स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
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(स्वरोदय विज्ञान)
होइ तौ पूर्व उत्तर की दिसा लीजै। और सिरदार अपना सुर देखै। जौ दाहिनी सुर होई तौ फतै होई और डेरो सुर होई तौ सरदार ठांडो हो जाई। और सब मानसन के सुर देखै जाको दाहिनी सुर होई। वासों हथियार लदवावै। दाहिने सुर के सिपाही बढ़ते जाइ। तौ सौ मानस हजार से लड़ै फतै पावै। और सरदार के हाथ खेत रहे और दाहिनी सुर नृप को होई तो प्राकृमह (पराक्रम) पूरी करै। तो पचास मानस हजार को मारे और फतै पवै। और डेरी सुर चलत होई तब लड़ाई करै और दखिन पश्चिम दिसा लीजे। और जब लड़ाई पै ठांडो होई तब सुर को देखै कि डेरी सुर है खेत पै ठांडो होई और मानसन को सुर देखै। चन्द्र होई तो दखिन पश्चिम मुख करि युद्ध करै तो जीतै फतै होई।
और देही में गरमी बढी होई तो आठ दिना नो डेरी सुर कर देई। दिन राति तो गरमी को नास होई और सुख पावे। और सरदी होई तौ आठ दिना लौ दाहिनी सुर करि देई तौ अमावस के दिना पडिया लगै दोनों की सधि में बोले आधी रात कौ। और बाकी नाम पै छिड़के। नाम गैल में लिखै और दूध से सीचै सकल दुःख तै छूटै।
और चार पहर दिन एतवार को काहू को दरसन न दे दिन रात अलख रहे। और बेरी को कष्ट देई तौ दाहिनी सुर दिन रात राखै। बैरी का नाम पथरा गै लिखे और लुटिया से घिसै सात बेर तो वैरी वस होई। अनदेखी देखै अनसुनी सुनै अन कही कहै। और रात को दोनों सुरन में ठैठा लगावै मजबूत कै। चार पहर रहन देई। उदैं में सूरज में खोलै चन्द्र को वार होई तो चन्द्र राखै। चार पहर और सूरज के दिन सूरज राखै पहर चारि। ऐसी विधि हमेशा करतु रहै। कछुक रोज लो करै तो जनत कौ तमासो देखै और कछू कहै सो तुरत फल पावै।
अब दाहिने सुर के लछिन सूनो। तीन दिन सूरज के है। शनीचर, रविवार, मंगल सुर दाहिना चलता होई। तब दिशा को विचार करै। पूरब उत्तर को मुख करै तब खात पै उठवे करै। सेज पैते ऊन लगै तौ सूर्य के