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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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126 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

स्वाहा करके अपने शरीर के विभिन्न अंगों से विराट् सर्ग की रचना की है— तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः संभृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शून्ताँश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्यान् ग्राम्याश्च॒ ये।। (ऋ० १०/९०/८) अर्थात् जिस यज्ञ में समस्त या सबका आत्मरूपपुरुष स्वाहा कर दिया जाता है, इस प्रकार उस यज्ञ से दही से युक्त घी उत्पन्न हुआ तथा उसने वायु या अन्तरिक्ष में भ्रमणशील पशु अर्थात् पक्षी, वनों में निवास करने वाले हिरणादि पशु एवं जो ग्राम निवासी अश्व, गौ आदि पशु हैं, वे भी बनाए गए। वेद के अनुसार– इमं यज्ञं वित्तं विश्वकर्मणा। तथा स्विष्टिंनस्तां कृण्वद्विश्वकर्मा। अर्थात् विश्वकर्मा ही इस यज्ञ का विस्तारक है। वही हमारी दुरिष्टियों को स्विष्टियों में परिवर्तित कर सकता है। शारीरिक यज्ञ में मन–यजमान, चक्षु–होता, प्राण–उद्गाता, श्रवण–अध्वर्यु तथा वाणी–ब्रह्मा है। इन सभी में आग्नेय तत्त्व विद्यमान है। यज्ञ में आग्नेयता का प्राधान्य है। जहाँ अग्नि नहीं है, वहाँ यज्ञ भी सम्भव नहीं है। अग्नि तथा यज्ञ का अविनाभाव सम्बन्ध है। अग्नि नहीं है, तो दिव्यता भी सम्भव नहीं। देवत्व अग्नि पर आश्रित है। इस प्रकार विश्व में व शरीर में सदैव यज्ञ चलता रहता है। ऋग्वेद काल में यज्ञ को सर्वोच्च महत्ता प्रतिपादित हुई है। जाति-प्रथा : ऋग्वेद में पुरुषसूक्त को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी जाति-प्रथा का विवेचन उपलब्ध नहीं होता। इस सूक्त में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र, इन चारों वर्णों का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। यद्यपि यह सूक्त परवर्ती रचना स्वीकार किया जाता है, इसमें चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति का इस प्रकार उल्लेख हुआ है— ब्राह्म॒णो॑ऽस्य॒ मुख॑मासीद् बा॒हू रा॑ज॒न्यः॑ कृ॒तः। ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्यः॑ प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत।।१२।। (ऋ० १०/९०/१२) अर्थात् इस पुरुष का मुख ब्राह्मण हुआ अर्थात् इसके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए। भुजाओं को क्षत्रिय बनाया गया अथवा क्षत्रिय इसकी भुजाओं से उत्पन्न हुए। इसकी जाँघें वैश्य बने अर्थात् जाँघों से वैश्यों की उत्पत्ति हुई तथा इसके चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar