सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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दोषों का जो पन्द्रह प्रकार से प्रसर कहा है, उसका प्रयोजन, तिरसठ रस भेदों की दृष्टि से है।
वक्तव्य—पन्द्रह दोषों के उपलक्षण मात्र हैं। दोष परस्पर मिलकर तिरसठ प्रकार के हैं, रस भी संसर्ग रूप में तिरसठ हैं, इसलिये दोनों की तुलना करके इन रसों का प्रयोग करना चाहिये ॥३॥
अविदग्धा विदग्धाश्च भिद्यन्ते ते त्रिषष्टिषा ।
रसवेदत्रिषष्टि तु वीक्ष्य वीक्ष्यावचारयेत् ॥४॥
अविदग्ध (असंयुक्त-एकाकी) रस और विदग्ध (संयुक्त मिले) रस तिरसठ प्रकार के हैं। रसों के इन तिरसठ भेदों के दोषों को देख देखकर बरतना चाहिये ॥४॥
एकैकेनानुगमनं भागशो यदुदीरितम् ।
दोषाणां तत्र मतिमान् त्रिषष्टि तु प्रयोजयेत् ॥५॥
दोषों का अंशांश कल्पना से एक एक रस का अनुकरण करना, जो कहा है, उनमें बुद्धिमान् वैद्य इन तिरसठ रस भेदों को बरते ॥५॥
यथाकमप्रवृत्तानां द्विकेषु मधुरो रसः ।
पञ्चानुकमते योगान्मल्लश्चतुर एव तु ॥६॥
त्रींश्चानुगच्छति रसो लवणः कटुको द्वयम् ।
तिक्तः कषायमन्वेति ते द्विका दश पञ्च च ॥७॥
तद्यथा—मधुराम्लः १, मधुरलवणः २, मधुरकटुकः ३, मधुरतिक्तः ४, मधुरकषायः ५, एते पञ्चानुकान्ता मधुरेण, अम्ललवणः १, अम्लकटुकः २, अम्लतिक्तः ३, अम्लकषायः ४, एते चत्वारोऽनुकान्ता अम्लेन, लवणकटुकः १, लवणतिक्तः २, लवणकषायः ३, एते त्रयोऽनुकान्ता लवणेन, कटुतिक्तः १, कटुकषायः २, द्वावेतावनुकान्तौ कटुकेन, तिक्तकषायः १, एक एवानुकतान्तस्तिक्तन, एवमेते पञ्चदश द्विकसंयोगा व्याख्याताः ॥८॥
दो रसों के संयोग में क्रम से मधुर रस पाँच रसों में, अम्ल रसों के चार योगों में, लवणरस तीन योगों में, कटु रस दो में और तिक्त केवल कषाय के साथ मिलता है, इस प्रकार दो रसों के संयोग पन्द्रह हैं।
यथा—मधुराम्ल, मधुरलवण, मधुरकटुक, मधुरतिक्त, मधुरकषाय—ये पाँच मधुररस के संयोग से बने हैं। अम्ललवण, अम्लकटु, अम्लतिक्त, अम्लकषाय ये चार प्रकार अम्ल से बने हैं। लवणकटु, लवणतिक्त, लवणकषाय, ये तीन लवण के योग से बने हैं। कटुतिक्त, कटुकषाय, ये दो कटुरस से बने हैं। तिक्तकषाय तिक्त से एक ही संयोग है। इस प्रकार से ये पन्द्रह योग दो रसों के संयोग से बने हैं ॥९॥
त्रिकान् वक्ष्यामः—
आदौ प्रयुज्यमानस्तु मधुरो दश गच्छति ।
षडम्लो लवणस्तरमादर्थमेकं तथा कटुः ॥१०॥
तद्यथा—मधुराम्ललवणः १, मधुराम्लकटुकः २, मधुराम्लतिक्तः ३, मधुराम्लकषायः ४, मधुरलवणकटुकः ५, मधुरलवणतिक्तः ६, मधुरलवणकषायः ७, मधुरकटुतिक्तः ८, मधुरकटुकषायः ९, मधुरतिक्तकषायः १०, एवमेषां दशानां त्रिकसंयोगानामादौ मधुरः प्रयुज्यते, अम्ललवणकटुकः १, अम्ललवणतिक्तः २, अम्ललवणकषायः ५, अम्लतिक्तकषायः ६, एवमेषां षण्मादावम्लः प्रयुज्यते, लवणकटुतिक्तः १, लवणकटुकषायः २, लवणतिक्तकषायः ३, एवमेषां त्रयाणामादौ लवणः प्रयुज्यते, कटुतिक्तकषायः १, एवमेकस्यादौ कटुकः प्रयुज्यते, एवमेते त्रिकसंयोगा विशतिष्योख्याताः ॥१०॥
त्रिक-तीन के संयोग को कहेंगे—मधुर को प्रारम्भ में रखकर दस संयोग बनते हैं। अम्ल को आगे में रखकर छे संयोग, लवण को आगे में रखकर तीन संयोग बनते हैं। यथा—मधुराम्ललवण, मधुराम्लकटु, मधुराम्लतिक्त, मधुराम्लकषाय, मधुरलवणकटु, मधुरलवणतिक्त, मधुरलवणकषाय, मधुरकटुतिक्त, मधुरकटुकषाय, मधुरतिक्तकषाय, इस प्रकार इन तीन रसों के दस संयोगों में मधुररस प्रारम्भ में है। अम्ललवणकटु, अम्ललवणतिक्त, अम्ललवणकषाय, अम्लकटुतिक्त, अम्लकटुकषाय, अम्लतिक्तकषाय, इन छे में अम्लरस पहले आता है। लवणकटुतिक्त, लवणकटुकषाय, लवणतिक्तकषाय, इन तीन के प्रारम्भ में लवण बरता गया है। कटुतिक्तकषाय, इस एक में कटु रस ही आरम्भ में बरता गया है। इस प्रकार तीन रसों के बीस संयोग कह दिये हैं।
वि० मन्तव्य—तीन रसों के संयोग का नाम 'त्रिक' है और इसी प्रकार चार रसों के संयोग का नाम "चतुष्क" पाँच रसों के संयोग का नाम "पञ्चक" तथा छः रसों के संयोग का नाम "षट्क" है ॥११,१०॥
चतुष्कान् वक्ष्यामः—
चतुष्करससंयोगान्मधुरो दश गच्छति ।
चतुरोऽम्लोऽनुगच्छेच लवणस्त्वेकमेव तु ॥११॥
मधुराम्ललवणकटुकः १, मधुराम्ललवणतिक्तः २, मधुराम्ललवणकषायः ३, मधुराम्लकटुतिक्तः ४, मधुराम्लकटुकषायः ५, मधुराम्लतिक्तकषायः ६, मधुरलवणतिक्तकषायः ९, मधुरकटुतिक्तकषायः १०, एवमेषां दशानामादौ मधुरः प्रयुज्यते, अम्ललवणकटुतिक्तः १, अम्ललवणकटुकषायः २, अम्ललवणतिक्तकषायः ३, अम्लकटुतिक्तकषायः ४, एवमेषां चतुर्णामादावम्लः प्रयुज्यते, लवणकटुतिक्तकषायः १, एवमेकस्यादौ लवणः प्रयुज्यते, एवमेते चतुष्करससंयोगाः पञ्चदश कीर्तिताः ॥१२॥
चार रसों के संयोगों को कहेंगे—चार रसों के संयोग में