वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 133 छंद- किसी साहित्यक पद्यरचना में छन्दों का विशेष महत्त्व है। वेद, विशेषतः ऋग्वेद प्रायः छन्दोबद्ध रचना है। वेदों में छन्दों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए पाणिनि ने जो विचार अपनी पाणिनीय शिक्षा में प्रकट किया है, उनका अर्थ है कि बिना छन्दों के ज्ञान के मन्त्रों को पढ़ना-पढ़ाना या मन्त्रों का स्वयं उच्चारण करना पाप का हेतु बन जाता है। इतना ही नहीं ऐसे गुरु या याजक को मरने पर वृक्षादि स्थुणु योनि प्राप्त होती है अथवा उसकी अधोगति होती है। ऋग्वेद में प्रायः सात छन्दों का प्रयोग हुआ है। ये छन्द हैं- १. गायत्री, २. उष्णिक, ३. अनुष्टुप, ४. त्रिष्टुप, ५. बृहती, ६. जगती और ७. पंक्ति। इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वेद की भाषा, शैली, रस, अलङ्कार, छन्द आदि काव्यगत विशिष्टताएँ अपना अनुपम महत्त्व रखती हैं, अतएव विद्वानों के द्वारा इन गुणों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। ऋग्वेदीय काव्य की विशेषताओं के सम्बन्ध में राहुल जी का कथन निष्कर्ष रूप में अति समीचीन है- "ऋग्वेद में जहाँ तहाँ सुन्दर काव्य की जो छटा मिलती है, उससे पता लगता है कि ऋग्वैदिकआर्य कविता प्रेमी थे। उनके मनोरञ्जन के लिए सुन्दर कविताएँ रची जाती थीं। उनके गाने का ढंग क्या था, वह सामगान से पता लग सकता है। उससे भी अधिक वास्तविकता के समीप हम तब पहुँचेगे, यदि हमारे लोकगीतों के तुलनात्मक अध्ययन (विशेष कर हिमालय की कितनी ही पिछड़ी जातियों के लोकगीतों के तुलनात्मक अध्ययन) से किसी निष्कर्ष पर पहुँचे। किसी लोकगीतों के वाक्यविन्यास चाहे चिरजीवी न हों, पर उनके लय या गाने के ढंग शताब्दियों और सहस्राब्दियों तक बने रहते हैं। इसलिए यदि हमारे देश और कितने ही पश्चिमी देशों के वर्तमान लोकगीतों के साथ सामगान की तुलना की जाय तो सप्तसिन्धु के आर्यों के साथ गाने के ढंग को जाना जा सकता है।" उपसंहार : इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वेद के महत्त्व का कारण उसकी विषय वस्तु की व्यापकता है। ऋग्वेद में धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, आर्थिक, दार्शनिक एवं साहित्यिक समस्त आवश्यक विषयों का प्रतिपादन हुआ है। यज्ञों की महिमा, देवताओं की उपासना, ईश्वर के विविध रूप, पुरातन धार्मिक मान्यताओं, पाप-पुण्य की विवेचना, स्वर्ग-नरक, मोक्ष, पुनर्जन्म, लोक-परलोक, आस्तिक-नास्तिक, धर्म-अधर्म आदि धर्म सम्बन्धी तथ्यों का जहाँ इसमें प्रकटीकरण है, वहीं आर्यों के जीवन-दर्शन, उत्तमाचरण, शिष्टाचार, सत्य-मिथ्या, हिंसा, अहिंसा का अन्तर, पाप-पुण्य, विवेक, हेय उपादेय आदि सांस्कृतिक विषय निरूपित हैं। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar