भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 294 में से

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पृष्ठ 206

द्वादश आह्निक दीक्षा आदि के सम्बन्ध में आलोचना होनी चाहिए—ऐसा कहा गया है, इसलिए दीक्षा के स्वरूप के निरूपण के लिए दीक्षा के पूर्वभागी स्नान जो अवश्यकरणीय है उसका उपदेश किया जा रहा है । स्नान शुद्धि का सम्पादक है—ऐसा कहा जाता है । शुद्धि वास्तव में परमेश्वर समावेशमयी है । मलिनता को दूर करना ही वास्तव में शुद्धि है, कलुषता ( मलिनता ) उन्हीं का ही एक रूप है, लेकिन इस प्रकार होते हुए भी उसके सम्बन्ध में वह ( मलिनता ) उनके स्वभाव से भिन्न है हृदय में इस प्रकार सुदृढ़ अभिमानात्मक ( निश्चय ) है । अतः स्वतन्त्र, आनन्द और चित् ही जिसका सार है उस प्रकार स्वात्मस्वरूप में अथवा समग्र विश्व में उनसे भिन्नतारूपी सुदृढ़ निश्चयात्मक अभिमान ही अशुद्धि है । इस प्रकार अशुद्धि महाभैरवरूपी समावेश के द्वारा दूर किया जाता है । अशुद्धि का दूरीकरण किसी को तत्काल सम्पन्न होता है, फिर किसी को दूसरे उपायों के अवलम्बन के द्वारा होता है, उपायों के द्वारा होने पर भी किसी को किसी समय एक, दो और तीन के भेदों से समष्टि या अलग-अलग रूप से आश्वास ( शान्ति ) की प्राप्ति होती है¹ । इसलिए समापत्ति के नाना भेद हैं। भैरव के आठ मूर्तियाँ हैं जो पृथ्वी, जल, पवन, अग्नि, आकाश, सोम और सूर्य आत्मक हैं, इन आठों मूर्तियों में मंत्रन्यास के बल से परमेश्वर स्वरूप का समावेश के फलस्वरूप शरीर

१. शिवसमावेश प्राप्ति ही परम आश्वास हैं। उसकी प्राप्ति के लिए नाना प्रकार उपाय वर्तमान हैं। उन उपायों में समावेश अक्रम से प्राप्त होता है लेकिन बाह्य उपाय जो स्नान, न्यास और अर्चनरूप है वे क्रमिक हैं । उपायों में जो बाह्य है वे आन्तर या आध्यात्मिक उपायों की प्राप्ति के सहायक होते हैं । शास्त्रों में कहा गया है अध्यात्म बाह्य के बिना और बाह्य अध्यात्म के बिना नहीं बनता है । इसलिये जो क्रियात्मक बाह्य उपाय है वह आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाशक बनता है ।

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