वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 128 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गर्भपात करने की प्रवृत्ति, प्रतारणा, छल-छिद्र, कपट, चोरी और डकैती के प्रमाण उपलब्ध होते हैं। तथापि ये सब वस्तुएँ ऋग्वेद की परम प्राचीनता के सम्बन्ध में कुछ विरोध नहीं करती। ऋग्वेद में मनोविज्ञान तथा परामनोविज्ञान- ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में मनोविज्ञान का स्पष्ट अंकुरण दृष्टव्य है। ऋ० (१०/५३/६) मनुर्भव, मननशील बनने का आदेश देता है। कतिपय मन्त्रों में मन को भद्र बनाने की प्रेरणा दी गई है। यथा- भद्रं नो अपि॑ वातय॒ मनो॒ दक्ष॑मु॒त क्रतु॑म्। अधा॑ ते स॒ख्ये अन्ध॑सो॒ वि वो॒ मदे॒ रण्गावो॒ न यव॑से विव॑क्षसे ।।१।। (ऋ० १०/२५/१) अर्थात् हे परमात्मा, हमें कल्याणकारी मन प्रदान करो। सुखदायी बल तथा कर्म सामर्थ्य, ये दो जिस प्रकार पशुगण चारे की इच्छा करते हुए, उसे पाकर हर्षित होते हैं, उसी प्रकार जीवगण तेरे मित्रभाव में रहकर विभिन्न प्रकार से अन्न तथा कर्मफल प्राप्त कर आनन्द प्राप्त करते हैं। हे मनुष्यों! वह महान् परमात्मा आपके समस्त आनन्द का दाता है। भद्रं मन॑ः कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये येना॑ स॒मत्सु॑ सास॒हः। अव॑ स्थि॒रा त॑नुहि॒ भूरि॑ शर्धतां॒ वने॑मां ते अ॒भिष्टि॑भिः।। (ऋ० ८/१९/२०) अर्थात् हे सर्वगत प्रभु ! महायुद्ध में भी हमारे मन को मङ्गल सम्पन्न करो, जिस मन से विश्व में आप सभी विघ्नों को शान्त करते हैं। हे परमेश्वर ! महादुष्ट व जगत् के कण्टकजनों के सुदृढ़ अनेक नगर हो तो भी उन्हें भूमि में मिला दे, जिससे हम उपासक आपके द्वारा प्रदत्त अभिलषित मनोरथों से सम्पन्न हों। ऋग्वेद की ऋचा (६/९/६) तथा (८/२२/१६) में मन के वेग का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार अनेक ऋग्वेदीय ऋचाओं में परामनोविज्ञान के भी दर्शन होते हैं। यथा— (४/२/१), (८/६८/६), (१०/८२/५)। इस प्रकार ऋग्वेद मनोविज्ञान तथा परामनोविज्ञान की बहुमूल्य सामग्री प्रदान कर रहा है। ऋग्वेद में काव्य सौन्दर्य- ऋग्वेद में केवल आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषयों का ही विवेचन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar