तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
चले गए। तेनाली राम ने समझ लिया कि महाराज वहाँ से आवेश में गए हैं और उसे मालूम था कि महाराज का आवेश जल्दी जाता नहीं है। तेनाली राम ने उस महिला और बच्चे को वैद्य से दिखलाकर उन्हें विदा किया और राजभवन जाने की बजाय अपने घर लौट आया। बहुत देर तक चिन्तन-मनन करने के बाद वह एक निष्कर्ष पर पहुँचा और अपने निष्कर्ष के अनुरूप कुछ करने के लिए सक्रिय हुआ। उसने एक योजना का प्रारूप भोजपत्र पर तैयार किया। प्रारूप तैयार हो जाने के बाद उसने उसे फिर से देखा, मनन किया। इसके बाद उसने कपड़े बदले। घोड़ा निकाला और विजयनगर से बाहर निकलकर सुन्दर घाटी पहुँचा। सुन्दर घाटी एक ऐसा राज्य था जहाँ के कलाकारों को दूर-दूर तक प्रसिद्धि प्राप्त थी। तेनाली राम ने वहाँ एक प्रसिद्ध नाट्य संस्था के संचालक से भेंट की तथा उसे अपनी योजना समझाई फिर उसे कुछ मुद्राएँ भेंट करते हुए कहा कि कार्यक्रम के बाद आपके सभी कलाकारों को मेरी ओर से विशेष पुरस्कार भी मिलेगा और यह पुरस्कार यादगार भी होगा और पारिश्रमिक भी। दो दिनों के बाद ही विजयनगर में नववर्ष महोत्सव होना था। महाराज ने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी स्वयं अपनी देखरेख में सारी तैयारियाँ करवाई थीं। उन्हें कई स्थलों पर तेनाली राम की आवश्यकता महसूस हुई। तेनाली राम उस दिन से ही लापता था जिस दिन महाराज के घोड़े की चपेट में आकर एक महिला और उसका बच्चा चोटिल हो गया था। पहले तो महाराज को तेनाली राम के इस तरह गायब होने से बहुत क्रोध आया लेकिन जब उसके गायब हुए दो दिन हो गए तब उन्हें भी अपनी भूलों का अहसास होने लगा। उन्होंने मन-ही-मन स्वीकार किया कि उस दिन उनका आचरण न तो भद्रजन जैसा था और न ही शासकोचित। उस महिला के साथ उन्होंने जो व्यवहार किया, वह अहंकारजनित आचरण ही कहा जाएगा। ऐसा विचार कर महाराज ने तेनाली राम को बुलाने के लिए सेवक को भेजा। सेवक ने लौटकर सूचना दी कि तेनाली राम दो दिन पहले घोड़े से कहीं गए हैं तथा अभी तक नहीं लौटे हैं। उनके घर में उनके इस तरह बिना किसी सूचना के कहीं चले जाने को लेकर परिजन चिन्तित हैं। यह सूचना मिलने पर महाराज और चिन्तित हो गए। उसी दिन महाराज के पास दो कलाकार आए। उन्होंने महाराज से बताया कि वे सुन्दर घाटी से आए हैं। हरियाली से भरे अपने राज्य के कलाकारों का एक कार्यक्रम विजयनगर के नववर्ष महोत्सव के खुले मंच पर करना चाहते हैं। महाराज को उन कलाकारों ने बताया कि उनका कार्यक्रम पीड़ित मानवता की सेवा का सन्देश देगा।
महाराज ने उन्हें स्वीकृति प्रदान कर दी क्योंकि यह खुला मंच था ही राज्य के बाहर से आए अपने-अपने क्षेत्र के महान कलाकारों के लिए या ऐसे कलाकारों के लिए जो अपनी कला के माध्यम से समाज को कोई सन्देश देने का संकल्प लेते हों। अन्ततः विजयनगर का नववर्ष महोत्सव प्रारम्भ हो गया। ऐसा सम्भवतः वर्षों बाद हुआ जब महोत्सव में तेनाली राम शामिल नहीं हुआ। ऐसे सभासद, जो तेनाली राम की विद्वत्ता से ईर्ष्या करते थे, वे भी उसकी अनुपस्थिति का कारण जानने को उत्सुक थे तथा जो उसके प्रशंसक थे, वे भी। महाराज की विवशता थी कि वे तेनाली राम के सन्दर्भ में कुछ कर नहीं सकते थे...बस, उन्होंने अपने खुफिया तंत्र को उसके बारे में पता करने का निर्देश दे दिया था। महोत्सव स्थल पर खुला मंच का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। जब सुन्दर घाटी के कलाकारों का कार्यक्रम आरम्भ हुआ तब उसके संचालक ने एक पंक्ति की घोषणा की, ‘किसी को पतित या कमजोर समझकर उसकी उपेक्षा मत करो क्योंकि ये वैसे लोग हैं जो अभी उठे नहीं हैं।’ रंगमंच से पर्दा हटने पर सबके सामने हरियालियों से सजा एक दृश्य आया। ‘सुन्दर घाटी का यह सौन्दर्य इसकी हरियाली और सुन्दर फूल- पत्तियों के कारण है।’ दृश्य के साथ यह पार्श्व ध्वनि सुनाई पड़ी। पार्श्व ध्वनि में आगे सुना गया, ‘सुन्दर घाटी में बसनेवाले कलाकार सम्पूर्ण धरा को हरियाली से आच्छादित करना चाहते हैं...उनकी चाहत की पवित्रता का परिणाम ही है कि वहाँ लौह दंड के सहारे तपस्या करनेवाले ऋषि को अपनी तपस्या की पूर्णता का भान तब होता है जब उसके तप के प्रभाव से उसके लौह दंड पर भी फूल-पत्ते उग आते हैं। सुन्दर घाटी के कलाकारों का हृदय इतना कोमल और निष्पाप है कि उसके प्रभाव से वहाँ पवित्रता का ढोंग निष्प्रभावी हो जाता है।’ पार्श्व ध्वनि के साथ ही मंच पर एक ऋषि को लौह दंड के सहारे तपस्या करते दिखाया गया और ध्वनि प्रभाव से यह दर्शाया गया कि बहुत वर्ष गुजर गए और ऋषि के लौह दंड में पुष्प खिल गए, हरी-भरी पत्तियाँ आ गईं। तभी वहाँ एक राजा हाथ में लौह दंड लिये आया और संकल्प लियादृ‘जिस तरह ये महर्षि कठोर तप करके अपना जीवन सार्थक कर रहे हैं, उसी तरह मैं भी कठोर तप करके अपना जीवन सार्थक करूँगा।’ और वह राजा उसी महर्षि के पास लौह दंड गाड़कर तपस्या करने लगा। इसके बाद मंच पर तूफान और घनघोर वर्षा का दृश्य पैदा हुआ। राजा और ऋषि इस प्राकृतिक आपदा से बेखबर, तपस्या में लीन रहे। उसके बाद मंच पर अचानक एक दीन-हीन व्यक्ति काँपता हुआ आया। वह वर्षा से भीगा हुआ, कमजोर और बीमार था। वह ऋषि के पास जाकर गिड़गिड़ाया कि वे उसे कहीं सिर छुपाने की जगह बता दें। ऋषि अपनी तपस्या में लीन रहा और जब वह व्यक्ति ऋषि को झकझोरकर उससे सिर छुपाने की जगह बताने के लिए गिड़गिड़ाया तो महर्षि ने उसे धक्का देकर परे ठेल दिया और फिर अपनी तपस्या में लीन हो गया। फिर वह व्यक्ति तपस्या में लीन राजा के पास गया और राजा के पास जाकर गिड़गिड़ाया। राजा ने
अपनी आँखें खोल दीं और उस व्यक्ति की दीन-हीन दशा देखकर तपस्या से उठ खड़ा हुआ। राजा ने उस व्यक्ति को गोद में उठाया और बारिश में भीगते हुए उसे पास की एक कुटिया में ले गया। वहाँ उसने कुछ औषधीय पौधों के पत्ते तोड़े और उसका अर्क निकालकर उस व्यक्ति को पिलाया जिससे वह व्यक्ति स्वस्थ हो गया। इसके बाद राजा अपने तप स्थल पर आया और पद्मासन की मुद्रा में आ गया। दर्शकों ने यह देखकर तालियाँ बजाईं कि राजा के लौह दंड में हरे पत्ते और गुलाबी फूल खिलने लगे तथा ऋषि के लौह दंड के फूल-पत्ते मुरझा गए। फिर पाश्र्व ध्वनि गूँजी, ‘राजा प्रजा-पालक होता है। जो राजा अपनी गरीब प्रजा की सहायता को तत्पर रहता है, उसे उसका पुण्य तपस्या के फल के समान ही मिलता है।” सन्देशों से भरी इस छोटी-सी नाटिका को महाराज कृष्णदेव राय ने भी देखा तथा उसमें निहित सन्देश से प्रभावित हुए। उन्होंने उस मंच के अन्य कार्यक्रमों को भी देखा लेकिन सुन्दर घाटी के कलाकारों के दल के द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम को भूल नहीं पाए। निर्णायक-मंडल ने जब सुन्दर घाटी के कार्यक्रम में निहित सन्देश को श्रेष्ठ माना और सुन्दर घाटी के दल को विजेता घोषित किया तब महाराज ने भी तालियाँ बजाईं। पुरस्कार वितरण के दौरान महाराज ने जो संक्षिप्त वक्तव्य दिया उसमें उन्होंने तेनाली राम को याद करते हुए कहा ”सुन्दर घाटी के कलाकारों की तरह ही तेनाली राम पीड़ित मानवता की सेवा करने की आवश्यकता समझते रहे।“ फिर महाराज ने कहा, ”तेनाली राम हमारे दरबार के विदूषक ही नहीं, मेरे अनन्य मित्र हैं। आज वे यहाँ होते तो इस लघु नाटिका को देखकर उन्हें प्रसन्नता होती...मगर मेरी ही एक भूल...।” महाराज की पंक्ति पूरी नहीं हो पाई थी कि कलाकारों के दल के बीच से एक व्यक्ति, ऋषि की दाढ़ी अपने चेहरे से उतारता हुआ रंगमंच पर पहुँच गया, “बस, महाराज, आगे की पंक्ति मुझे कहने दें!” कहता वह व्यक्ति जब महाराज के पास पहुँच गया तब महाराज के मुँह से हर्ष ध्वनि निकली, ”तेनाली राम! कहाँ चले गए थे?“ उन्होंने तेनाली राम को अपनी भुजाओं में ले लिया। ...और तेनाली राम ने पंक्ति पूरी की, ”हाँ, एक भूल ने मुझमें छुपे कलाकार को मंच पर आने का अवसर दिया।“ महाराज ने गद्गद होकर अपने गले से मोतियों की माला उतारी और तेनाली राम के गले में डाल दी। इसके बाद विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय अपनी प्रजा के प्रति और उदार हो गए। गरीबों के उत्थान के लिए उनके राज्य में कई कार्यक्रम आरम्भ हुए जिससे विजयनगर का यशोगान दूसरे राज्यों तक भी पहुँचा।
तेनाली राम का न्याय महाराज कृष्णदेव राय अपने सभासदों के साथ अपने राजदरबार में बैठे थे। किसी विषय पर बहस चल रही थी। महाराज गौर से सभासदों के विचार सुन रहे थे। इसी बीच एक गरीब व्यक्ति फरियादी के रूप में दरबार में उपस्थित हुआ और महाराज के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। महाराज ने उसकी तरफ देखा तो वह सिसकते हुए बोला, “महाराज! फरियादी हूँ। आपके पास अपनी फरियाद लेकर आया हूँ।” महाराज ने उससे कहा, “बोलो! तुम्हारी क्या फरियाद है और तुम क्या चाहते हो?” “महाराज! मैं गड़रिया हूँ। भेड़-बकरियाँ पालना मेरा पुश्तैनी धन्धा है। मेरे परिवार का भरण-पोषण इन्हीं भेड़-बकरियों से होता है। मेरे पड़ोस में एक व्यक्ति पक्के मकान में रहता है। वह साधन-सम्पन्न होते हुए भी मुझसे ईर्ष्या रखता है। इसी ईर्ष्या के कारण उसने मेरी झोंपड़ी से सटाकर अपनी जमीन में ऊंची दीवार खड़ी करवा ली कि मेरी बकरियाँ उसके अहाते में चरने न जा सकें। कल तेज बारिश में उसकी वह दीवार ढह गई और दीवार के मलवे में दबकर मेरी दस बकरियाँ मर गईं। मुझ गरीब को इससे बहुत हानि हुई है जिसकी भरपाई होनी चाहिए, नहीं तो मेरा परिवार चलाना कठिन हो जाएगा।” महाराज कुछ बोलते, उससे पहले ही तेनाली राम ने कहा, “इस घटना में तो नुकसान की भरपाई उसे करनी चाहिए जिसकी दीवार गिरी है।” “जी हाँ, महाराज! मुझे न्याय मिल जाए। इसी आशा में मैं हाथ जोड़े खड़ा हूँ।” फरियादी ने कहा। महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! इस फरियादी की व्यथा-कथा सुनकर तुम जो भी उचित हो, करो।” “जैसी आज्ञा महाराज!“ तेनाली राम ने कहा और प्रहरी को भेजकर उसने फरियादी के पड़ोसी को दरबार में बुलवा लिया। तेनाली राम ने फरियादी के पड़ोसी से कहा, “तुम्हारे मकान की दीवार ढहने से इस व्यक्ति की दस बकरियाँ मर गईं। इसको हुई इस अप्रत्याशित क्षति की भरपाई तो तुम्हें करनी होगी।“
उस व्यक्ति ने तेनाली राम के आगे अपने हाथ जोड़ लिये और कहा, “आपका आदेश सिर आँखों पर, लेकिन श्रीमान, आप इतना तो विचार करें कि दीवार मैंने बनाई नहीं, बनवाई है! दीवार गिरने से मुझे भी तो क्षति हुई है। मेरी क्षतिपूर्ति कौन करेगा? दीवार गिरने का कारण तो अपर्याप्त गारे से ईंटों का जोड़ा जाना ही होगा। इसलिए दीवार गिरने के लिए मैं नहीं, उसे बनानेवाला दोषी है।” तेनाली राम ने उस व्यक्ति से कहा, “तुम ठीक कहते हो। दीवार गिरने से तुम्हें भी क्षति हुई है और इसके लिए भी वह कारीगर जिम्मेदार है जिसने दीवार बनाई है।” तेनाली राम ने आदेश दिया कि दरबार में कारीगर को बुलाया जाए। थोड़ी ही देर में दो सिपाही कारीगर को भी दरबार में पकड़कर ले आए। तेनाली राम ने उस कारीगर को दीवार गिरने की घटना बताई और कहा, “दीवार गिरने से हुई क्षति की भरपाई उसे ही करनी होगी।” तब कारीगर ने कहा, “दीवार गिरने की घटना के लिए वह जिम्मेदार नहीं है। असल में गारा बनाते समय भिश्ती ने जिस मशक से पानी डाला, उस मशक की माप सही नहीं थी जिसके कारण अधिक पानी पड़ने से गारा गीला हो गया और दीवार कमजोर बनी।” दरबार में फिर भिश्ती को भी बुलाया गया। भिश्ती पर जब दीवार गिरने का दोष मढ़ा गया तब भिश्ती रो पड़ा। उसने रोते-रोते कहा, “महाराज! मुझ पर अन्याय न हो! मशक तो मैंने बनाई नहीं। जो मशक मैंने माँगी, इसे बनाने और बेचनेवाले ने मुझे यह मशक देकर झूठ बोला कि जिस माप की मशक मैंने माँगी थी उसने उसी माप की मशक मुझे बेची है और मुझे यह मशक इसी व्यक्ति ने बेची थी जिसकी बकरियाँ दीवार ढहने से मरी हैं।” तेनाली राम ने फरियादी की ओर देखा। फरियादी हाथ जोड़े बोला, “जी हाँ। मशक मैंने ही बेची थी। मुझे क्षमा कर दें।” तेनाली राम ने उससे कहा, “भविष्य में झूठ बोलकर सामान मत बेचना , जाओ, घर जाओ।” फरियादी अपना-सा मुँह लेकर अपने घर लौट आया।
कारगर तरकीब तेनाली राम अपनी मेधा के बूते विजयनगर के दरबार का सबसे लोकप्रिय सभासद बन चुका था। एक साधारण विदूषक ने इतनी तरक्की कर ली थी कि उसके सहकर्मी सभासद उससे ईर्ष्या करने लगे थे। तेनाली राम को किसी चीज का अभाव नहीं था। प्रायः दरबार में महाराज उसकी बातों से प्रसन्न होकर उसे कुछ-न-कुछ देते रहते थे। सहकर्मियों की ईर्ष्या का यही कारण था। एक दिन दरबार में इस बात की चर्चा आरम्भ हो गई कि कोई किसी को कितनी बार मूर्ख बना सकता है-एक बार, दो बार या बार-बार? अधिकांश सभासदों की राय थी कि कोई भी व्यक्ति किसी को एक बार तो मूर्ख बना सकता है, बार-बार नहीं। इस चर्चा में सभी सभासद बढ़-चढ़कर भाग ले रहे थे मगर तेनाली राम इस चर्चा के प्रति उदासीन था और चुपचाप अपने आसन पर बैठा हुआ था। महाराज कृष्णदेव राय स्वयं इस चर्चा में रुचि ले रहे थे। अचानक उनका ध्यान इस बात की ओर गया कि तेनाली राम इस चर्चा में भाग नहीं ले रहा है तथा उदासीन भाव से अपने आसन पर इस तरह बैठा हुआ है मानो इस चर्चा का कोई अर्थ ही न हो! सारा दरबार एकमत हो गया कि कोई भी व्यक्ति किसी को एक बार ही मूर्ख बना सकता है। स्वयं महाराज ने यह बात निष्कर्ष के रूप में कही। मगर तेनाली राम तब भी शान्त रहा। शेष सभासद महाराज की हाँ में हाँ मिलाते रहे। जब महाराज ने देखा कि इस चर्चा के निष्कर्ष तक पहुँचने के बाद भी तेनाली राम शान्त है तब उन्होंने पूछा, "क्या बात है तेनाली राम! तुम चुप क्यों हो? क्या तुम नहीं मानते कि कोई भी किसी को एक बार ही मूर्ख बना सकता है?" तेनाली राम कुछ बोलता, उससे पहले ही सारे सभासद हँस पड़े और उनमें से एक ने कटाक्ष किया, "महाराज, तेनाली राम विद्वान हैं और वे हम सबको एक बार में मूर्ख बना सकते हैं, ऐसे में वे हमारी बात से सहमत क्यों होंगे?" महाराज हँसते हुए पूछ बैठे, "क्या सचमुच ऐसा है तेनाली राम? तुम एक बार में हम सबको मूर्ख बना सकते हो?" तेनाली राम ने विनम्रतापूर्वक कहा, "महाराज! मैं ऐसा कोई दावा कैसे कर सकता हूँ? आप अन्नदाता हैं। आप स्वामी हैं और मैं सेवक हूँ। हाँ, इतना अवश्य है कि अभी जो कुछ कहा गया है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ।"
तभी एक सभासद ने कहा, “महाराज, दरबार के निष्कर्ष को नहीं मानने का अर्थ यही है कि तेनाली राम मानते हैं कि एक आदमी एक ही साथ हम सबको मूर्ख बना सकता है।” तेनाली राम को अब गुस्सा आने लगा था। उसने महसूस किया कि दरबार के सभी सभासद आज उसे निशाना बनाकर घेर रहे हैं और उसने जो नहीं कहा है, वही स्वीकार करवाना चाहते हैं। वह असल में इस तरह की व्यर्थ की चर्चा में पड़ना नहीं चाहता था जिसके कारण मौन था। महाराज उसकी चुप्पी तोड़ना चाहते थे इसलिए उन्होंने तेनाली राम से सीधा सवाल किया, “तो तेनाली राम! तुम यह मानते हो कि एक आदमी एक बार में पूरी सभा को मूर्ख बना सकता है।” अब तक तेनाली राम मन-ही-मन कुछ विचार कर चुका था। उसने आसन से उठकर कहा, “अपराध क्षमा हो महाराज! ऐसा हो सकता है।” ”ठीक है!“ महाराज ने कहा, “हमें प्रतीक्षा रहेगी। पर स्मरण रखना कि ऐसे प्रयास के समय तुम अकेले पड़ जाओगे और मेरे साथ सारे सभासद होंगे! सोचो, तब भी क्या तुम हम सबको एक साथ मूर्ख बना दोगे?” “जी हाँ महाराज!” विनम्रता से तेनाली राम ने कहा। सारे सभासद तेनाली राम के इस उत्तर से सन्न रह गए। उन्हें तेनाली राम के इस उत्तर का अनुमान ही नहीं था। उन्हें लगा कि तेनाली राम अपनी औकात भूल गया है। महाराज उसके इस उत्तर से अवश्य नाराज होंगे। तेनाली राम की अब खैर नहीं। दूसरी तरफ महाराज सोच रहे थे कि तेनाली राम में विशेष योग्यताएँ हैं। वह याद कर रहा है कि महाराज सहित सारे सभासदों को एक बार में ही मूर्ख बनाया जा सकता है तो उसके इस साहसपूर्ण उत्तर का आधार अवश्य होगा। तेनाली राम जैसा व्यक्ति कभी यूँही अपना मान रखने के लिए कुछ नहीं बोलता। यह देखना रोचक होगा कि किस प्रकार वह एक साथ सभी सभासदों को मूर्ख बनाता है। उस दिन बात आई-गई हो गई। दूसरे दिन से महाराज के दरबार में सामान्य दिनों की तरह ही काम-काज होने लगा। सभासद और महाराज तेनाली राम की बात को भूल गए। एक दिन तेनाली राम अपनी खाट झाड़ रहा था। घर में सफाई हो रही थी। खाट झाड़ने पर खाट से कुछ खटमल गिरे। खटमलों को देखकर तेनाली राम के मस्तिष्क में एक विचार कौंध गया और उसने उनमें से मोटे-मोटे खटमलों को एकत्रित कर एक छोटी डिबिया में बन्द कर लिया।
रसोई से वह एक छोटी खरल, मूसली और एक छोटी चिमटी उठा लाया। इन सारी चीजों को उसने एक थैली में रख लिया। उसके होंठों पर एक विचित्र मुस्कान तैर रही थी और आँखों में एक विशेष चमक थी। दूसरे दिन तेनाली राम अपने नियत समय से पहले बिस्तर से उठ गया और शीघ्रता से स्नान-ध्यान करके राजदरबार की ओर चल पड़ा। जिस समय वह राजदरबार पहुँचा, उस समय वहाँ कोई नहीं आया था। उसने थैली से डिबिया निकाली और उसका ढक्कन खोलकर उसमें रखे खटमल महाराज के आसन पर उलट दिए। फिर उसने डिबिया देखी। सारे खटमल महाराज के सिंहासन पर उड़ेले जा चुके थे और डिबिया खाली थी। इसके बाद तेनाली राम अपने आसन पर जा बैठा। धीरे-धीरे सभासद आने लगे। दरबार भरने लगा। थोड़ी देर बाद दरबार के सारे आसन भर गए। महाराज भी आए और सभा की कार्रवाई शुरू हो गई। सभा की कार्रवाई अभी थोड़ी देर ही चली थी कि महाराज को एक खटमल ने काट लिया। महाराज ने पहलू बदला। थोड़ी राहत महसूस की कि फिर खटमल ने उन्हें काट लिया। थोड़ी ही देर में महाराज बेचैन हो उठे। खटमलों के काटने से वे परेशान थे। उन्होंने चीखकर क्रोध-भरे स्वर में पूछा, “मेरे आसन पर खटमल कहाँ से आ गए?” एक सभासद ने कहा, “महाराज! खटमल तो कहीं से भी आ जाते हैं और आ गए तो जिस खाट-खटिया में पनाह लेते हैं, उसे छोड़ते भी नहीं। मानव रक्त ही इनका आहार होता है इसलिए ये ऐसी ही जगह पर बसेरा बनाते हैं जहाँ मनुष्य बैठता है या सोता है।” ”आपमें से कोई इन खटमलों से बचने का उपाय जानता हो तो कुछ करे।“ सभासद मौन हो गए। थोड़ी देर तक आपस में धीमे-धीमे बातें करने के बाद एक सभासद ने कहा, “सिंहासन पर गरम पानी उड़ेलने से थोड़ी राहत मिल सकती है।” महाराज खटमलों के काटने से परेशान हो उठे थे जिसके कारण उन्होंने आवेश में कहा, “राहत नहीं, छुटकारा चाहिए। स्थायी निदान बताएँ।” सभासदों को मानो साँप सँूघ गया। अब कहीं से फुसफुसाहट भी नहीं उभर रही थी। सबको मौन देखकर तेनाली राम अपने आसन से उठा, “महाराज! मेरे पास इस समस्या से मुक्ति का एक रामबाण निदान है जिसे आजमाया जाए तो खटमलों से मुक्ति मिल जाएगी। एक लगनशील व्यक्ति मेरे इस रामबाण निदान से करोड़ों खटमलों को मार सकता है।“
सभासद तेनाली राम की बात सुनकर चौंक पड़े। महाराज ने तेनाली राम की ओर अविश्वास से देखा और पूछा, “क्या ऐसा हो सकता है तेनाली राम?” ”जी हाँ, महाराज! मेरे इस रामबाण तरकीब को आजमाकर देखें। मेरी बात गलत साबित हो जाए तो मैं एक भी स्वर्णमुद्राएँ दंड के रूप में राजकोष में जमा कराने का वचन देता हूँ।” महाराज ने कहा, ”ठीक है तेनाली राम! तुम अपनी तरकीब आजमाकर दिखा दो!“ ”लेकिन महाराज! यदि मेरी तरकीब ठीक निकली तब मुझे क्या मिलेगा?“ तेनाली राम ने पूछा। महाराज ने तेनाली राम की ओर देखते हुए कहा, “मैं और इस दरबार के सारे सभासद मिलकर तुम्हें एक भी स्वर्णमुद्राएँ देंगे।” अब तेनाली राम महाराज के आसन के पास गया और आसन को थोड़ा उठाकर झटके से छोड़ा। एक-दो खटमल झटके के कारण आसन से गिरे। तेनाली राम ने अपनी थैली से चिमटी निकाली और एक खटमल को पकड़कर खरल में डाला और मूसली से उसे कुचल दिया। फिर कहा, “महाराज! यही है वह रामबाण तरकीब।“ आप चाहें तो इस तरह पकड़कर करोड़ों खटमलों को मारकर उनसे छुटकारा पा सकते हैं।“ ”अरे, यह तो ठगी है!“ महाराज ने चकित होकर कहा। तेनाली राम ने विनम्रतापूर्वक कहा, “महाराज! मैंने इस भरी सभा में जो बात कही, उसका अक्षरशः प्रयोग किया और जिस रामबाण विधि का प्रदर्शन किया उसे कोई गलत साबित नहीं कर सकता। इसलिए मैं शर्त जीत चुका हूँ। आगे आपकी इच्छा!” महाराज ने स्वीकार कर लिया कि तेनाली राम शर्त जीत चुका है तथा उसे तत्काल राजकोष से एक भी स्वर्णमुद्राएँ देने का निर्देश देते हुए उन्होंने राज्य कोषागार के प्रधान से कहा, ”सभासदों के मासिक वेतन से इसकी आधी राशि प्राप्त कर ली जाए। सभी सभासदों के वेतन से समान राशि काटी जाए, क्यों?“ उन्होंने सभासदों की ओर, उनकी सहमति जानने के लिए प्रश्न किया। सभी सभासदों ने कहा, “ठीक है महाराज! हमें स्वीकार है।”
इसके बाद पुनः अपने आसन से तेनाली राम उठा और उँचे स्वर में कहा, ”महाराज! धृष्टता क्षमा करें। कुछ दिन पूर्व इसी सभा में मुझसे प्रमाणित करने के लिए कहा गया था कि एक आदमी महाराज सहित पूरी सभा को मूर्ख बना सकता है। इसी शर्त को आज मैंने साबित किया है। मुझे इन एक भी स्वर्णमुद्राओं की कोई आवश्यकता नहीं है। कृपया अपना निर्देश वापस ले लें।“ फिर वह महाराज के आसन के पास गया और महाराज से थोड़ी देर के लिए आसन छोड़ने का अनुरोध किया। महाराज समझ गए कि तेनाली राम आसन से खटमलों का सफाया करने के लिए उपस्थित हुआ है। तेनाली राम जानता था कि खटमल थोड़ी देर पहले ही आसन पर रखे गए हैं इसलिए अभी वे अपने छुपने का स्थान नहीं बना पाए होंगे। उसने आसन पटक-पटककर खटमलों को उससे निकाला और उन्हें कुचलकर मार डाला। महाराज ने भरी सभा में तेनाली राम की मानसिक क्षमता की सराहना की, और वह एक बार फिर सभासदों पर भारी पड़ा।
पंडित का आशिष महाराज कृष्णदेव राय धर्म में आस्था रखते थे और समय-समय पर तीर्थस्थलों का भ्रमण कर वहाँ के देवालयों में पूजा-अर्चना करते थे। एक बार महाराज द्रविड़ राज्य के तीर्थस्थलों का भ्रमण करने गए। वहाँ एक देवालय में उन्हें एक तेजस्वी पुजारी के दर्शन हुए। वह पुजारी प्रकांड पंडित थे। समस्त शास्त्रों के ज्ञाता। महाराज उनसे बात कर बहुत सन्तुष्ट हुए। उनके मन के अनेक संशयों का निवारण भी इस बातचीत में हो गया। महाराज पुजारी के पास से संशय मुक्त होकर उठे और बहुत विनम्र भाव से पुजारी को कभी विजयनगर आने का न्योता दिया। पुजारी राजा कृष्णदेव राय के व्यवहार से बहुत प्रसन्न हुए और महाराज को आश्वस्त किया कि जब कभी भी उचित अवसर आएगा, वह विजयनगर अवश्य आएँगे। इस घटना के कुछ वर्ष बाद एक दिन महाराज अपने दरबार में बैठे थे। सभा की कार्रवाई चल रही थी। तभी महाराज के सामने द्वारपाल उपस्थित हुआ और बोला, “महाराज! द्रविड़ राज्य से एक त्रिपुंड्रधारी ब्राह्मण आया हुआ है और आपसे मिलने की अनुमति चाहता है।” महाराज को अपनी द्रविड़-यात्रा का स्मरण हो आया। उन्हें स्मरण हो गया कि वहाँ एक पुजारी से उन्होंने विजयनगर आने का आग्रह किया था। स्मृति में यह बात कौंधते ही महाराज अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए और अपने आसन के पास एक और आसन लगाए जाने का निर्देश देते हुए तत्पर हो गए। उन्होंने द्वारपाल को उस ब्राह्मण को आदरसहित राजदरबार में लाने का निर्देश दिया। पुजारी जब राजसभा में आए तब सभी सभासदों ने अपने आसन से उठकर उनका स्वागत किया। महाराज ने पुजारी के चरण छुए और उन्हें अपने आसन के समीप रखे गए आसन पर बैठाया। महाराज के आग्रह पर पुजारी ने सभासदों को सफलता के सूत्र बताए। पुजारी की बातें सुनकर सभासद भी आह्लादित हुए। अपना उपदेश समाप्त कर पुजारी ने महाराज से कहा, “राजन्, अब मुझे चलना चाहिए। मैं देवालयों में देव दर्शन के लिए निकला हूँ। मुझे स्मरण था कि मैंने आपको आश्वासन दिया था कि उचित अवसर पर मैं विजयनगर आऊँगा। इसलिए आपके पास आया और अपना वचन पूरा किया।” महाराज कृष्णदेव राय ने विनयपूर्वक त्रिपुंड्रधारी पुजारी को रोक लिया। महाराज ने पुजारी से कहा कि विजयनगर में भी अनेक प्रसिद्ध मन्दिर हैं, वहाँ भी पुजारी चाहें तो देव
दर्शन कर सकते हैं। महाराज के अनुरोध पर पुजारी एक सप्ताह तक विजयनगर में अतिथि के रूप में रहे। महाराज ने उनकी सेवा में अपना दो घोड़ोंवाला रथ और सारथी प्रस्तुत कर दिया था जिसके कारण पुजारी ने महाराज कृष्णदेव राय के राज्य के सभी मन्दिरों का दर्शन किया और अन्त में राजमहल के परिसर में बने मन्दिर में देव दर्शन के लिए पधारे। मन्दिर का निर्माण बहुमूल्य श्वेत प्रस्तरों से कराया गया था किन्तु पुजारी ने उसमें वास्तुदोष देखा तथा अपने निर्देशन में उस वास्तुदोष को यथाशीघ्र दूर कराने का प्रस्ताव दिया। महाराज पहले से ही पुजारी से प्रभावित थे इसलिए जब मन्दिर का वास्तुदोष दूर कराने की बात उठी तब उन्होंने सहजता से उसे स्वीकार कर लिया। अन्ततः वह दिन भी आ गया जब पुजारी जी को विदा होना था। विदाई से पूर्व महाराज ने राजभवन में त्रिपुंड्रधारी पुजारी के अभिनन्दन का कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें तेनाली राम सहित सभी सभासदों को उपस्थित रहने का विशेष निर्देश महाराज ने दिया था। त्रिपुंड्रधारी पुजारी के प्रति उपकृत भाव में महाराज ने सभासदों को सम्बोधित किया और अपने अभिनन्दन के बाद त्रिपुंड्रधारी पुजारी ने भी सभासदों को अपना कार्य एकाग्रचित्त और समर्पित भाव से करने का उपदेश दिया। महाराज ने राजकोष से त्रिपुंड्रधारी पुजारी को पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणा के रूप में अर्पित कीं। इस आदर-अनुष्ठान के बाद विदा होते समय पुजारी ने बहुत प्रसन्न होकर महाराज को आशीष दिया, “महाराज, आपके पाँव में खुजली होती रहे और आपके सभासद लगातार चिन्तातुर रहें।” पुजारी का यह आशीर्वाद सुनकर महाराज कृष्णदेव राय मानो आसमान से गिरे। सभी सभासद भौचक्के रह गए। पुजारी मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए राजभवन से बाहर जाने लगे। उन्हें स्वर्णमुद्राओं के साथ इस तरह बाहर जाता देखकर एक सभासद उग्र हो उठा और राजभवन की मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए चीख उठा, “अबे ओ ढोंगी! तू हमें और हमारे महाराज को अभिशंस कर इस तरह नहीं जा सकता। ठहर!” उसकी कर्कश चीख से महाराज की तन्द्रा भंग हुई। वे यह नहीं समझ पाए थे कि इतनी आवभगत और भरपूर दक्षिणा के बाद भी त्रिपुंड्रधारी पुजारी ने उन्हें शाप क्यों दिया? वे चूँकि उन पुजारी में आस्था रखते थे इसलिए उग्र नहीं हुए किन्तु वे उनके साथ अपने व्यवहार की मन-ही-मन मीमांसा करते रहे कि त्रिपुंड्रधारी ने उन्हें क्या कहा और क्यों कहा।
तभी त्रिपुंड्रधारी पुजारी ने मुस्कुराते हुए कोमल स्वरों में कहा, “महाराज, आपने पहली भेंट में बताया था कि आपके दरबार में ज्ञानी और विभिन्न विधाओं में पारंगत सभासद हैं। इसलिए मैंने यह आशीर्वाद दिया है। संशय में न रहो और मुझे जाने दो।” त्रिपुंड्रधारी पुजारी की राह रोकने के लिए उद्यत सभासद को तभी तेनाली राम ने कहा, “पुजारी जी के मार्ग में कोई अवरोध उत्पन्न न करो। उनके आशीष को समझो और उन्हें जाने दो!” तेनाली राम के ऐसा कहने पर सभासद पुजारी की राह से हट गया और पुजारी राजभवन से विदा हो गए। पुजारी जी की बात सुनकर महाराज खिन्न हो चुके थे इसलिए वे भी बिना कोई औपचारिकता निभाए राजभवन से बाहर चले गए। सभा विसर्जित हो गई। राजभवन से सबके चले जाने के बाद तेनाली राम भी भारी कदमों से अपने घर की ओर चल पड़ा। आज त्रिपुंड्रधारी पुजारी के बचाव के लिए आगे आने के कारण सभी सभासदों की दृष्टि में उसने अपने लिए आक्रोश देखा था। महाराज ने भी राजभवन से जाते समय उसे उपेक्षा-भरी आँखों से देखा था। तेनाली राम समझ चुका था कि पुजारी जी का बचाव करने के कारण सभी उस पर कुपित हैं। मन-ही-मन पूरे घटनाक्रम पर विचार करता हुआ तेनाली राम अपने घर पहुँचा और अनमने ढंग से हाथ-पाँव धोकर अपनी घरेलू दिनचर्या में लग गया। सुबह तक वह मानसिक रूप से राजभवन में अपने ऊपर सभासदों के सम्भावित प्रहारों और महाराज के कोप-निवारण के लिए तैयार हो चुका था। आम दिनों की तरह ही तेनाली राम प्रफुल्लित भाव से अपने आसन पर बैठा। महाराज के आने पर सभा की कार्रवाई शुरू हुई। एक सभासद ने कल राजदरबार में त्रिपुंड्रधारी पुजारी के आशीष की पंक्तियाँ सुनाते हुए कहा, “महाराज! मैं विनयपूर्वक आग्रह कर रहा हूँ कि माननीय सभासद तेनाली राम कृपापूर्वक स्पष्ट करें कि इन शापभरी पंक्तियों को उन्होंने आशीष की संज्ञा देकर उस त्रिपुंड्रधारी ढोंगी का बचाव क्यों किया?” महाराज ने भी तत्काल कहा, “हाँ, तेनाली राम! स्पष्ट करो कि पुजारी जी की बातों का तुमने क्या सार निकाला था कि सबको शाप लगनेवाली बातें तुम्हें आशीष लगीं!” महाराज गम्भीर थे। उन्होंने कहा, “वैसे वह पुजारी जी बहुत विज्ञपुरुष हैं-हो सकता है, उनकी बातों का कोई गूढ़ार्थ हो!” महाराज का आदेश मिलते ही तेनाली राम ने कहा, “महाराज! पुजारी जी की बातों का कोई गूढार्थ नहीं है। उन्होंने एक सभासद के विरोध पर यह कहा था कि आपने उनसे कहा था कि आपकी सभा में विज्ञ सभासद हैं। उन्होंने जाते-जाते सभासदों को यह बात सुनाकर उन्हें मानसिक रूप से सजग होने को कहा। पंडित जी ने अपने आशीर्वचन में यही तो कहा
था कि महाराज, आपके पाँव में खुजली होती रहे। इससे उनका तात्पर्य यह था कि आप लगातार घूम-घूमकर अपनी प्रजा का सुख-दुख जानते रहें। उनके आशीष के अन्तिम अंश का यह भाव है कि आपके सभासद लगातार चिन्तातुर रहें। इसका अर्थ भी साफ है। जिस राज्य का राजा स्वयं प्रजा के सम्पर्क में रहेगा, इससे उसके राज्य में कहीं भी कोई कदाचार या अनाचार की घटना घटेगी तो उसका ज्ञान सीधे महाराज को होगा। इससे हर क्षेत्र के सभासद हमेशा डरे रहेंगे कि कहीं भी कोई गलत बात होगी तो उसका पता महाराज को हो जाएगा। वे महाराज की सक्रियता के कारण डरे भी रहेंगे और चिन्तातुर भी। उन्हें हमेशा यह चिन्ता सताती रहेगी कि कैसे उनका कार्य निर्दोष हो। इस तरह चिन्तातुर सभासदों और सक्रिय महाराज के कारण विजयनगर की प्रगति होगी। यही उस पुजारी जी के आशीष का आशय है, महाराज!” पुजारी जी के आशीष की यह व्याख्या सुनकर महाराज सन्तुष्ट हो गए। सभासदों ने तेनाली राम की मीमांसा का करतल ध्वनि से स्वागत किया और उस सभासद का मुँह लटक गया जिसने महाराज का कृपाभाजन बनने के लिए पुजारी जी की राह रोकी थी।
बहुभाषाविद् और तेनाली राम महाराज कृष्णदेव राय विद्वत्ता-प्रेमी थे। स्वयं स्वाध्याय करते और स्वाध्यायियों की सराहना भी करते। उनके दरबार में प्रायः विभिन्न राज्यों के विद्वान आते और अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन कर उनसे उपहार आदि प्राप्त करते। विद्वानों को समा-त करते समय महाराज को आन्तरिक प्रसन्नता होती। एक बार महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक ऐसा भाषाविद् पहुँचा जो भाषा के विकास पर विशेष अध्ययन कर चुका था तथा स्वयं छः-सात भाषाएँ मातृभाषा की तरह बोल सकता था। उसने महाराज के सम्मुख उपस्थित होकर कहा, “महाराज! मैं इस देश में बोली जानेवाली प्रायः समस्त बोलियों और भाषाओं का ज्ञाता हूँ और अनेक भाषाओं पर मेरा मातृभाषा की तरह अधिकार है। आपको मेरी बातों पर विश्वास हो जाए, इसके लिए आपके सामने मैं यही बातें विभिन्न भाषाओं में दोहराता हूँ। पहले तमिल में!” और वह फर्राटेदार तमिल में वही बातें बोलने लगा। सभी सभासद चमत्कृत से उसे देखने लगे। “अब तेलगू”!...और तेलगू में भी वह बड़ी सहजता से बोल गया वही बातें! सभासदों को उसके इस भाषा-ज्ञान पर घोर विस्मय हुआ। महाराज भी उस विद्वान के भाषा-ज्ञान पर चकित थे और वह बोले जा रहा था। कभी कन्नड़, कभी उड़िया, कभी मराठी तो कभी गुजराती। महाराज ने स्वीकार कर लिया कि इस विद्वान के पास अद्भुत सामर्थ्य है। सभासद उसकी सराहना के लिए तालियाँ बजाने लगे। इसके बाद उस विद्वान ने महाराज से कहा, “महाराज! अब आपके सभासद इस देश के किसी भी क्षेत्र में बोली जानेवाली किसी भी बोली में, किसी भी भाषा में बात कर सकते हैं। मैं उनकी बातों का जवाब उनके द्वारा बोली गई भाषा में ही दूँगा।” महाराज ने सभासदों को विद्वान से बातें करने का संकेत कर दिया। इसके बाद तो सभा में रह-रहकर विभिन्न बोलियों में उस विद्वान से बातें होती रहीं और वह सभासदों द्वारा बोली जानेवाली भाषा में ही जवाब देता। महाराज, तेनाली राम और सभासद सभी उस विद्वान के इस गुण की सराहना कर रहे थे। सभा भवन में एक भिन्न किस्म का माहौल था।
इसी सराहना और उल्लास के स्वरों के बीच उस विद्वान ने सभासदों की ओर देखते हुए महाराज से कहा, “महाराज! अब मेरी एक चुनौती है- सभाभवन में उपस्थित किसी भी सभासद को या सभी सभासदों को कि इनमें से कोई भी यदि मेरी मातृभाषा बता दे तब मैं उसको एक भी स्वर्णमुद्राएँ दूँूँगा। यदि कोई भी ऐसा न कर सके तब आप मुझे एक भी स्वर्णमुद्राएँ देकर विदा करेंगे!” सभासदों के बीच सन्नाटा छा गया। महाराज भी मुश्किल में थे। वे भी नहीं समझ पाए कि यह विद्वान आखिर कहाँ का रहनेवाला हो सकता है और कौन-सी भाषा इसकी मातृभाषा हो सकती है। उन्होंने तेनाली राम की ओर देखा। तेनाली राम भी शान्त था। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उस विद्वान ने सभी के ऊपर भरपूर -ष्टि डाली और बोला, “महाराज! मैं सभी की सुविधा के लिए बारी-बारी से विभिन्न भाषाओं में बोल रहा हूँू ताकि यह अनुमान लगाना आसान हो जाए कि मेरी मूल मातृभाषा कौन-सी है।” उस विद्वान के बोल लेने के बाद सभाभवन में ऐसा सन्नाटा छा गया कि मानो वहाँ कोई हो ही नहीं। महाराज ने फिर तेनाली राम की ओर देखा। तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! मैं इस विद्वान की मातृभाषा बता दूँूँगा मगर इन्हें एक दिन के लिए,...नहीं! एक रात के लिए मेरा अतिथि बनकर रहना होगा।” महाराज ने कहा, “क्यों, तेनाली राम, अभी ही क्यों नहीं बताते?” “बस, यूँू ही महाराज! मेरी इच्छा है कि माँ सरस्वती के इस वरद-पुत्र की सेवा का अवसर मुझे प्राप्त हो।” तेनाली राम ने कहा। विद्वान व्यक्ति सम्मान का भूखा होता है। सम्मान मिलने से उसके अहंकार को सन्तुष्टि मिलती है। इस विद्वान को तेनाली राम का प्रस्ताव पसन्द आया। उसने महाराज से कहा, “महाराज! मैं यह आतिथ्य ग्रहण करने के लिए तत्पर हूँ। लेकिन शर्त है कि यदि ये मेरी मातृभाषा नहीं बता पाए तो इन्हें एक भी स्वर्णमुद्राएँ मुझे इन सभी सभासदों के समक्ष ही देनी पड़ेगी।” तेनाली राम ने कहा, “महाराज! मुझे इन जैसे विद्वान के साहचर्य और सान्निध्य के लिए
इनकी यह शर्त स्वीकार है।” फिर तेनाली राम उस विद्वान के साथ अपने घर आ गया। उस दिन की सभा विसर्जित हो गई। तेनाली राम के घर पर उत्सव जैसा माहौल था। उसके सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सभी बुलाए गए थे। शाम ढल चुकी थी। तेनाली राम के द्वार पर कई मशाल जलाकर प्रकाश किया गया था। तेनाली राम ने अपने पड़ोसियों को भी सूचित किया था कि उसके घर एक ऐसा विद्वान आया हुआ है जिससे वे चाहे जिस बोली या भाषा में बात करें, वह उन्हें उसी बोली में उत्तर देगा। देर रात तक तेनाली राम के दरवाजे पर लोगों का मजमा लगा रहा। विद्वान जब थककर चूर हो चुका तब तेनाली राम ने लोगों को विदा किया। उसने विद्वान को खूब मीठे पकवान खिलाए जिसके कारण विद्वान को नींद आने लगी। तेनाली राम ने उसके सोने की व्यवस्था अलग कमरे में कराई। जब विद्वान सो गया तब तेनाली राम ने एक सेवक को एक बर्तन में गरम पानी दिया और कहा, “तुम जाओ और जाकर उस सोए हुए अतिथि के एक पाँव पर यह गरम पानी उड़ेल आओ। इसके बाद जो कुछ भी होगा, उससे मैं निपट लूँगा।” सेवक डरता हुआ विद्वान वाले कमरे में गया। थोड़ी ही देर में विद्वान की चीख और कन्नड़ में उसके बोलने की आवाज सुनकर तेनाली राम उसके कमरे में पहुँचकर विद्वान से पूछा, ”क्या हुआ?” विद्वान उस समय घबराया हुआ था। विद्वान ने तेनाली राम से कहा, “तुम्हारे सेवक ने मेरे उ$पर गरम पानी डाल दिया।” यह सुनकर तेनाली राम ने चीखकर अपने सेवक को आवाज लगाई, “रामलिंगम्, इधर आओ! सुनो, हमारे माननीय अतिथि क्या कह रहे हैं!” रामलिंगम् ने कहा, “स्वामी, मैं आपकी दवा के लिए गरम पानी लेकर आ रहा था। हाथ में गरम पानी लेकर जब मैं दवा लेने के लिए इस कमरे में आया तो मेरा पाँव पलंग के पाये से टकरा गया और कटोरे से थोड़ा पानी छलककर इनके पाँव पर गिर गया जिसके कारण ये जग गए और मैं इनके क्रोध से बचने के लिए डरकर बाहर भाग गया।” तेनाली राम ने हाथ जोड़कर अतिथि से क्षमा-याचना की और उसके पाँव को ठंडे पानी से धोकर उस पर आलू के गूदे का लेप लगाया जिससे अतिथि की जलन शान्त हो गई और वह शान्ति से सो गया। दूसरे दिन तेनाली राम अपने विद्वान अतिथि के साथ महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में
उपस्थित हुआ। महाराज और सभी सभासद मानो उनकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। तेनाली राम और विद्वान अतिथि द्वारा आसन ग्रहण कर लेने के बाद महाराज ने सभा की कार्रवाई शुरू कराई। विद्वान ने उठकर कहा, “महाराज! मैंने तेनाली राम की शर्त पूरी कर दी है। अब आप तेनाली राम को कहें कि शर्त के अनुसार वे मेरी मातृभाषा बताएँ या मुझे एक भी स्वर्णमुद्राएँ देकर विदा करें।” महाराज ने तेनाली राम से पूछा, “क्यों तेनाली राम, तुम अब बताओगे कि अतिथि की मातृभाषा क्या है?” “जी हाँ, महाराज! हमारे अतिथि की मातृभाषा ‘कन्नड़’ है।” यह सुनना था कि वह विद्वान अपने आसन से उठकर आश्चर्य से तेनाली राम को देखने लगा फिर उसने हाथ जोड़कर स्वीकार कर लिया, ”मेरी मातृभाषा कन्नड़ ही है।“ उसने यह भी कहा, “महाराज! मैंने आपके दरबार की प्रशंसा तेनाली राम के कारण ही सुनी थी। मुझे एक भी स्वर्णमुद्राएँ इन जैसे प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति को भेंट करते हुए हार्दिक प्रसन्नता होगी।” यह कहते हुए उसने तेनाली राम को एक भी स्वर्णमुद्राएँ सौंपने की तत्परता दिखाई। सभाकक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा किन्तु तेनाली राम ने यह कहते हुए यह धन लेने से मना कर दिया कि विद्वान उनका अतिथि है। अतिथि का सम्मान करना हमारी परम्परा है। अतिथि से कुछ प्राप्त करने की लालसा हमें नहीं होती! सभाकक्ष में बैठे सभी व्यक्ति तेनाली राम के इस इनकार से हतप्रभ रह गए। वह विद्वान तेनाली राम से इतना प्रभावित हुआ कि अपने ज्ञाता होने के अहंकार से मुक्त होकर तेनाली राम के चरण छू लिये तथा कहने लगा, “तेनाली राम! आप जैसे व्यक्ति से मिलकर मेरा जीवन धन्य हो गया। मैं जीवनपर्यन्त आपकी प्रतिभा और अतिथि-सम्मान की भावना को नहीं भूल पाऊँगा।” ऐसा कहकर विद्वान महाराज कृष्णदेव राय के दरबार से बाहर आ गया। उसके जाने के बाद महाराज ने तेनाली राम से यह जानना चाहा कि उसने कैसे जाना कि उस विद्वान की मातृभाषा कन्नड़ ही है? तेनाली राम ने हँसते हुए महाराज को रात की घटना सुना दी तथा कहा, ”महाराज! आदमी चाहे जितनी भी भाषाओं का ज्ञाता हो, वह अचानक मिली पीड़ा की उत्प्रेरणा से
अपनी मातृभाषा में ही चीखेगा। मैंने इसी सूत्र के सहारे यह जान लिया कि विद्वान की मातृभाषा कन्नड़ है।“
पाँच गधोंवाला सौदागर एक बार महाराज कृष्णदेव राय और तेनाली राम साथ-साथ पड़ोसी राज्य के एक शहर सौरभ नगर भ्रमण करने के लिए गए। दोनों सौदागर के वेश में थे। उन दिनों यह आम प्रचलन था कि राजा-महाराजा जीवन और जगत में हो रहे परिवर्तनों को जानने के लिए समय-समय पर ऐसे ही वेश बदलकर घूमने के लिए निकल जाया करते थे। सौरभ नगर में ये दोनों एक धर्मशाला में ठहरे। इस धर्मशाला में और बहुत से सौदागर ठहरे हुए थे। महाराज उत्सुकता से उन सौदागरों को अपने कमरे से निहार रहे थे। तेनाली राम ने उन्हें इस तरह उत्सुक देखा तो पूछा, “क्या बात है महाराज, इस तरह आप हर आने-जानेवालों को क्यों देख रहे हैं? यह तो धर्मशाला है। यहाँ इसी तरह लोग आते-जाते रहेंगे। इनमें कोई अच्छा सौदागर होगा तो कोई बुरा। कोई बेशकीमती चीजें बेचनेवाला होगा तो कोई बात बेचकर पैसे कमाता होगा।” महाराज कृष्णदेव राय ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं तेनाली राम! मैं हर आने-जानेवाले को नहीं देख रहा। मैं तो सामने के कमरे में ठहरे उस अजीबो-गरीब परिधानवाले सौदागर को देख रहा हूँ जो अपने साथ पाँच गधों को भी अपने कमरे में रखे हुए है और उन्हें प्यार से सहला रहा है। मैंने अब से पहले कमरे में पालतू कुत्ते, बिल्लियाँ, खरगोश, तोते, कबूतर आदि तो देखे थे मगर किसी को अपने कमरे में गधा रखते नहीं देखा था। इस कारण ही मुझे उत्सुकता हो रही है कि अपने साथ कमरे में गधों को रखनेवाला यह सौदागर कौन है तथा किस चीज के सौदे के लिए यहाँ ठहरा है...।” “तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है महाराज! हम लोग बाहर निकलेंगे तो यह बात आसानी से पता लग जाएगी।” महाराज और तेनाली राम दोनों ही थोड़ी देर के बाद बाजार जाने के लिए अपने-अपने कमरों से बाहर निकले। दोनों जब धर्मशाला के मुख्य द्वार के पास पहुँचे तो तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! तनिक ठहरिए।” महाराज ने तेनाली राम की ओर प्रश्नसूचक-दृष्टि से देखा तो तेनाली राम ने कहा, “आइए महाराज, धर्मशाला के व्यवस्थापक का कक्ष मुख्य द्वार के पास ही है। जरा चलिए, उस सौदागर के बारे में पता चल जाएगा कि वह कौन है, कहाँ से आया है और किस चीज का सौदा करता है!”