भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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132 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गई हैं और सबके साथ, इव का प्रयोग है। (१) विश्वामित्र ने अपने सुन्दर काव्य नदीसूक्त (३/३५) में व्यास और सतलज की उपमाएँ वस्तुओं से दी हैं— अश्व, गौ, रथी, वत्स, योषा (माँ) तथा मर्य (पति)।' न के साथ भी उपमा ऋग्वेद में आती है जिसका प्रयोग पीछे नहीं होता। इसी प्रकार ऋग्वेदीय उपमा के सम्बन्ध में आचार्य बलदेव उपाध्याय जी का कहना है— ‘‘अलंकारों की रानी उपमा देवी का नितान्त भव्य, मनोरम तथा हृदयावर्जक रूप इन मन्त्रों में देखने को मिलता है। तथ्य तो यह है कि उपमा का काव्य संसार में प्रथम अवतार उतना ही प्राचीन है जितना स्वयं कविता का आविर्भाव। आनन्द से सिक्त हृदय कवि की वाणी उपमा के द्वारा अपने को विभूषित करने में कोमल उल्लास तथा मधुमय आनन्द का बोध करती है।’’ च॒त्वारि॒ शृङ्गा॒ त्रयो॑ अस्य॒ पादा॒ द्वे शीर्षे स॒प्त हस्ता॑सो अस्य। त्रिर्धा ब॒द्धो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति म॒हो दे॒वो मर्त्याँ आ वि॑वेश।। (ऋ० ४/५८/३) अर्थात् हे मानवों! जो बड़ा सेव्य तथा सम्माननीय स्वप्रकाशस्वरूप तथा सर्वसुखप्रदाता मरणधर्मा मनुष्यादि को सब प्रकार से व्याप्त होता है तथा जो सुखवर्षक तीन— श्रद्धा, पुरुषार्थ एवं योगाभ्यास से बद्ध निरन्तर उपदेयता है, इस धर्म से युक्त नित्य और नैमित्तिक परमेश्वर के बोध के दो— उन्नति और मोक्ष रूप शिरस्थापन्न तीन (कर्म, उपासना तथा ज्ञान रूप) चलने योग्य चरण तथा चार वेद शृंगों के समान आप लोगों द्वारा ज्ञातव्य है और इस धर्म व्यवहार के पञ्च ज्ञानेन्द्रियों या पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, मन व आत्मा ये सात हाथों के समान वर्तमान है तथा उक्त प्रकार से बद्ध व्यवहार भी ज्ञातव्य है। रूपक-व्यतिरेक अलङ्कारयुक्त मन्त्र भी कितना सहज है— द्वा सु॑प॒र्णा स॒युजा॒ सखा॑या समा॒नं वृ॒क्षं परि॑ षस्वजाते। तयो॑र॒न्यः पिप्प॑लं स्वा॒द्वत्त्यन॑श्नन्न॒न्यो अ॒भि चा॑कशीति।। (ऋ० १/१६४/२०) अर्थात् हे मानवों! जो सुन्दर पंखों वाले, समान सम्बन्ध रखने वाले, मित्र तुल्य वर्तमान-पखेरू एक जो काटा जाता इस वृक्ष का आश्रय ग्रहण करते हैं, उनमें से एक उस पेड़ के परिपक्व फल रसावादुपन से भक्षण करता है तथा अन्य न भक्षण करता हुआ सभी ओर देखता है।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar