स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
पृष्ठ 39, कुल 94 में से
संदर्भ में पढ़ें(२२)
(स्वरोदय विज्ञान)
हाल सुन कर जाना है। उस समय उसके आश्चर्य की सीमा न रही जब रात्रि को असमय ही चन्द्रमा स्वर और पृथ्वी तत्व चलने लगे। दक्षिण यात्रा में यह बहुत ही शुभ घड़ी गिनी जाती है। उसने इसका वर्णन उसी समय किया। छिन्दवाड़ा पहुँचने पर सब कुशल पाया। स्वरोदय शास्त्र इस प्रकार से भावी घटनाओं का पता बतलाता है और अनिश्चित भविष्य का एवं प्रकृति के गुप्त भेदों का पर्दा खोल देता है।
जल पृथ्वी तत्व में चले, सुनो कान दे वीर। सुफल कारज दोनों करे, कै धरती कै नीर।
पृथ्वी और जल तत्व की यात्रा सहायक यात्रा कहलाती है। आकाश, वायु व अग्नि तत्व में जो यात्रा की जाती है, उसमें बड़ी हानि होती है। एक आचार्य का कथन है कि आकाश तत्व में यात्रा करें तो यात्रा में मृत्यु हो या बीमारी हो। वायु तत्व की यात्रा से बीमारी होती है। अग्नि तत्व से किसी प्रकार का आघात होवे। निराशा और कार्य में असफलता इन तत्वों की यात्रा के प्रधान लक्षण हैं। जब यात्रा को चले तो देखें कि श्वास दाहिना है या बायाँ। यदि श्वास दाहिना चल रहा हो तो तीन पग दाहिने पैर पहिले उठा क चले और एक क्षण ठहर वही पैर आगे रखे और चला जावे। इच्छित कार्य हो जावेगा। चन्द्रमा में बायें पैर को ४ बार पहले उठाना पड़ता है।
दाहिने स्वर में जाइये, दहिने डग धर तीन। बायें स्वर में चार डग, बायें कर प्रवीन॥
सुषुम्ना स्वर में कभी भी यात्रा नहीं करनी चाहिए अन्यथा हर प्रकार की हानि होती है।
गाँव परगने खेत पुनि, इधर उधर सुन मीत। सुषुम्ना चलत न चालिए, वर्जत हे रणजीत॥