वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 155, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 127 वस्तुतः प्रत्येक मनुष्य चारों वर्णों से युक्त होता है। यह शौच काल में शूद्र, स्नानान्तर अध्ययन काल में ब्राह्मण, पीड़ितों के रक्षा काल में क्षत्रिय तथा कृषिकर्म काल में वैश्य होता है। अतः एक ही मनुष्य पृथक् कालों में पृथक्-पृथक् वर्ण वाला होता है। वैदिक काल में जातियों का विभाजन अत्यन्त वैज्ञानिक तथा उत्कृष्ट स्वीकार किया गया था किन्तु वर्तमान काल में यह सामाजिक कुष्ठ रोग का रूप धारण कर चुका है। ऋग्वेद-काल में मानवीय चरित्र : अनेक ऋग्वेदीय मन्त्रों से स्पष्ट है कि उस काल में मनुष्य का विकास क्रम सांस्कृतिक था। आर्य जाति ने मानव के आध्यात्मिक निर्माणार्थ जिन संस्कारों की कल्पना की, उनकी आधारशिला अतीव सुदृढ़ एवं गहरी है। संस्कार जन्मोपरान्त नहीं, अपितु उसके बहुत पहले से ही आरम्भ हो जाते हैं। इस प्रकार के संस्कारों की कुल संख्या १६ है, वे हैं- (१) गर्भाधान, (२) पुंसवन, (३) सीमन्तोन्नयन, (४) जातकर्म, (५) नामकरण, (६) निष्क्रमण, (७) अन्नप्राशन, (८) चूड़ाकर्म (९) कर्ण वेध, (१०) उपनयन, (११) वेदारम्भ, (१२) समावर्तन, (१३) विवाह, (१४) वानप्रस्थ, (१५) सन्यास आश्रम (१६) अन्त्येष्टि। ऋग्वैदिककाल में योग के अष्टाङ्गमार्ग का वेदज्ञ तथा सामान्यजन भी परिपालन करते थे। ये आठ मार्ग हैं- (१) यम, (२) नियम, (३) आसन, (४) प्राणायाम, (५) धारणा (६) प्रत्याहार (७) ध्यान, (८) समाधि। यम में वर्णित अस्तेय के पालन का आदेश ऋग्वेद के निम्नलिखित मंत्र में देखा जा सकता है- यो॒ नो॒ रसं॑ दिप्स॑ति पि॒त्वो अ॒ग्ने यो अश्वा॑नां॒ यो गवां॒ यस्त॒नूना॑म्। रि॒पुः स्ते॒नः स्ते॒य॒कृद्द्भ्र॒मैतु॒ नि ष ही॑यतां त॒न्वा३॒ तना॑ च।। (ऋ० ७/१०४/१०) अर्थात् तेजः स्वरूप परमात्मा ! जो राक्षस हमारे अन्न के रस को विनष्ट करना चाहता है तथा जो घोड़ों के और जो गायों के एवं जो हमारे शरीर के रस अर्थात् बल को नष्ट करना चाहता है, वह अहिताभिलाषी चोर तथा छिपकर वार करने वाला नाश को प्राप्त हो और वह दुष्ट अपने शरीर से तथा दुष्कर्मी सन्तानों से नष्ट हो जाये। पाश्चात्य विद्वान् विन्टरनिट्ज के अनुसार प्राचीन भारतीय-समाज अत्यन्त उद्दण्ड तथा चरित्रहीन था। उनका कथन है कि 'हम किसी भी प्रकार प्राचीन भारतवर्ष की चारित्रिक दशा के लिए कोई अत्यन्त उज्ज्वल धारणा नहीं बना सकते क्योंकि हमें ऋग्वेद के सूक्तों में व्यभिचार, अगम्य-गमन, सतीत्व-नाश, वैवाहिक विश्वास, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar