भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 353 में से

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पृष्ठ 157

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 129 नहीं हुआ है अपितु इसमें काव्यकला के कमनीय उपकरणों से ग्रथित, प्रमुख अलंकारों, व्यञ्जनाओं तथा ध्वनियों से अनुप्राणित परिनिष्ठित गीतों का संयोजन भी है। ऋग्वेद में हमें विविध काव्यकलाकलित ललितभावों के दर्शन होते हैं जो कि सहृदयों को आनन्द से आप्यायित कर देने में पूर्ण सक्षम हैं। जिस प्रसङ्ग में काव्यात्मक विधा प्रस्तुत की गई है वहाँ पूर्ण ललितकला संयोजित कर दी गई है। कोमलकान्तपदावली, सरस रक्त विलास, मधुरमाधुर्यलास, प्रसादगुण की प्रसन्नता सहृदयों के हृदयों को सहसा ही आकृष्ट कर लेती है। आचार्य बलदेव उपाध्याय जी का इस सम्बन्ध में कथन है— “उनके रूपों का भव्यवर्णन कवि की कला का विलास है, तो उनके भीतर सुकुमार प्रार्थना के अवसर पर कोमल भावों, हार्दिक भावनाओं की रुचिर अभिव्यञ्जना है। उषा विषयक मन्त्रों में सौन्दर्याधिक्य है, तो इन्द्र विषयक मन्त्रों में तेजस्विता का प्राचुर्य है। अग्नि के रूपवर्णन में स्वभावोक्ति का आश्रय है, तो वरुण की स्तुति के मन्त्रों में हृदयगत कोमलभावों की मधुर अभिव्यक्ति है। इस प्रकार वेद के मन्त्रों में काव्यगत गुणों का पर्याप्त दर्शन होना काव्य जगत् की कोई आकस्मिक घटना नहीं है। तन्मयता तथा अनन्यता का यह विशद् परिचायक चिह्न है— भावों की सरल सहज अभिव्यक्ति निःसन्देह वेदों में इसका विशाल साम्राज्य है।” ऋग्वेद में काव्य गुणों के कतिपय विशेषताओं का विवेचन प्रस्तुत है— रस-संयोजन- ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर शृङ्गार रस का सुन्दर परिपाक हुआ है। देवी उषा का वर्णन एक मानवी सुन्दरी के रूप में इस प्रकार किया गया है— कन्ये॑व त॒न्वा॒३॑ शाश॑दानाँ॒ एषि॑ देवि देव॒मिय॑क्षमाणम्। संस्मय॑माना यु॒वतिः पु॒रस्ता॑दा॒विर्वक्षां॑सि कृणुषे वि॒भाती॑॥ अर्थात् हे प्रकाशवती उषा! तुम कमनीय कन्या की तरह अत्यन्त आकर्षणमयी बनकर अभीष्टफलदाता सूर्य के समीप जाती हो तथा उनके समक्षस्मितवदना युवती की तरह अपने वक्ष को आवरण रहित करती हो। एक अन्य काव्यसौन्दर्यपित उद्धरण का आनन्द लीजिये— अधि॒ पेशां॑सि वपते नृ॒तूरि॒वापो॑र्णुते॒ वक्ष॑ उ॒स्रेव॑ ब॒र्जह॑म्। ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृण्व॒ती गावो॒ न व्र॒जं व्यु॑षा आ॑र्व॒तमः॑॥४॥ (ऋ० १/९२/४) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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