तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - २ लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥ वैक्रियिक शरीर [ लब्धिप्रत्ययं च ] लब्धि-नैमित्तिक भी होता है। Attainment is also the cause (of its origin). तैजसमपि ॥४८॥ [ तैजसम् ] तैजस शरीर [ अपि ] भी लब्धि-नैमित्तिक है। The luminous body also (is caused by attainment). शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥४९॥ [ आहारकं ] आहारक शरीर [ शुभम् ] शुभ है अर्थात् वह शुभ कार्य करता है [ विशुद्धम् ] विशुद्ध है अर्थात् वह विशुद्धकर्म (मंद कषाय से बंधने वाले कर्म) का कार्य है। [ च अव्याघाति ] और व्याघात-बाधारहित है तथा [ प्रमत्तसंयतस्यैव ] प्रमत्तसंयत (छठवें गुणस्थानवर्ती) मुनि के ही वह शरीर होता है। The projectable body, which is auspicious and pure and without impediment, originates in the saint of the sixth stage only. 33