स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषा भी भारत ने ही दी है पूरी दुनिया को तो जाहिर सी बात है कि बोलना भी सबसे पहले भारत ने ही सिखाया है। दुनिया की जो विशिष्ट भाषा मानी जाती है अंग्रेजी को छोड़कर जैसे – जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश, पोर्तुगिस, रसियन, डेनिस आदि। अंग्रेजी की सामान्य भाषा में गिनती होती है। क्योंकि अंग्रेजी दूसरों की नकल हैं। विशिष्ट (मूल) भाषा के वैज्ञानिक यही कहते हैं कि हमारी भाषाएं संस्कृत भाषा से ली गयी है। आपको सुनकर हैरानी होगी, दुनिया में कम्प्यूटर को चलाने वाली एलोरिथम संस्कृति में ही तैयार की है और कुछ सालों में सारी दुनिया में छा जायेगी। सभी वैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं, वे कहते हैं कि इस भाषा में 2 चीजे महत्व की है पहली विशेषता इसका जो व्याकरण है वो एकदम पक्का है, इतना पक्का है कि लाखों करोड़ों वर्ष पहले किसी ऋषि मुनि ने जो व्याकरण में कर दिया है, जो 21 वीं शताब्दी में उतना ही सच है। जो लाखों करोड़ों वर्ष पहले था। महर्षि पाणिनी के सूत्र हजारों वर्ष पुराने हैं, महर्षि पाणिनी के सूत्रों में एक कोमा तक बदलने की जरूरत आज तक किसी को नहीं लगती। दुनिया के बाकि सभी भाषाओं में बदलाव होते हैं। लेकिन संस्कृत दुनिया की अकेली एवं विशिष्ट भाषा जिसका व्याकरण एकदम पक्का है, और अगले लाखों करोड़ों वर्ष तक उतना ही पक्का रहेगा।
इसलिए फ्रांससियों ने जो भाषा बनायी फ्रेंच उसे संस्कृत का आधार दिया, जर्मनी को संस्कृत का आधार दिया। आप कभी जर्मन व फ्रेंच भाषा को पढ़ने की कोशिश करेंगे बिल्कुल ऐसी हैं जैसी संस्कृत। दुनिया की लगभग 56 ऐसी भाषाएं हैं जिनके शब्द रूप, धातु रूप संस्कृत जैसे हैं।
दूसरी विशेषता यह है कि भारत की अकेली विशिष्ट भाषा संस्कृत है। जिसके पास शब्दों का सबसे बड़ा भण्डार है। दुनिया में बोली जाने वाली भाषा जिसको हम अंग्रेजी कहते हैं, रसियन, जर्मन, फ्रेंच, डच, स्पेनिश, डेनिस या चाइनीज। इन सब भाषाओं से हजारों गुणा ज्यादा शब्द संस्कृत भाषा में हैं। महर्षि पाणिनी से लेकर आज तक यदि संस्कृत के उपयोग किये गये शब्दों की गणना की जाए, कि कितने शब्द भाषा के स्तर पर उपयोग किये हैं। 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्दों का उपयोग अब तक हो चुका है। संस्कृत भाषा बहुता समृद्धशाली है। जब भाषा समृद्ध होती है तो साहित्य भी समृद्ध होता है। संस्कृत भाषा में जितना साहित्य लिखा गया है पूरी दुनिया में शायद ही किसी भाषा में लिखा गया है। फिर आप कहोंगे की ये दिखाई क्यों नहीं देता। इसका कारण है हमारी लापरवाही का नतीजा है कि हम अपने साहित्य को बचाकर नहीं रख सके। हमारे साहित्य का बहुत नुकसान हुआ है पिछले 1000 वर्षों में। आपको जानकर हैरानी होगी कि विदेशी लुटेरों ने भारत में आकर लूटना शुरू किया तो केवल सम्पत्ति नहीं लूटी बल्कि साहित्य को भी लूटा, क्योंकि ज्ञान यहाँ भरा पड़ा है, और कई विदेशी अक्रान्ता ऐसे आये थे कि जिन्होंने हमारे साहित्य को जला दिया, आपने सुना होगा तक्षशिला की कहानी, भारत के सबसे बड़े पुस्तकालय की कितनी बड़ी दुर्दशा हुई थी, कि उसको जला दिया गया था और तक्षशिला की पुस्तकों को जला देने की बात यह है कि 6 महीने तक विदेशी अक्रन्ताओं ने उन किताबों के पत्रे को जला-जला कर पानी गर्म किया था। ये इतना बड़ा ज्ञान का भण्डार था जो 6 महीने तक जलता रहा था। कल्पना कीजिये लाखों करोड़ों पेज रहे होंगे। कई विदेशी लुटेरे ऐसे आये कि हमारा साहित्य लूट लिया, कई विदेशी लुटेरे ऐसे आये की हमारा साहित्य जला दिया, कई विदेशी अक्रान्ताएं ऐसे आये जिन्होंने हमारे साहित्य को तोड़-मरोड़ करके, उसको ऐसा प्रस्तुत कर दिया कि वो हमें सबसे ज्यादा खराब दिखता है। जैसे
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