भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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तो अंग्रेजों के रास्ते पर चलकर ही उसको लेकर चलना है। 2 या 3 प्रधानमंत्री को छोड़ दिया जाये तो सभी इसी मानसिकता के प्रधानमंत्री रहे। लेकिन एक प्रधानमंत्री थे जिन्हें अपनी संस्कृति पर बहुत गर्व होता था उनका नाम था “श्री लाल बहादुर शास्त्री”।

उन्होंने एक फैसला लिया था कि अमेरिका से लाल गेहूँ भारत में आता था, जिस गेहूँ को अमेरिका में जानवर भी नहीं खाते थे, वो गेहूँ हमें खिलाया जाता था, श्री शास्त्री जी ने फैसला लिया कि ये गेहूँ खाना हमें मंजूर नहीं है, क्योंकि अपमानजनक तरीके से आता है, और सबसे खराब है, उस समय गेहूँ का उत्पादन कम था, लोगो ने कहा कि हम क्या खायेगे, तो शास्त्री जी ने कहा की हमें भूखे मरना पसंद है, लेकिन अपमानजनक तरीके से विदेशी घटिया गेहूँ खाना मंजूर नहीं है, इस बात पर संसद पर बहस चल रही थी, तो संसद में बैठे लोगो ने शास्त्री जी से कहा कि यदि ये अमेरिका और यूरोप के देश ना होते तो हम तो कहीं के ना रहते, तभी शास्त्री जी ने कहा कि अमेरिका और यूरोप के पास ऐसा कुछ नहीं है जो वे भारत को दे सके, हमारे पास ही है जो हम उन्हें दे सकते हैं।

इसी तरह एक और प्रधानमंत्री हुए इस देश में उनका नाम था ‘मोरारजी देसाई’। वे भी यही कहते थे कि दुनिया में अगर सबसे ज्यादा ज्ञान है तो वो भारत के पास है, लेकिन इस बात का दुर्भाग्य है कि उस ज्ञान को दुनिया में स्थापित करने में पीछे रह गये। इसी तरह एक और प्रधानमंत्री हुए जो केवल 4 महीने के लिए रहे, उनका नाम था चंद्रशेखर, वे भी यही कहते थे कि यूनान से पुरानी संस्कृति हमारी रही है, यूरोप के ज्ञान से पहले वो ज्ञान भारत में मौजूद रहा है, इसलिए हमें विदेशियों से लेनी की कोई जरूरत नहीं है। इसी दृष्टि से मैं आपके सामने कुछ तथ्य पेश करना चाहता हूँ, जिसे पढ़कर आप भारत देश पर गर्व करेंगे। मैं शुरुआत करता हूँ, भारत ने दुनिया को क्या दिया?

सबसे पहले हम दुनिया के सामने कह सकते हैं गर्व से, जिसे दुनिया ने भी स्वीकार किया है कि सबसे पहली भाषा और सबसे पहली लिपि(लिखना) दुनिया को दी है तो वो भारत ने दी है, हमारी सबसे पहली भाषा जो है वो संस्कृत है और सबसे पहली लिपि देवनागरी है। लेकिन कुछ इतिहासकार कहते हैं कि देवनागरी लिपि से भी बहुत पुरानी लिपि रही है जो ब्राह्मी लिपि है। ब्राह्मी लिपि के बारे में सारी दुनिया के वैज्ञानिकों ने जो बात स्वीकारी है वो है कि ब्राह्मी लिपि उतनी ही पुरानी है जितना पुराना भारत। लगभग 2 अरब साल पहले का ये हमारा ब्राह्मण है, प्रकृति है जिसमें भारत बसता है, लगभग उतनी ही पुरानी ब्राह्मी लिपि है। पूरी दुनिया भी यही मानती है कि लिखना यदि सिखाया है किसी देश ने तो भारत ने ही सिखाया है। क्योंकि भारत से पहले लिखने की कला किसी को नहीं आती थी, इसलिए भारत ने ही सबको लिखना सिखाया, पढ़ना और बोलना थोड़ा आसान होता है लेकिन लिखना थोड़ा कठिन माना जाता है जो लिपि द्वारा संभव है। फिर यहीं लिपि हमारी चीन में गयी, चीन ने हमसे लिखना सीखा, चीन के वैज्ञानिक ईमानदारी से इस बात को स्वीकार करते हैं, कि चीन के महर्षि भारत आये उन्होंने लिपि का अध्ययन किया, फिर चीन वापस लौटकर वहाँ अपनी लिपि का अविष्कार किया।

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