तैत्तिरीय आरण्यक (कृष्ण यजुर्वेद - सायणभाष्य व हिन्दी अनुवाद)
Taittiriya Aranyaka Hindi
महर्षि वैशम्पायन द्वारा
स्रोत: Taittiriya Aranyaka with Sayana Bhashya and Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 651, कुल 940 में से
संदर्भ में पढ़ें६३८ तैत्तिरीये आरण्यके
मनूद्वासयति^(१)। ^(७)अ॒पां मध्य॒ उद्वा॑सयेत्। अ॒पां वा ए॒तन्मध्या॒ज्ज्योति॑रजायत। ज्योतिः॑ प्र॒वर्ग्यः॑। स्व ए॒वैनं॒ योनौ॑ प्रति॒ष्ठाप॑यति^(७)॥ ४ ॥
^(८)यं द्वि॒ष्यात्। यत्र॑ स स्यात्। तस्यां॑ दि॒श्युद्वा॑सयेत्। ए॒ष वा अ॒ग्निर्वै॑श्वान॒रः। यत्प्र॑व॒र्ग्यः॑। अ॒ग्निनै॒वैनं॑ वैश्वान॒रेणा॒भिप्रव॑र्त्तयति^(८)। ^(९)औदु॑म्ब॒र्य्याः शाखा॑या-मु॒द्वास॑येत्। ऊर्ग्वा उ॑दु॒म्बरः॑। अन्नं॑ प्रा॒णः। शुग्घ॒र्म्मः॥ ५ ॥
इ॒द॒म॒हम॒मुष्या॑मुष्याय॒णस्य॑ शु॒चा प्रा॒णमपि॑ दहा-मीत्या॑ह। शु॒चैवा॑स्य प्रा॒णमपि॑ दहति। ताज॒गार्त्ति॒मार्च्छ॑ति^(९)। ^(१०)यत्र॑ द॒र्भा उ॑प॒दीक॑सन्तताः स्युः। त-दु॒द्वास॑येद् वृष्टि॑कामस्य। ए॒ता वा अ॒पाम॑नू॒ज्जाव॑र्य्यो॒ नाम॑। यद्द॒र्भाः॑। अ॒सौ खलु॒ वा आ॑दि॒त्य इ॒तो वृष्टि॒मुदी॑रयति। असावे॒वास्मा॑ आ दि॒त्यो वृष्टिं॒ नि-य॑च्छति। ता आपो॑ निय॑ता॒ धन्व॑ना यन्ति^(१०)॥ ६ ॥
गोः पय॑ः(१), उत्तरवेदिः॑(२), आ॑सते(३), स्थापय-ति(४), घ॒र्म्मः(५), य॑न्ति(६)॥ अनु०१०॥
| ७ | एतन्मन्त्रस्य भाष्यं | ५२२ | पृष्ठे द्रष्टव्यं। |
|---|---|---|---|
| ८ | ,, | ५२२ | ,, |
| ९ | ,, | ५२३ | ,, |
| १० | ,, | ५२३ | ,, |