भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

१४० तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः पदार्थाः कति कानि च तेषां नामानि?— द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः । द्रव्याणि कति, कानि च तानि ?— तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव । पदकृत्यम् ᴬसुखेनानायासेन बोधाय पदार्थतत्त्वज्ञानायेत्यर्थः । तर्क्यन्ते प्रमितिविषयी- क्रियन्ते इति तर्का द्रव्यादिपदार्थास्तेषां सङ्ग्रहः सङ्क्षेपेणोद्देशलक्षणपरीक्षा यस्मिन् स ग्रन्थः । नाममात्रेण वस्तुसंकीर्तनमुद्देशः, यथा द्रव्यं गुण इति । असाधारणधर्मो लक्षणम्, यथा गन्धवत्त्वं पृथिव्याः । लक्षितस्य लक्षणं सम्भवति न वेति विचारः परीक्षा । अत्रोद्देशस्य पक्षज्ञानं फलं, लक्षणस्ये- तरभेदज्ञानं, परीक्षाया लक्षणे दोषपरिहार इति मन्तव्यम् । १. तत्रेति । तत्र सप्तपदार्थमध्ये इत्यर्थः । द्रव्याणि नवैवेत्यन्वयः । एवं तत्रेति पदं चतुर्विंशतिर्गुणा इत्यादिनाऽप्यन्वेति । ᴮद्रव्यत्वजातिमत्त्वं, गुण- वत्त्व, समवायिकारणत्वं वा द्रव्यसामान्यलक्षणम् । हिन्दी A. “सुखबोधाय” का अर्थ है—बिना श्रमके द्रव्यादि-पदार्थोंका तत्त्वज्ञान करानेके लिये । प्रमाणके द्वारा अवगत किये जानेवाले द्रव्य आदि पदार्थ ही यहाँ “तर्क” हैं, उनका संग्रह अर्थात् संक्षेपसे उद्देश, लक्षण और परीक्षा होनेसे इस ग्रन्थका नाम तर्कसंग्रह है । केवल नाम द्वारा वस्तुके उल्लेखको उद्देश कहते हैं, जैसे-द्रव्य गुण कर्म इत्यादि । वस्तुमें रहनेवाले असाधारण धर्मको लक्षण कहते हैं, जैसे—केवल पृथिवीमें रहने वाला गन्धवत्त्वधर्म पृथिवीका असाधारण ( निज ) धर्म होनेसे पृथिवीका लक्षण है । पृथिवी आदि लक्षित पदार्थका गन्धवत्त्व आदि लक्षण हो सकता है या नहीं—इस प्रकारके विचारको परीक्षा कहते हैं । पदार्थोंके उद्देश अर्थात् नामनिर्देशका फल है— पक्षका ज्ञान होना । पक्षमें इतरभेदका ज्ञान कराना लक्षणका फल है । जैसे— गन्धवत्त्व-लक्षणसे पृथिवीमें जलादिसे भेदका ज्ञान हो सकता है । लक्षणमें दोषका निवारण करा देना परीक्षाका फल है । १. तत्र अर्थात् सात पदार्थोंके अन्तर्गत पृथिवी जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा आत्मा और मन ये नव ही द्रव्य हैं । इस प्रकार तत्रपदका सम्बन्ध आगे भी “चतुर्विंशतिर्गुणाः “पञ्च कर्माणि” इत्यादिके साथ है । अर्थात् उक्त सात पदार्थोंमें गुण रूप रस आदि चौबीस हैं, कर्म उत्क्षेपण आदि पाँच हैं, इत्यादि ।