भारतकोश
तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 118 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

मृदुभाषिता महाराज कृष्णदेव राय वृद्ध हो चले थे। उनका वंश उन दिनों बहुत प्रतापी समझा जाता था। स्वयं कृष्णदेव राय की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। विजयनगर की प्रजा अपने महाराज के प्रति अगाध श्रद्धा रखती थी। महाराज कृष्णदेव राय ने भी जीवनपर्यन्त अपनी प्रजा की भलाई के लिए कार्य किया था। जगह-जगह प्याऊ बनवाए, कुएँ खुदवाए, नहरें खुदवाईं। तीज-त्योहार के अवसरों पर प्रजा के बीच आवश्यक वस्तुएँ बँटवाईं। ऐसा प्रजापालक उस काल में कोई दूसरा राजा नहीं था। लेकिन इतनी ख्याति और सम्मान अर्जित करने के बाद भी महाराज कृष्णदेव राय दुखी थे। स्थिति ऐसी थी कि वे अपना दुख किसी से व्यक्त भी नहीं कर पाते थे। महाराज का दुख अपने जामाता (दामाद) के कारण था। उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह बहुत धूमधाम से किया था। विवाह से पूर्व उन्होंने अपने जामाता के विषय में पूरी जानकारी खुफिया विभाग से कराई थी। उनका जामाता बहुत शिक्षित था। शास्त्रों का अध्ययन किया था उसने और अल्पवय में ही शास्त्री की उपाधि प्राप्त कर ली थी। अस्त्रा-शस्त्रा संचालन की कला में वह माहिर था। घुड़सवारी में वैसे ही पारंगत। शरीर से बलवान। सच्चरित्र। इतने गुणों के बाद भी उनके किसी भी सम्बन्धी को उनका जामाता प्रिय नहीं लगा। विवाह के कुछ दिनों के बाद ही उनकी पुत्री दुखी रहने लगी। अपनी पुत्री के दुखी रहने के बारे में जब महाराज को जानकारी मिली तो वे बेचैन हो उठे और विजयनगर में एक राजसी महोत्सव आयोजित कर अपनी पुत्री और जामाता को इस अवसर पर विजयनगर आने का आमंत्रण दिया। नियत तिथि को महाराज कृष्णदेव राय के आमंत्रण पर उनके बेटी- दामाद विजयनगर पहुँचे। महोत्सव तो उन्हें बुलाने का बहाना था। महाराज ने बेटी-दामाद के आगमन के बाद महोत्सव को स्मरणीय बनाने के लिए राज्य भर के कलाकारों को जुटाया। आनन्द की मानो हर ओर वृष्टि हो रही थी। महाराज ने बहुत गम्भीरता से अपने दामाद के कार्य- कलापों का अध्ययन भी किया। उन्हें अपने दामाद में कोई कमी दिखाई नहीं दी। महोत्सव के समापन के बाद उन्होंने अपनी पुत्री से पीड़ित रहने का कारण जानना चाहा तब पुत्री ने बताया कि वह अपने पति के कटु वचनों से आहत होती है। ऐसे तो उसके प्रति उसके पति का व्यवहार ठीक है मगर वह कड़वा सच बोलने का अभ्यासी है। उसके इस अभ्यास के कारण उससे सभी घबराते हैं। महाराज को पुत्री की पीड़ा का कारण समझ में आ गया। दूसरे दिन महाराज ने अपने दामाद को स्नेहपूर्वक बुलाकर अपने पास बिठाया और कहा, “पुत्र! अब मैं वृद्ध हो चला हूँ। राज-काज संभालते हुए वर्षों बीत चुके हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम इसी तरह महीने-दो महीने के लिए आ जाया करो ताकि इस राज्य के बारे में भी