स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविश्व को भारत की देन
हम सभी विद्यार्थी रहे है, सभी पढ़ाई करके निकले है, हम सभी उच्च शिक्षा व माध्यम शिक्षा से निकले है। लेकिन जो बात हमें पढ़ाई जाती है, कि भारत सबसे ज्यादा पिछड़ा देश रहा। फिर पढ़ाया जाता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब देश भारत रहा, भारत ने दुनिया को कुछ नहीं दिया, फिर पढ़ाया जाता है कि यदि अंग्रेज भारत नहीं आते तो कुछ नहीं होता, अंग्रेज नहीं आते तो शिक्षा नहीं होती, अंग्रेज नहीं आते तो विज्ञान नहीं आता, अंग्रेज नहीं आते तो टेक्नोलॉजी नहीं आती, अंग्रेज नहीं आते तो ट्रेन नहीं आती, अंग्रेज नहीं आते तो हवाई जहाज नहीं होता, ऐसी बातें हम बचपन से पढ़ते आते है, सुनते आते हैं, और आपस में चर्चाये भी करते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा दुख और दुर्भाग्य इस बात का है कि अध्यापक हम सब को यह पढ़ाते हैं। गुरु जो हमारे वर्तमान में है, वे गुरु कम हो गये है शिक्षक ज्यादा हो गये है, वर्तमान में जो शिक्षक है वही हमें ये सब पढ़ाते है, और इस तरह से पढ़ाते है कि दिमाग में घुस जाता है। आपने मनोविज्ञान की बात सुनी होगी कि यदि एक झूठ को बार-बार बोला जाता है, तो थोड़ी दिन में झूठ सुनते सुनते सच लगने लगता है। तो भारत के बारे में करीब 200-300 वर्षों से एक झूठ पूरी दुनिया में बोला जाता है, कि भारत एक गरीब देश, भारत एक पिछड़ा देश, भारत एक अवैज्ञानिक देश, भारत एक ऐसा देश जहाँ तकनीक नहीं, जहाँ गणित नहीं, जहाँ भौतिक शास्त्र नहीं, कुछ भी नहीं।
भारत एक ऐसा देश हर समय दूसरों पर निर्भर, भारत एक ऐसा देश जो हर समय परावलंबी, भारत एक ऐसा देश जिसकी सभ्यता और संस्कृति गौरव करने लायक कुछ नहीं, और जो कुछ गौरव करने लायक है वो सब पाखंड हैं। और हमारे शिक्षकों को जब हम ये प्रश्न करते है कि आप हमें ये सब क्यों पढ़ाते है तो वे कहते है कि हमें भी यही पढ़ाया गया है इसलिए हम तुम सब को यही पढ़ाते है। तो हमारे शिक्षकों के शिक्षक रहे है, उन्हें भी इसी तरह पढ़ाया गया हैं। लेकिन सबसे ज्यादा कष्ट जब होता है जब कोई साधारण व्यक्ति भारत के बारे में ये कहता है कि हमारे पास ज्ञान नहीं, हमारे पास तकनीकी नहीं, हमारे पास विज्ञान नहीं, हमारे पास अर्थशास्त्र नहीं, धन नहीं, कुछ नहीं। हम तो हमेशा से पिछड़े और गरीब लोग है। साधारण व्यक्ति को तो माफ किया जा सकता है, लेकिन भारत का प्रधानमंत्री तब ये कहने लगे तो दिल को बहुत चोट पहुँचती है। हमारे देश के कई प्रधानमंत्रियों के मुहँ से यही सुना है कि भारत देश में ना तो ज्ञान है, ना शिक्षा, ना विज्ञान, ना तकनीक, जो कुछ भी हमारे पास है वो अंग्रेजों की देन है। पूरी दुनिया के सामने हमारे प्रधानमंत्रियों ने बोला है- “सपेरो का देश, लुटेरो का देश, अंधेरे का देश, ठगों का देश”, इस तरह की बातें पूरी दुनिया में भारत के बारे में प्रचारित हुई है। हमारे प्रधानमंत्री के द्वारा लंदन के ऑक्सफोर्ड में भाषण दिया कि “हम अंग्रेजों के बहुत आभारी है, यदि अंग्रेज भारत ना आते तो हमें तो ना विज्ञान पता था, ना तकनीकी पता थी, ना शिक्षा व्यवस्था होती, ना अर्थव्यवस्था होती, ना डाक विभाग होता, ना रेलवे विभाग होता”। 40 मिनट तक वे अंग्रेजों का गुणगान करते रहे, कि अंग्रेजों का आना भारत के लिए वरदान था। बिल्कुल ऐसा ही भाषण हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने भी संसद में दिया, उन्होंने अपनी संसद में कहा कि “यदि अंग्रेजों का भारत के साथ संयोग नहीं होता तो भारत तो हमेशा अंधकार और अंधेरे में डूबा हुआ देश ही रहता है, इसलिए भारत का विकास कराना है तो अंग्रेजों जैसा बनाना है, भारत को आगे बढ़ाना है
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