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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 131 यदे॑षाम॒न्यो अ॒न्यस्य॒ वाचं॒ शाक्त॒स्ये॑व॒ वद॑ति॒ शिक्ष॑माणः। सर्वं॒ तदे॑षां स॒मृधे॑व॒पर्व॒ यत्सु॒वाचो॒ वद॑थनाध्य॒प्सु।। (ऋ० ७/१०३/५) अर्थात् जो कि एक शिक्षा प्राप्त करने वाला जलीय जन्तु शक्तिमान् अर्थात् शिक्षा को प्राप्त हुए की तरह अन्य जल जन्तु से शब्द को सीख लेता है, वैसे ही तब, इन शब्दों को सम्पूर्ण अविकल अङ्गों वाले होकर जलों के मध्य में जो सुन्दर वाणी है उसको बोलो। अलंकार विधान- ऋग्वेद में हमें अलङ्कारों का सुन्दर प्रयोग मिलता है। ऋषि कवियों ने प्रमुख रूप से सादृश्यमूलक उपमा एवं रूपक अलङ्कार का प्रयोग किया है। उदाहरणार्थ उपमा अलङ्कार से युक्त मन्त्र प्रस्तुत है- अ॒भ्रा॒तेव॑ पुं॒स ए॑ति प्रती॒ची ग॑र्तारु॒गिव॒ सन॑ये॒ धना॑नाम्। जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑ उ॒षा ह॒स्रेव॒ नि रि॑णीते॒ अप्स॑ः।। अर्थात् भ्रातृरहित स्त्री जिस प्रकार पिता आदि के समक्ष गमन करती है। गर्तभर्तका जिस प्रकार धन प्राप्ति के लिये घर आती है। उसी प्रकार उषा भी वैसा ही करती है। जिस प्रकार पत्नी पति की अभिलाषिणी होकर सुन्दर वस्त्रों को पहनकर हास्य के द्वारा अपनी दन्तावली प्रकाशित करती है उसी प्रकार उषा भी व्यवहार करती है। उपमा का एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है- परा॒ हि मे॒ विम॑न्यवः॒ पत॑न्ति॒ वस्य॑इष्टये। वयो॒ न व॑स॒तीरुप॑।। अर्थात् जिस प्रकार चिड़िया अपने घोसलों की ओर दौड़ती है, उसी प्रकार हमारी क्रोध से रहित चिन्ताएँ भी धन को प्राप्त करने के लिए दौड़ रही हैं। राहुल जी ने गृत्समद के एक सूक्त (२/३६/१०८) की प्रत्येक पंक्ति में उपमा बतलाते हुए इस प्रकार लिखा है- 'अश्विद्वय पत्थर की तरह....... शत्रु को बाधा दो, गिद्ध की तरह निधियुक्त वृक्ष को प्राप्त करो। ब्रह्मा की तरह यज्ञ में उक्थ गाने वाले हो, दूत की तरह बहुतों के लिए पुकारने के लिए पुकारने लायक हो।' 'इस सूक्त में और उपमाएँ दी गई हैं। रथी, अजा, स्त्री, दम्पति, सींग, शफ, चक्रवाक, नाव, युग, नाभि, उपधि, प्रदि, खान, खल, वर्ग, बात, नदी, नदय, पाद, ओष्ठ, स्तन, नासा, कर्ण, पृथ्वी, शान, तलवार, सात त्रिष्टुप ऋचाओं के भीतर इतनी उपमाएँ दी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar