तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतुम्हें आवश्यक ज्ञान हो जाए।” महाराज की बात सुनकर उनके दामाद ने बहुत ही निद्वन्द्व भाव से कहा, “श्वसुर जी! वृद्ध तो सभी होते हैं। जो जन्मा है वह हमेशा शिशु तो नहीं रहेगा...बड़ा होगा और अपना दायित्व सँभालेगा और एक दिन वृद्ध भी होगा और मरेगा भी। इसमें ऐसी कोई बात नहीं है कि आप अपने दायित्व के निर्वाह के लिए मुझसे सहयोग की अपेक्षा रखें। मेरी अपनी दिनचर्या और अपने दायित्व हैं।” अपने दामाद की बात सुनकर महाराज अचरज में पड़ गए। उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी पुत्री ठीक ही कह रही थी। मन-ही-मन चिन्तित रहते हुए उन्होंने दामाद से थोड़ी देर तक सामान्य औपचारिकता की बातें कीं और फिर उससे विश्राम करने को कहकर स्वयं अपने कक्ष में चले गए। उनकी व्याकुलता बढ़ चली थी। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे अपनी पुत्री की समस्या का समाधान करें तो कैसे करें। वे अपनी पुत्री को बहुत प्यार करते थे इसलिए उसकी परेशानी से और भी परेशान हो उठे थे। महाराज का मन कहीं भी नहीं लग रहा था। दरबार में भी उनका वही हाल रहा। मन में अवसाद हो तो कहीं भी, कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। तेनाली राम महाराज की मनःस्थिति का अनुमान लगा चुका था। महाराज किस प्रकार की चिन्ता में हो सकते हैं - इस बात का अनुमान वह नहीं लगा पाया था। दरबार सम्पन्न होने के बाद जब सारे सभासद लौट गए तब तेनाली राम ने महाराज के पास जाकर उनसे उनकी बेचैनी का कारण पूछा। अब तक तेनाली राम महाराज का अन्तरंग हो चुका था। दरबार में उसकी हैसियत भले ही विदूषक की थी किन्तु अब वह महाराज का अनन्य सलाहकार भी बन चुका था। महाराज ने तेनाली राम को अपनी पुत्री की व्यथा-कथा और दामाद की कटु वाणी के बारे में पूरी बातें बता दीं। इससे महाराज का मन हलका हुआ। उन्हें विश्वास था कि समस्या उचित व्यक्ति तक पहुँच गई है और अब उसका समाधान भी सहजता से हो जाएगा। तेनाली राम ने महाराज को दिलासा दिया कि जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जाएगा, और महाराज से विदा लेकर अपने घर लौट आया। महाराज दरबार में बैठे थे। दरबार की कार्रवाई सम्पन्न हो चुकी थी। सभी सभासद जा चुके थे। प्रहरीगण इस बात की प्रतीक्षा में थे कि महाराज विश्राम के लिए भवन जाएँ तब वे भी दरबार का द्वार बन्द कर अपने घरांठे की ओर प्रस्थान करें। महाराज अपने सिंहासन पर बैठे विचार कर रहे थे। तीन दिन हो गए तेनाली राम से पुत्री और जामाता के सन्दर्भ में बातें किए। मगर अब तक तेनाली राम ने कुछ किया नहीं। महाराज विचारमग्न भी थे और उदास भी क्योंकि उन्हें कोई दूसरा उपाय भी समझ में नहीं