वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 130 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् नर्तकी के सदृश मोहक परिधान में सुसज्जित उषा अपने वक्षस्थल को खोल रही है, ऐसे जैसे एक गरड़े रड़ की गाय दोहनकला में अपने स्तन को। जिस प्रकार गायें शीघ्र ही वज्र की ओर प्रस्थान करती है, उसी प्रकार उषा भी पूर्व दिशा में जाकर अखिल विश्व को अपनी ज्योति से आलोकित कर देती है। एक ही मन्त्र में शृङ्गार के समस्त उपकरणः पेशल मञ्जुल नर्तकी की झिलमिलाती बोली, कनकावदात ऊँचा नीचा अनार भरा वक्षस्थल, फिर प्रेक्षक जगत् की ओर उसकी हास्य वृष्टि, फिर अन्धकार तथा प्रकाश की आँखमिचौली, कितना मोहक वर्णन है ? इसी प्रकार हमें क्वचित् मन्त्रों में वीर रस के दर्शन होते हैं। इन्द्र की स्तुतियों में वीररस की पूर्णता दर्शनीय है। यथा- यस्मान्न॒ ऋते वि॒जय॑न्ते॒ जना॑सो॒ यं युध्य॑माना॒ अव॑से॒ हव॑न्ते। यो विश्व॑स्य प्रतिमानं॑ ब॒भूव॒ यो अं॒च्यु॒तच्युत्स जना॑स॒ इन्द्र॑ः॥ अर्थात् जिन इन्द्र देवता की कृपा के बिना मनुष्य विजय नहीं प्राप्त कर सकता है। योद्धा लोग अपनी सुरक्षा के लिए जिसका आह्वान करते हैं, जो विश्व में सर्वश्रेष्ठ है, वह अवयवों को भी व्यक्त कर देने वाला है। ऋग्वेद के सोम-सूर्या, यम-यमी, पुरुरवा-उर्वशी आदि के सूक्तों में हमें शृङ्गार रस की व्यञ्जना के दर्शन होते हैं। पुरुरवा-उर्वशी के प्रणयप्रसङ्ग में पुरुरवा की उक्तियों से विप्रलम्भ शृङ्गार अभिव्यक्त होता है। यथा- इषु॒र्न श्रिय॑ इषुधे॒रस॒ना गो॒षाः श॑त॒सा न रंहि॑ः। अवी॑रे॒ क्रतौ॒ वि द॑विद्युतन्नो॒रा न मा॒युं चि॑तयन्त॒ धुन॑यः॥३॥ (ऋ० १०/९५/३) अर्थात् तरकस से तीर समान सेनापति राज्यलक्ष्मी के लिए शत्रु दल पर आ गिरे। वह भूमि का भोक्ता या दाता तथा सैकड़ों सुखों का प्रदाता तथा वेगवान हो। वीरों रहित युद्ध कार्यों में वह नहीं चमकता तथा महान् अन्तरिक्ष के तुल्य विस्तृत रणाङ्गण में शत्रुओं को कँपा देने वाले वीर सेनाजन वायुओं के तुल्य गर्जन करें तथा सेनाएँ सेनापति शब्द को समझें। इसी प्रकार कहीं कहीं हास्य रस को भी प्रस्तुत किया गया है। मण्डूक सूक्त में मण्डूकों की तुलना ब्राह्मणों से की गई है। वे टर्र-टर्र द्वारा पारस्परिक अभिनन्दन करते हैं- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar