तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसमय हो जाएँगी। इन लोगों को कारागार में डालने का निर्देश दें। इनसे बरामद हुई गायों को राज्य की गोशाला में रखने की व्यवस्था करा दें। भविष्य में गायें इन बदमाशों के अपराध का साक्ष्य बनेंगी। इन गायों के वास्तविक स्वामियों का नाम-पता आदि सुरक्षा अधिकारी की पंजी में है। शेष बातें मैं बाद में करूँगा। अभी मुझे कुछ विशेष कार्य करने हैं जो राज्य-हित में परम आवश्यक है इसलिए मुझे अनुमति दें!” महाराज कृष्णदेव राय कोई प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाते, उससे पूर्व ही तेनाली राम मुड़कर तेजी से दरबार के बाहर चला गया। दरबार में थोड़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा। रस्सी में बँधे लोगों के आर्त स्वरों से यह सन्नाटा टूटा, “महाराज! दुहाई हो महाराज! दुहाई!” महाराज कृष्णदेव राय ने पूछा, “क्या कहना चाहते हो?” “महाराज, हम लोग पड़ोसी राज्य के ‘सप्तद्वीप नवखंड’ के मवेशी व्यापारी हैं। आपके राज्य में आकर हम पहली बार मवेशी खरीद रहे थे कि हमें गिरफ्तार कर लिया गया। महाराज, हमने कोई अपराध नहीं किया है। हम ग्रामीणों द्वारा बताए गए मूल्य पर ही उनसे उनकी गायें खरीद रहे थे कि हमें पकड़ लिया गया और हमसे खरीदी गईं गायें छीन ली गईं! महाराज, न्याय करें!” महाराज कुछ कहते कि महामंत्री ने अपने आसन से उठकर प्रश्न किया, “तुम सप्तद्वीप नवखंड के मवेशी व्यापारी हमारे राज्य में मवेशियों के व्यापार के लिए कैसे आ गए? तुम्हारे राज्य में तो व्यापारियों के प्रवेश पर शुल्क लिया जाता है...फिर दूसरे राज्यों के समान सुविधा तुम निःशुल्क कैसे प्राप्त कर सकते हो?” “...महाशय! आपके राज्य में विधि-सम्मत दृष्टि से किसी भी तरह के प्रवेश शुल्क का निर्धारण नहीं हुआ है...यदि होता तो हम वह वैधानिक शुल्क अवश्य चुकाते।” महाराज कृष्णदेव राय को उस व्यक्ति का उत्तर किसी राज्य के सामान्य नागरिक का उत्तर नहीं लगा। उन्होंने महामंत्री को मौन हो जाने का संकेत किया और सुरक्षा अधिकारी को निर्देश दिया, “गिरफ्तार लोगों को कारागार में डाल दिया जाए। तेनाली राम की उपस्थिति में ही उनके अपराध अथवा दंड के बारे में कोई चर्चा होगी।” तीन दिनों के बाद महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक विचित्र दृश्य देखने को मिला। भरे दरबार में पाँच महिलाओं और पाँच पुरुषों को सुरक्षाकर्मियों ने उपस्थित किया। इन सबके हाथ पीछे की ओर बँधे थे। महाराज के सामने उपस्थित होते ही ये लोग दुहाई-दुहाई चिल्लाने लगे। महिलाएँ विलाप करने लगीं। उनके बिलखने से पूरा दरबार हतप्रभ रह गया। महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में इससे पहले कभी भी ऐसा दृश्य उपस्थित नहीं हुआ था। महाराज कुछ कहते या फिर दरबारियों से कोई प्रतिक्रिया उभरती, उससे पहले ही तेनाली राम ने दरबार में प्रवेश किया और अपने आसन पर बैठ गया।