भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१२६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १२ आदि उन से भिन्न है इस प्रकार विभक्तता के बोध उत्पन्न करनेवाले चैतन्य का भी परमेश्वर की समावेशता प्राप्त होता है ।१ किसी को स्नान, वस्त्र आदि का बदलना परितोष उत्पन्न करनेवाले होते हैं और उसके द्वारा परमेश्वर स्वरूप प्राप्ति में उपाय बनते हैं । श्रीमदानन्द आदि शास्त्र में कहा गया है—धृति, आप्यायन, वीर्य, मलदाह, व्याप्ति, सृष्टिशक्ति, स्थितिशक्ति और अभेद२—ये उनके मुख्य फल हैं । पृथिवी आदि तत्त्वों में न्यस्त मन्त्र उन-उन रूपों का धारण करता है । जो लोग वीराचारी हैं उनके लिए ये तत्त्व विशेष प्रकार है,३ जैसे रणरेणु, वीराम्भ महमरुत्, वीरभस्म, श्मसान का आकाश, उनसे सम्बन्धित चन्द्र और सूर्य १. शरीर में आत्मबोध रूप जो मल वर्तमान हैं स्नान से उसकी निर्मलता आती है और इसके फलस्वरूप बिना प्रयास से ही आभ्यन्तर निर्मलता सम्पन्न होता है । परमेश्वर की आठ मूर्तियों ने जो पृथ्वी आदि का रूप धारण किये हैं दीक्ष मंत्रों के द्वारा उन्हें अभिमन्त्रित कर स्नान करने पर आभ्यन्तर मलों का नाश होता है । २. स्नान से फल किस प्रकार होता है उसी का वर्णन धृति आदि शब्दों से किया गया है । धृति पृथ्वी का धर्म है, आप्यायन जल का, वीर्य तेज का, दाह या शोष वायु का, आकाश व्याप्ति का, चन्द्र सृष्टि का, सूर्य स्थिति का और अभेद आत्मा का बोधक है इसलिए मृत्तिका स्नान, जल स्नान, भस्म स्नान, गोरजोवति निर्मल वायु में गमनागमन वायव्य स्नान, व्यापक गगन में एकाग्र चित्त द्वारा आकाशस्नान अथवा निर्मल आकाश से पतित वारिधारा से स्नान आकाश स्नान सम्पन्न होता है । सोम और सूर्यरूपी ज्योतिर्मण्डल को शिवभावना करना भी एक प्रकार स्नान है । सर्वव्यापक प्रकाश ही महान् ह्रद् के सदृश है जिसमें समग्र विश्व निमज्जित है और उसी महाह्रद् में अपना आत्मस्वरूप स्थित है । इस प्रकार भावना उत्कृष्ट शधक है—यही महास्नान है । क्षिति आदि यद्यपि जड़ हैं तो भी शिव स्वयं अनुग्रहात्मक स्वरूप धारण करते हुए इन आठ मूर्तियों में विराजमान हैं, अतः इन स्वरूपों में उनके ध्यान से उन-उन फलों की प्राप्ति होती है । केवल इतना ही नहीं अर्चना के समय मूलाधार आदि चक्रों में पृथ्वी आदि तत्त्वों की धारणा भी फलाधायक है । ३. वीराचारी साधकों के लिए धरा, जल आदि विशेष प्रकार द्रव्य हैं जिसका उल्लेख रणरेणु आदि शब्दों से किया गया है ।

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