तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 118 में से
संदर्भ में पढ़ेंआ रहा था। आज सुबह ही हुई एक घटना से महाराज की चिन्ता बढ़ गई थी। सुबह कोई काम करते समय उनकी पुत्री की हथेली में काँटा चुभ गया जिसकी पीड़ा से वह चीख पड़ी। चीख इतनी तेज थी कि महाराज अपने कक्ष से बाहर निकल आए किन्तु पुत्री के पास ही एक आसन पर विराजमान उनका दामाद अपने स्थान से हिला भी नहीं और आसन पर बैठे-बैठे ही बोला, “चीखने से काँटा नहीं निकलेगा। असावधान रहकर कुछ भी करोगी तो ऐसे ही परिणाम सामने आएँगे। भविष्य में सावधान रहना सीखो। सुना नहीं है-सतर्कता गई, दुर्घटना हुई।“ उनकी पुत्री ने अपनी हथेली से काँटा निकालने का प्रयास करते हुए कहा, “कितने संवेदनहीन हो तुम!” “मैंने कुछ भी अन्यथा नहीं कहा। तुम असावधान थीं इसलिए काँटा चुभा। इसमें संवेदनहीनता कहाँ से आ गई! दर्द तुम्हें हो रहा है। उसके परिणामस्वरूप तुम्हें किसी की शान्ति भंग करने का अधिकार तो नहीं मिल गया। भविष्य में कुछ भी करो तो सावधान होकर।” महाराज के दामाद ने कहा। महाराज ने देखा, उनकी पुत्री सिसकते हुए अपनी हथेली से काँटा निकालने का प्रयास कर रही है और उनका दामाद अपने स्थान पर बैठा एक पुस्तक पढ़ रहा है। उन्होंने उन दोनों के बीच हुए संवादों को भी सुना था। उनकी चिन्ता का कारण भी यही था। महाराज को समझ मंे नहीं आ रहा था कि अपने दामाद को लोक-व्यवहार का ज्ञान कैसे दें। बातें उसने ठीक कही थीं। उसकी नसीहत भी समयानुकूल थी। मगर उसका व्यवहार स्थिति विशेष के अनुरूप नहीं था। अपने सिंहासन पर बैठे महाराज के मन मंे ऊहापोह् के बादल मँडरा रहे थे। महाराज अपनी पुत्री से बहुत प्यार करते थे इसलिए वे चाहते थे कि उसके पति को सीधे कुछ कहे बिना ही लोक-व्यवहार की शिक्षा दी जाए। मगर कैसे? यही बात महाराज की समझ में नहीं आ रही थी। महाराज को बार-बार तेनाली राम का स्मरण हो रहा था। मन में तरह- तरह की आशंकाएँ उठ रही थीं। एक शंका यह भी थी कि कहीं तेनाली राम उनकी समस्या ही न विस्मृत कर बैठा हो। जब मन मंे शंका उठती है तो श्रद्धा के पात्र के प्रति भी अश्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाता है। महाराज के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने तत्काल प्रहरियों को बुलाकर निर्देश दिया कि तेनाली राम जहाँ कहीं भी हों, उन्हें अविलम्ब महल में मेरे समक्ष उपस्थित होने की सूचना दो। रात्रि के प्रथम प्रहर में तेनाली राम महाराज के निर्देशानुसार उनके महल में उपस्थित था। वह अपने साथ एक थैला भी लेकर आया था। महाराज ने जब तेनाली राम को देखा तो उनके हृदय की शंका का स्वतः निवारण हो गया। उन्होंने तेनाली राम को अपने पास बैठाया और सुबह की घटना उसे सुना दी।