सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६३ ]
मधुर रस आगे आकर दस संयोग बनते हैं। अम्ल रसों के चार संयोग और लवण का एक संयोग बनता है, यथा—
मधुराम्ललवणकटु, मधुराम्ललवणतिक, मधुराम्लतिक, मधुराम्लकटुकपाय, मधुराम्लतिककपाय, मधुरलवणकटुतिक, मधुरलवणकटुकपाय, मधुरलवणतिककपाय, मधुरकटुतिककपाय—इस प्रकार इन दस के प्रारम्भ में मधुर रस बरता जाता है। अम्ललवणकटुतिक, अम्ललवणकटुकपाय, अम्लकटुतिककपाय, अम्ललवणतिककपाय—इन चार में अम्लरस प्रारम्भ में बरता गया है। लवणकटुतिककपाय—इस प्रकार चार रस के पन्द्रह संयोग कह दिये हैं ॥१२॥
पञ्चकान् वद्यामः—
पञ्चकान् पञ्च मधुर एकमम्लस्तु गच्छति ॥१३॥
मधुराम्ललवणकटुतिकः १, मधुराम्ललवणकटुकपायः २, मधुराम्ललवणतिककपायः ३, मधुराम्लकटुतिककपायः ४, मधुरलवणकटुतिककपायः ५, एवमेषां पञ्चा नामादौ मधुरः प्रयुज्यते, अम्ललवणकटुतिककपायः, १, एवमेकस्यादावम्लः, एवमेते षट् पञ्चकसंयोगा व्याख्याताः ॥१४॥
पाँच रसों के संयोगों को कहते हैं—मधुररस पाँच संयोगों में पहले आता है और अम्ल रस एक संयोग में यथा—
मधुराम्ललवणकटुतिक, मधुराम्ललवणकपाय, मधुराम्ललवणतिककपाय, मधुराम्लकटुतिककपाय, मधुरलवणकटुतिककपाय, इस प्रकार इन पाँच के प्रारम्भ में मधुररस बरता जाता है। अम्ललवणकटुतिककपाय इस एक में अम्लरस बरता गया, इस प्रकार से पाँच रसों के छे संयोग कह दिये हैं ॥१३,१४॥
षट्कमेकं वद्यामः एकस्तु षट्कसंयोगः—मधुराम्ललवणकटुतिककपायः एष एक एव षट्क संयोगः ॥१५॥
छे रसों का संयोग एक कहेंगे—छे रसों का संयोग एक ही है—मधुराम्ललवणकटुतिककपाय, यही एक छे रसों का संयोग है ॥१५॥
एकैकश्च षड्रसा भवन्ति—मधुरः १, अम्लः २, लवणः ३, कटुकः ४, तिक्तः ५, कपायः ६, इति ॥१६॥
एक एक रस छे हैं, यथा—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कपाय ॥१६॥
भवति चात्र—
एषा त्रिषष्टिख्याताः रसानां रसचिन्तकैः।
दोषभेदत्रिषष्ट्यां तु प्रयोक्तव्या विचक्षणेः ॥१७॥
इस विषय में श्लोक है—रस के विचारकों ने रसों के ये तिरसठ भेद कहे हैं। बुद्धिमानों को चाहिये कि दोष भेद के तिरसठ भेदों में इनका प्रयोग करे।
वि० मन्तव्य—द्रव्य एकरसं नास्ति न रोगोऽपि एकदोषजः—के अनुसार संसार का कोई भी द्रव्य एक रस अर्थात् केवल एकरसवाला नहीं और कोई रोग भी एक दोषज अर्थात् केवल एक दोषज नहीं है। अतएव अनेक रस अर्थात् एक रस से अधिक रसवाले द्रव्यों का प्रयोग अनेक दोषज अर्थात् एक से अधिक दोषों से उत्पन्न रोगों में—द्रव्याश्रित रसों का विचार करके करना चाहिये तभी लाभ होता है। यह विचार इस प्रकार किया जाता है—रसाः तावत् षट्-मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कपायाः। ते सम्यक् उपयुज्यमाना शरीरं यापयन्ति, मिथ्या उपयुज्यमानाः तु खलु दोषप्रकोपाय उपकल्पन्ते। और—दोषाः पुनः त्रयः वात-पित्त-श्लेष्माणः। ते प्रकृतिभूताः शरीरोपकारका भवन्ति, विकृतिम् आपन्नाः तु खलु नानाविधैः विकारैः शरीरम् उपतापयन्ति। और—तत्र दोषं एकैकं त्रयः त्रयः रसा जनयन्ति, त्रयः त्रयः च उपशमयन्ति। तद्-यथा—कटुतिककपाया वातं जनयन्ति, मधुर-अम्ललवणाः तु एनं (वातं) शमयन्ति, कटुकअम्ललवणाः पित्तं जनयन्ति मधुरतिककपायाः तु एनत् (पित्तं) शमयन्ति। मधुरअम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयन्ति, कटुतिककपायाः तु एनं (कफं) शमयन्ति। परन्तु—रसदोषसन्निपाते तु ये रसाः यैः दोषैः समानगुणाः समानगुणभूषिष्टा वा भवन्ति ते (रसाः) तान् (दोषान्) अभिवर्द्धयन्ति। विपरीतगुणाः तु विपरीतगुणभूषिष्टा वा शमयन्ति अभ्यस्थमाना (सेव्यमानाः) इति। (च० नि० अ० १)-सारांश—रस छे हैं और दोष तीन हैं, तीन तीन रस एक एक दोष को बढ़ाते हैं और तीन तीन एक एक दोष को शान्त करते हैं, परन्तु रस एवं दोषों के सन्निपात (संयोग) में भी जो २ रस दोषों के समान गुणवाले होते हैं वे उनको बढ़ाते हैं और जो २ विपरीत गुणवाले होते हैं वे उनको शान्त करते हैं। भगवान् धन्वन्तरि के उक्त श्लोक का यही तात्पर्य है, परन्तु यह सब केवल रसों को ध्यान में रखकर अथ च मुख्य मानकर कहा गया है। पाठक यह भी न भूलें कि रसों से भी अधिक कार्यकर गुण, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव हैं, जो दोषों के वर्द्धन एवं शमन में हेतु होते हैं। देखिये सु० सू० अ० ४०। अतएव भगवान् पुनर्वसु ने उक्त पाठ से आगे पाठकों को सावधान करने के लिये कहा है कि—एतद्व्ययस्था हेतोः परस्परणे असंस्थानां (असंयुक्तानां) रसानां षट्त्वं उपदिश्यते दोषाणां च त्रित्वम्। अर्थात् यह केवल व्यवस्था के लिये—परस्पर न मिले हुए रस छे और दोष तीन कह दिये जाते हैं ॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु रस-
भेदविकल्प्याध्यायो नाम (प्रथमः आदितः)
त्रिषष्टिभेदोऽध्यायः ६३॥