स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअली, वह कर्नाटक का राजा था। अंग्रेजों ने कर्नाटक को अपने अंतर्गत मिलाने के लिए हैदर अली पर खूब आक्रमण किये परन्तु हर बार अंग्रेजों को मुहँ की खानी पड़ी। 1775 ई० में प्रो० कूट भारत में अधिकारी बनकर आया। उसने भी हैदर अली पर आक्रमण किया हैदर अली ने उसे पराजित कर उसकी नाक काट दी। वह कटी नाक लेकर वापस आ रहा था तो बेलगाम के एक वैद्य ने उसकी दशा पर दया कर के उसकी नाक प्लास्टिक सर्जरी से जोड़ दी। इस घटना का विवरण प्रो० कूट ने ब्रिटिश सभा में किया, तब ब्रिटिश दल भारत उस वैद्य के पास आया और पूछा के यह विद्या आपने कहाँ से सीखी तब उसने बताया कि "यह कार्य मैं क्या कोई भी वैद्य कर सकता है"। तब प्रो० कूट ने यह विद्या पूना में सीख कर इंग्लैंड में सीखाई। यह सब जानकारी प्रो० कूट ने अपनी डायरी में लिखी है। ऐसे ही टीकाकरण की शुरुआत भी भारत में ही हुयी। डॉ. ओलिव ने अपनी डायरी में लिखा है कि "जहाँ विश्व में लोग चेचक से मर रहे है वही यहाँ भारत में चेचक नगण्य के बराबर है और यहाँ इसके लिए टीकाकरण किया जाता है।" यह घटना 1710 की कलकत्ता की है यह तो सिर्फ कुछ ही उदाहरण है जो ये बताते है कि भारत कितना समृद्ध था और यह ज्ञान भारत में लाखों वर्षों से चला आ रहा है। ये सब घटनाओं का पता विदेशी यात्रिओं के विवरण से चलता है। अब थोड़ा तकनीक की और देखते है। भारत ने विश्व को लोहा (इस्पात या स्टील) बनाना सिखाया। 1795 में एक अंग्रेज अधिकारी ने सर्वेक्षण किया और अपनी यात्रा विवरण में लिखा है कि " भारत में इस्पात का काम कम से कम पिछले 1500 वर्षों से हो रहा है।" उसके अनुसार " पश्चिमी, पूर्वी, दक्षिणी भारत में 15000 छोटे बड़े कारखाने चल रहे है और हर कारखाने में रोजाना 500 कि०ग्रा० इस्पात बनाया जाता है। भारत में किसी भी कारखाने की भट्टी में लागत का खर्च 15 रुपये आता है। एक भट्टी से एक टन इस्पात बनाया जाता है और इस्पात बनाने का खर्च 80 रुपये आता है। इस इस्पात से बना सरिया यूरोप के बाजार में बिकता है और इस इस्पात की सबसे बड़ी विशेषता है कि उस पर कभी जंग नहीं लगता है।"
इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली के महरोली पूर्व (लगभग) बना था और आज तक उस पर जंग नहीं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण से सम्बन्धित और आर्यभट ने न्यूटन से 4000 वर्ष पूर्व ही प्रतिपादित के बीच की दूरी, शनि के उपग्रहों की संख्या, आदि जो आज का विज्ञान मानता है। आर्यभट ने सबसे पहले ब्लैक होल थ्योरी दी। स्पष्ट है कि ये सभी गणना बिना किसी टेलिस्कोप के सम्भव नहीं है अर्थात टेलिस्कोप का आविष्कार भी भारत में ही हुआ था। आर्यभट ने बहुत सारे रहस्य खगोल विज्ञान के बारे में बताये थे जिनमे पृथ्वी के घूर्णन का समय, दिन रात और वार या यूँ कहें दिन की संख्या बताई थी। हम कह सकते है कि कलेंडर भी भारत की ही देन है।
में ध्रुव स्तम्भ है जो 1500 वर्ष लगा है। सभी नियम वराहमिहिर कर दिए थे। सूर्य से पृथ्वी सभी गणना उतनी सटीक है
अगर अब बात आर्यभट्ट की हो रही है तो यह तो सर्व विदित है कि शुन्य का आविष्कार भारत ने किया। विश्व को गणना करना भारत ने सिखाया। महर्षि भरद्वाज ने एक ग्रन्थ 'लीलावती' की रचना की उसमे उन्होंने अवकलन के सूत्रों का वर्णन किया है। समाकलन गणित की रचना महर्षि माधवाचार्य ने की है। गणित की बहुत ही सरल शाखा है
त्रिकोणमिति उसकी रचना बोधायन ने की थी और किसी भी निर्माण कार्य के लिए त्रिकोणमिति का ज्ञान होना आवश्यक है। बीज गणित की रचना भी महर्षि भरद्वाज ने की थी। बीज गणित में समस्त गणित का छोटा रूप है।
वैदिक गणित एक ऐसी देन है जिसके द्वारा किसी भी गणना को कम से कम समय में किया जा सकता है।
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