तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. १२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १२७ एवम् निर्विकल्प स्वरूप आत्मा ही आठ मूर्तियाँ हैं। फिर स्नान बाह्य और आन्तर के क्रम से दो प्रकार हैं। जो वस्तु बाहर विद्यमान है मन्त्र के साथ वस्तु की तदात्मता सम्पन्न होने के बाद मन्त्रमयी स्थिति आ जाती है तब उन-उन वस्तुओंमें निमज्जन ही स्नान है। उस स्नान में जो विशेष है वह इस प्रकार है—आनन्दद्रव्य को वीराधार में स्थित देखकर उसे शिवमय स्वरूप में भावना करने के अनन्तर उसी में मंत्रचक्र का पूजन, फिर उसी से शरीर और प्राण उभय में स्थित देवताचक्र का तर्पण ही मुख्य स्नान है। आन्तर स्नान इस प्रकार है धरा आदि तत्त्व की धारणा पृथ्वी आदि चक्रों में करते हुए जो तन्मयता आती है वही आन्तर स्नान है। परभैरव स्वरूप में निमज्जन को ही स्नान कहते हैं। इस प्रकार स्नान जब सम्पन्न होता है तब उस बाह्य स्नान को स्नान कहते हैं। बाह्यस्नान मुख्य नहीं, गौणरूप में उस में स्नान शब्द का उपचार है। श्री अभिनवगुप्त द्वारा रचित श्रीतन्त्रसार का स्नान प्रकाशन नामक द्वादश आह्निक है।