, सारिवा, हरड और सौराठी-मिठी, इनको परस्पर समान भाग लेकर हाथी के मूत्र से पीसे । इनकी वर्त्ति बनाकर छाया में सुखा ले । विधि को जाननेवाला वैद्य इनको अवपीड में, अंजन में, अभ्यंग में, नश्य में, धूम्र में, प्रलेप में बरते ॥३०-३२॥

उरोऽपाङ्गललाटेषु सिराश्चाशय विमोक्षयेत् ।

उन्मादं रोगी के उर, अपांग और ललाट में सिरा का वेधन करे ।

अपस्मारक्रियां चापि ग्रहोद्विष्टां च कारयेत् ॥३३॥

अपस्मार में कही एवं ग्रह में कही चिकित्सा करे ॥३३॥

शान्तदोषं विशुद्धं च स्नेहबस्तिभिराचरेत् ।

उन्मादेषु च सर्वेषु कुर्याच्चिन्तप्रसादनम् ।

मृदुमुर्वा मदेऽप्येवं क्रियां मृद्धौ प्रयोजयेत् ॥३४॥

शोकजन्म व्यपनयेदुन्मादे पञ्चमे भिषक् ।

विषजे मृदुपर्वा च विषधन्ती कारयेत् क्रियाम् ॥३५॥

उन्माद के शान्त हो जाने पर—वमनादि से शुद्ध करके स्नेह बस्तियों से चिकित्सा करे । उन्माद शान्त होने का लक्षण—प्रसादश्चन्द्रियाथार्थान् बुद्ध्यात्ममनसां तथा ।

धातूनां प्रकृतिस्थत्वं विगतोन्मादलक्षणम् ॥ चरक ।

सब प्रकार के उन्मादों में चित्त की प्रसन्नता उत्पन्न करे । मद में प्रथम मृदु संशोधन देकर पीछे से कोमल अंजन, अवपीडन रूपी चिकित्सा करे । शोकजन्म पांचवें उन्माद में वैद्य शोकशत्य को निकाल देवे । विषजन्म उन्माद में मृदु-संशोधन देकर विषनाशक चिकित्सा करे ॥३४, ३५॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते भूतविद्यातन्त्रे उन्मादप्रतिषेधो नाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः)

द्विषष्ठितमोऽध्यायः ॥६२॥

त्रिषष्ठितमोऽध्यायः

अथातो रसभेदविकल्पमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे रस भेद विकल्प अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१, २॥

दोषाणां पञ्चदशाधा प्रसरोऽभिहितस्तु यः ।

त्रिषष्टया रसभेदानां तत्प्रयोजनमुच्यते ॥३॥