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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 127 वस्तुतः प्रत्येक मनुष्य चारों वर्णों से युक्त होता है। यह शौच काल में शूद्र, स्नानान्तर अध्ययन काल में ब्राह्मण, पीड़ितों के रक्षा काल में क्षत्रिय तथा कृषिकर्म काल में वैश्य होता है। अतः एक ही मनुष्य पृथक् कालों में पृथक्-पृथक् वर्ण वाला होता है। वैदिक काल में जातियों का विभाजन अत्यन्त वैज्ञानिक तथा उत्कृष्ट स्वीकार किया गया था किन्तु वर्तमान काल में यह सामाजिक कुष्ठ रोग का रूप धारण कर चुका है। ऋग्वेद-काल में मानवीय चरित्र : अनेक ऋग्वेदीय मन्त्रों से स्पष्ट है कि उस काल में मनुष्य का विकास क्रम सांस्कृतिक था। आर्य जाति ने मानव के आध्यात्मिक निर्माणार्थ जिन संस्कारों की कल्पना की, उनकी आधारशिला अतीव सुदृढ़ एवं गहरी है। संस्कार जन्मोपरान्त नहीं, अपितु उसके बहुत पहले से ही आरम्भ हो जाते हैं। इस प्रकार के संस्कारों की कुल संख्या १६ है, वे हैं- (१) गर्भाधान, (२) पुंसवन, (३) सीमन्तोन्नयन, (४) जातकर्म, (५) नामकरण, (६) निष्क्रमण, (७) अन्नप्राशन, (८) चूड़ाकर्म (९) कर्ण वेध, (१०) उपनयन, (११) वेदारम्भ, (१२) समावर्तन, (१३) विवाह, (१४) वानप्रस्थ, (१५) सन्यास आश्रम (१६) अन्त्येष्टि। ऋग्वैदिककाल में योग के अष्टाङ्गमार्ग का वेदज्ञ तथा सामान्यजन भी परिपालन करते थे। ये आठ मार्ग हैं- (१) यम, (२) नियम, (३) आसन, (४) प्राणायाम, (५) धारणा (६) प्रत्याहार (७) ध्यान, (८) समाधि। यम में वर्णित अस्तेय के पालन का आदेश ऋग्वेद के निम्नलिखित मंत्र में देखा जा सकता है- यो॒ नो॒ रसं॑ दिप्स॑ति पि॒त्वो अ॒ग्ने यो अश्वा॑नां॒ यो गवां॒ यस्त॒नूना॑म्। रि॒पुः स्ते॒नः स्ते॒य॒कृद्द्भ्र॒मैतु॒ नि ष ही॑यतां त॒न्वा३॒ तना॑ च।। (ऋ० ७/१०४/१०) अर्थात् तेजः स्वरूप परमात्मा ! जो राक्षस हमारे अन्न के रस को विनष्ट करना चाहता है तथा जो घोड़ों के और जो गायों के एवं जो हमारे शरीर के रस अर्थात् बल को नष्ट करना चाहता है, वह अहिताभिलाषी चोर तथा छिपकर वार करने वाला नाश को प्राप्त हो और वह दुष्ट अपने शरीर से तथा दुष्कर्मी सन्तानों से नष्ट हो जाये। पाश्चात्य विद्वान् विन्टरनिट्ज के अनुसार प्राचीन भारतीय-समाज अत्यन्त उद्दण्ड तथा चरित्रहीन था। उनका कथन है कि 'हम किसी भी प्रकार प्राचीन भारतवर्ष की चारित्रिक दशा के लिए कोई अत्यन्त उज्ज्वल धारणा नहीं बना सकते क्योंकि हमें ऋग्वेद के सूक्तों में व्यभिचार, अगम्य-गमन, सतीत्व-नाश, वैवाहिक विश्वास, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 128 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गर्भपात करने की प्रवृत्ति, प्रतारणा, छल-छिद्र, कपट, चोरी और डकैती के प्रमाण उपलब्ध होते हैं। तथापि ये सब वस्तुएँ ऋग्वेद की परम प्राचीनता के सम्बन्ध में कुछ विरोध नहीं करती। ऋग्वेद में मनोविज्ञान तथा परामनोविज्ञान- ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में मनोविज्ञान का स्पष्ट अंकुरण दृष्टव्य है। ऋ० (१०/५३/६) मनुर्भव, मननशील बनने का आदेश देता है। कतिपय मन्त्रों में मन को भद्र बनाने की प्रेरणा दी गई है। यथा- भद्रं नो अपि॑ वातय॒ मनो॒ दक्ष॑मु॒त क्रतु॑म्। अधा॑ ते स॒ख्ये अन्ध॑सो॒ वि वो॒ मदे॒ रण्गावो॒ न यव॑से विव॑क्षसे ।।१।। (ऋ० १०/२५/१) अर्थात् हे परमात्मा, हमें कल्याणकारी मन प्रदान करो। सुखदायी बल तथा कर्म सामर्थ्य, ये दो जिस प्रकार पशुगण चारे की इच्छा करते हुए, उसे पाकर हर्षित होते हैं, उसी प्रकार जीवगण तेरे मित्रभाव में रहकर विभिन्न प्रकार से अन्न तथा कर्मफल प्राप्त कर आनन्द प्राप्त करते हैं। हे मनुष्यों! वह महान् परमात्मा आपके समस्त आनन्द का दाता है। भद्रं मन॑ः कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये येना॑ स॒मत्सु॑ सास॒हः। अव॑ स्थि॒रा त॑नुहि॒ भूरि॑ शर्धतां॒ वने॑मां ते अ॒भिष्टि॑भिः।। (ऋ० ८/१९/२०) अर्थात् हे सर्वगत प्रभु ! महायुद्ध में भी हमारे मन को मङ्गल सम्पन्न करो, जिस मन से विश्व में आप सभी विघ्नों को शान्त करते हैं। हे परमेश्वर ! महादुष्ट व जगत् के कण्टकजनों के सुदृढ़ अनेक नगर हो तो भी उन्हें भूमि में मिला दे, जिससे हम उपासक आपके द्वारा प्रदत्त अभिलषित मनोरथों से सम्पन्न हों। ऋग्वेद की ऋचा (६/९/६) तथा (८/२२/१६) में मन के वेग का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार अनेक ऋग्वेदीय ऋचाओं में परामनोविज्ञान के भी दर्शन होते हैं। यथा— (४/२/१), (८/६८/६), (१०/८२/५)। इस प्रकार ऋग्वेद मनोविज्ञान तथा परामनोविज्ञान की बहुमूल्य सामग्री प्रदान कर रहा है। ऋग्वेद में काव्य सौन्दर्य- ऋग्वेद में केवल आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषयों का ही विवेचन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 129 नहीं हुआ है अपितु इसमें काव्यकला के कमनीय उपकरणों से ग्रथित, प्रमुख अलंकारों, व्यञ्जनाओं तथा ध्वनियों से अनुप्राणित परिनिष्ठित गीतों का संयोजन भी है। ऋग्वेद में हमें विविध काव्यकलाकलित ललितभावों के दर्शन होते हैं जो कि सहृदयों को आनन्द से आप्यायित कर देने में पूर्ण सक्षम हैं। जिस प्रसङ्ग में काव्यात्मक विधा प्रस्तुत की गई है वहाँ पूर्ण ललितकला संयोजित कर दी गई है। कोमलकान्तपदावली, सरस रक्त विलास, मधुरमाधुर्यलास, प्रसादगुण की प्रसन्नता सहृदयों के हृदयों को सहसा ही आकृष्ट कर लेती है। आचार्य बलदेव उपाध्याय जी का इस सम्बन्ध में कथन है— “उनके रूपों का भव्यवर्णन कवि की कला का विलास है, तो उनके भीतर सुकुमार प्रार्थना के अवसर पर कोमल भावों, हार्दिक भावनाओं की रुचिर अभिव्यञ्जना है। उषा विषयक मन्त्रों में सौन्दर्याधिक्य है, तो इन्द्र विषयक मन्त्रों में तेजस्विता का प्राचुर्य है। अग्नि के रूपवर्णन में स्वभावोक्ति का आश्रय है, तो वरुण की स्तुति के मन्त्रों में हृदयगत कोमलभावों की मधुर अभिव्यक्ति है। इस प्रकार वेद के मन्त्रों में काव्यगत गुणों का पर्याप्त दर्शन होना काव्य जगत् की कोई आकस्मिक घटना नहीं है। तन्मयता तथा अनन्यता का यह विशद् परिचायक चिह्न है— भावों की सरल सहज अभिव्यक्ति निःसन्देह वेदों में इसका विशाल साम्राज्य है।” ऋग्वेद में काव्य गुणों के कतिपय विशेषताओं का विवेचन प्रस्तुत है— रस-संयोजन- ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर शृङ्गार रस का सुन्दर परिपाक हुआ है। देवी उषा का वर्णन एक मानवी सुन्दरी के रूप में इस प्रकार किया गया है— कन्ये॑व त॒न्वा॒३॑ शाश॑दानाँ॒ एषि॑ देवि देव॒मिय॑क्षमाणम्। संस्मय॑माना यु॒वतिः पु॒रस्ता॑दा॒विर्वक्षां॑सि कृणुषे वि॒भाती॑॥ अर्थात् हे प्रकाशवती उषा! तुम कमनीय कन्या की तरह अत्यन्त आकर्षणमयी बनकर अभीष्टफलदाता सूर्य के समीप जाती हो तथा उनके समक्षस्मितवदना युवती की तरह अपने वक्ष को आवरण रहित करती हो। एक अन्य काव्यसौन्दर्यपित उद्धरण का आनन्द लीजिये— अधि॒ पेशां॑सि वपते नृ॒तूरि॒वापो॑र्णुते॒ वक्ष॑ उ॒स्रेव॑ ब॒र्जह॑म्। ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृण्व॒ती गावो॒ न व्र॒जं व्यु॑षा आ॑र्व॒तमः॑॥४॥ (ऋ० १/९२/४) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 130 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् नर्तकी के सदृश मोहक परिधान में सुसज्जित उषा अपने वक्षस्थल को खोल रही है, ऐसे जैसे एक गरड़े रड़ की गाय दोहनकला में अपने स्तन को। जिस प्रकार गायें शीघ्र ही वज्र की ओर प्रस्थान करती है, उसी प्रकार उषा भी पूर्व दिशा में जाकर अखिल विश्व को अपनी ज्योति से आलोकित कर देती है। एक ही मन्त्र में शृङ्गार के समस्त उपकरणः पेशल मञ्जुल नर्तकी की झिलमिलाती बोली, कनकावदात ऊँचा नीचा अनार भरा वक्षस्थल, फिर प्रेक्षक जगत् की ओर उसकी हास्य वृष्टि, फिर अन्धकार तथा प्रकाश की आँखमिचौली, कितना मोहक वर्णन है ? इसी प्रकार हमें क्वचित् मन्त्रों में वीर रस के दर्शन होते हैं। इन्द्र की स्तुतियों में वीररस की पूर्णता दर्शनीय है। यथा- यस्मान्न॒ ऋते वि॒जय॑न्ते॒ जना॑सो॒ यं युध्य॑माना॒ अव॑से॒ हव॑न्ते। यो विश्व॑स्य प्रतिमानं॑ ब॒भूव॒ यो अं॒च्यु॒तच्युत्स जना॑स॒ इन्द्र॑ः॥ अर्थात् जिन इन्द्र देवता की कृपा के बिना मनुष्य विजय नहीं प्राप्त कर सकता है। योद्धा लोग अपनी सुरक्षा के लिए जिसका आह्वान करते हैं, जो विश्व में सर्वश्रेष्ठ है, वह अवयवों को भी व्यक्त कर देने वाला है। ऋग्वेद के सोम-सूर्या, यम-यमी, पुरुरवा-उर्वशी आदि के सूक्तों में हमें शृङ्गार रस की व्यञ्जना के दर्शन होते हैं। पुरुरवा-उर्वशी के प्रणयप्रसङ्ग में पुरुरवा की उक्तियों से विप्रलम्भ शृङ्गार अभिव्यक्त होता है। यथा- इषु॒र्न श्रिय॑ इषुधे॒रस॒ना गो॒षाः श॑त॒सा न रंहि॑ः। अवी॑रे॒ क्रतौ॒ वि द॑विद्युतन्नो॒रा न मा॒युं चि॑तयन्त॒ धुन॑यः॥३॥ (ऋ० १०/९५/३) अर्थात् तरकस से तीर समान सेनापति राज्यलक्ष्मी के लिए शत्रु दल पर आ गिरे। वह भूमि का भोक्ता या दाता तथा सैकड़ों सुखों का प्रदाता तथा वेगवान हो। वीरों रहित युद्ध कार्यों में वह नहीं चमकता तथा महान् अन्तरिक्ष के तुल्य विस्तृत रणाङ्गण में शत्रुओं को कँपा देने वाले वीर सेनाजन वायुओं के तुल्य गर्जन करें तथा सेनाएँ सेनापति शब्द को समझें। इसी प्रकार कहीं कहीं हास्य रस को भी प्रस्तुत किया गया है। मण्डूक सूक्त में मण्डूकों की तुलना ब्राह्मणों से की गई है। वे टर्र-टर्र द्वारा पारस्परिक अभिनन्दन करते हैं- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 131 यदे॑षाम॒न्यो अ॒न्यस्य॒ वाचं॒ शाक्त॒स्ये॑व॒ वद॑ति॒ शिक्ष॑माणः। सर्वं॒ तदे॑षां स॒मृधे॑व॒पर्व॒ यत्सु॒वाचो॒ वद॑थनाध्य॒प्सु।। (ऋ० ७/१०३/५) अर्थात् जो कि एक शिक्षा प्राप्त करने वाला जलीय जन्तु शक्तिमान् अर्थात् शिक्षा को प्राप्त हुए की तरह अन्य जल जन्तु से शब्द को सीख लेता है, वैसे ही तब, इन शब्दों को सम्पूर्ण अविकल अङ्गों वाले होकर जलों के मध्य में जो सुन्दर वाणी है उसको बोलो। अलंकार विधान- ऋग्वेद में हमें अलङ्कारों का सुन्दर प्रयोग मिलता है। ऋषि कवियों ने प्रमुख रूप से सादृश्यमूलक उपमा एवं रूपक अलङ्कार का प्रयोग किया है। उदाहरणार्थ उपमा अलङ्कार से युक्त मन्त्र प्रस्तुत है- अ॒भ्रा॒तेव॑ पुं॒स ए॑ति प्रती॒ची ग॑र्तारु॒गिव॒ सन॑ये॒ धना॑नाम्। जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑ उ॒षा ह॒स्रेव॒ नि रि॑णीते॒ अप्स॑ः।। अर्थात् भ्रातृरहित स्त्री जिस प्रकार पिता आदि के समक्ष गमन करती है। गर्तभर्तका जिस प्रकार धन प्राप्ति के लिये घर आती है। उसी प्रकार उषा भी वैसा ही करती है। जिस प्रकार पत्नी पति की अभिलाषिणी होकर सुन्दर वस्त्रों को पहनकर हास्य के द्वारा अपनी दन्तावली प्रकाशित करती है उसी प्रकार उषा भी व्यवहार करती है। उपमा का एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है- परा॒ हि मे॒ विम॑न्यवः॒ पत॑न्ति॒ वस्य॑इष्टये। वयो॒ न व॑स॒तीरुप॑।। अर्थात् जिस प्रकार चिड़िया अपने घोसलों की ओर दौड़ती है, उसी प्रकार हमारी क्रोध से रहित चिन्ताएँ भी धन को प्राप्त करने के लिए दौड़ रही हैं। राहुल जी ने गृत्समद के एक सूक्त (२/३६/१०८) की प्रत्येक पंक्ति में उपमा बतलाते हुए इस प्रकार लिखा है- 'अश्विद्वय पत्थर की तरह....... शत्रु को बाधा दो, गिद्ध की तरह निधियुक्त वृक्ष को प्राप्त करो। ब्रह्मा की तरह यज्ञ में उक्थ गाने वाले हो, दूत की तरह बहुतों के लिए पुकारने के लिए पुकारने लायक हो।' 'इस सूक्त में और उपमाएँ दी गई हैं। रथी, अजा, स्त्री, दम्पति, सींग, शफ, चक्रवाक, नाव, युग, नाभि, उपधि, प्रदि, खान, खल, वर्ग, बात, नदी, नदय, पाद, ओष्ठ, स्तन, नासा, कर्ण, पृथ्वी, शान, तलवार, सात त्रिष्टुप ऋचाओं के भीतर इतनी उपमाएँ दी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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132 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गई हैं और सबके साथ, इव का प्रयोग है। (१) विश्वामित्र ने अपने सुन्दर काव्य नदीसूक्त (३/३५) में व्यास और सतलज की उपमाएँ वस्तुओं से दी हैं— अश्व, गौ, रथी, वत्स, योषा (माँ) तथा मर्य (पति)।' न के साथ भी उपमा ऋग्वेद में आती है जिसका प्रयोग पीछे नहीं होता। इसी प्रकार ऋग्वेदीय उपमा के सम्बन्ध में आचार्य बलदेव उपाध्याय जी का कहना है— ‘‘अलंकारों की रानी उपमा देवी का नितान्त भव्य, मनोरम तथा हृदयावर्जक रूप इन मन्त्रों में देखने को मिलता है। तथ्य तो यह है कि उपमा का काव्य संसार में प्रथम अवतार उतना ही प्राचीन है जितना स्वयं कविता का आविर्भाव। आनन्द से सिक्त हृदय कवि की वाणी उपमा के द्वारा अपने को विभूषित करने में कोमल उल्लास तथा मधुमय आनन्द का बोध करती है।’’ च॒त्वारि॒ शृङ्गा॒ त्रयो॑ अस्य॒ पादा॒ द्वे शीर्षे स॒प्त हस्ता॑सो अस्य। त्रिर्धा ब॒द्धो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति म॒हो दे॒वो मर्त्याँ आ वि॑वेश।। (ऋ० ४/५८/३) अर्थात् हे मानवों! जो बड़ा सेव्य तथा सम्माननीय स्वप्रकाशस्वरूप तथा सर्वसुखप्रदाता मरणधर्मा मनुष्यादि को सब प्रकार से व्याप्त होता है तथा जो सुखवर्षक तीन— श्रद्धा, पुरुषार्थ एवं योगाभ्यास से बद्ध निरन्तर उपदेयता है, इस धर्म से युक्त नित्य और नैमित्तिक परमेश्वर के बोध के दो— उन्नति और मोक्ष रूप शिरस्थापन्न तीन (कर्म, उपासना तथा ज्ञान रूप) चलने योग्य चरण तथा चार वेद शृंगों के समान आप लोगों द्वारा ज्ञातव्य है और इस धर्म व्यवहार के पञ्च ज्ञानेन्द्रियों या पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, मन व आत्मा ये सात हाथों के समान वर्तमान है तथा उक्त प्रकार से बद्ध व्यवहार भी ज्ञातव्य है। रूपक-व्यतिरेक अलङ्कारयुक्त मन्त्र भी कितना सहज है— द्वा सु॑प॒र्णा स॒युजा॒ सखा॑या समा॒नं वृ॒क्षं परि॑ षस्वजाते। तयो॑र॒न्यः पिप्प॑लं स्वा॒द्वत्त्यन॑श्नन्न॒न्यो अ॒भि चा॑कशीति।। (ऋ० १/१६४/२०) अर्थात् हे मानवों! जो सुन्दर पंखों वाले, समान सम्बन्ध रखने वाले, मित्र तुल्य वर्तमान-पखेरू एक जो काटा जाता इस वृक्ष का आश्रय ग्रहण करते हैं, उनमें से एक उस पेड़ के परिपक्व फल रसावादुपन से भक्षण करता है तथा अन्य न भक्षण करता हुआ सभी ओर देखता है।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 133 छंद- किसी साहित्यक पद्यरचना में छन्दों का विशेष महत्त्व है। वेद, विशेषतः ऋग्वेद प्रायः छन्दोबद्ध रचना है। वेदों में छन्दों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए पाणिनि ने जो विचार अपनी पाणिनीय शिक्षा में प्रकट किया है, उनका अर्थ है कि बिना छन्दों के ज्ञान के मन्त्रों को पढ़ना-पढ़ाना या मन्त्रों का स्वयं उच्चारण करना पाप का हेतु बन जाता है। इतना ही नहीं ऐसे गुरु या याजक को मरने पर वृक्षादि स्थुणु योनि प्राप्त होती है अथवा उसकी अधोगति होती है। ऋग्वेद में प्रायः सात छन्दों का प्रयोग हुआ है। ये छन्द हैं- १. गायत्री, २. उष्णिक, ३. अनुष्टुप, ४. त्रिष्टुप, ५. बृहती, ६. जगती और ७. पंक्ति। इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वेद की भाषा, शैली, रस, अलङ्कार, छन्द आदि काव्यगत विशिष्टताएँ अपना अनुपम महत्त्व रखती हैं, अतएव विद्वानों के द्वारा इन गुणों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। ऋग्वेदीय काव्य की विशेषताओं के सम्बन्ध में राहुल जी का कथन निष्कर्ष रूप में अति समीचीन है- "ऋग्वेद में जहाँ तहाँ सुन्दर काव्य की जो छटा मिलती है, उससे पता लगता है कि ऋग्वैदिकआर्य कविता प्रेमी थे। उनके मनोरञ्जन के लिए सुन्दर कविताएँ रची जाती थीं। उनके गाने का ढंग क्या था, वह सामगान से पता लग सकता है। उससे भी अधिक वास्तविकता के समीप हम तब पहुँचेगे, यदि हमारे लोकगीतों के तुलनात्मक अध्ययन (विशेष कर हिमालय की कितनी ही पिछड़ी जातियों के लोकगीतों के तुलनात्मक अध्ययन) से किसी निष्कर्ष पर पहुँचे। किसी लोकगीतों के वाक्यविन्यास चाहे चिरजीवी न हों, पर उनके लय या गाने के ढंग शताब्दियों और सहस्राब्दियों तक बने रहते हैं। इसलिए यदि हमारे देश और कितने ही पश्चिमी देशों के वर्तमान लोकगीतों के साथ सामगान की तुलना की जाय तो सप्तसिन्धु के आर्यों के साथ गाने के ढंग को जाना जा सकता है।" उपसंहार : इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वेद के महत्त्व का कारण उसकी विषय वस्तु की व्यापकता है। ऋग्वेद में धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, आर्थिक, दार्शनिक एवं साहित्यिक समस्त आवश्यक विषयों का प्रतिपादन हुआ है। यज्ञों की महिमा, देवताओं की उपासना, ईश्वर के विविध रूप, पुरातन धार्मिक मान्यताओं, पाप-पुण्य की विवेचना, स्वर्ग-नरक, मोक्ष, पुनर्जन्म, लोक-परलोक, आस्तिक-नास्तिक, धर्म-अधर्म आदि धर्म सम्बन्धी तथ्यों का जहाँ इसमें प्रकटीकरण है, वहीं आर्यों के जीवन-दर्शन, उत्तमाचरण, शिष्टाचार, सत्य-मिथ्या, हिंसा, अहिंसा का अन्तर, पाप-पुण्य, विवेक, हेय उपादेय आदि सांस्कृतिक विषय निरूपित हैं। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 134 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता समाजविज्ञान की दृष्टि से वर्ण-व्यवस्था, समस्त वर्णों के कर्तव्य एवं अधिकार, समष्टि व व्यष्टि का सम्बन्ध, विवाह संस्कार, नगर, पुर तथा ग्रामादि, भोजन-पान, वेशभूषा, साज-सज्जा, अलंकरण आदि के विषय में उपयोगी सामग्री इसमें उपलब्ध होती है। ऐतिहासिक तत्त्वों में पुरातत्त्व, युग, कल्प, प्रलय, ऋषि एवं राजाओं के वंशक्रम, देवासुर संग्राम तथा इन्द्र-वृत्र युद्ध सम्बन्धी प्रामाणिक जानकारी वर्णित है। राजा के अधिकार व कर्तव्य, राज्य की शासन व्यवस्था, संघ-शासन, राजतन्त्र तथा प्रजातन्त्र, राष्ट्र की कल्पना, राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, राजा का निर्वाचन, राज्याभिषेक, प्रजा के अधिकार तथा कर्तव्यादि विभिन्न राजनीति सम्बन्धी विषयों का भी इसमें विवरण किया गया है। कृषि, अन्न, कृषि के उपकरण, क्षेत्रों का माप, व्यापार, पशुपालन, जीविका के साधन आदि अनेक आर्थिक विषयों का भी ऋग्वेद में समावेश है। ऋग्वेद में दार्शनिक विवेचन भी पर्याप्त है। पुरुष-सूक्त तथा नासदीय- सूक्त में सृष्टि का उद्भव बतलाया गया है। इसमें ब्रह्म, ईश्वर, जीव, माया, एकेश्वरवाद, बहुदेववाद, पुनर्जन्म, मोक्ष आदि गहन विषयों पर भी विचार प्रस्तुत किये गये हैं। आख्यान एवं सम्वाद सूक्तों का साहित्यिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व है। अतः अन्त में हम कह सकते हैं कि ऋग्वेद आर्य संस्कृति का विश्वकोश है। डॉ० जी०एस० सुकणकर का कथन वस्तुतः सत्य है— "Rgveda is the oldest record of the Aryans whose immediate descendants we are." (Ghata's Lectures on Rgveda) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri यजुर्वेद वैदिक संहिताएँ मुख्यतः चार प्रकार की होती हैं- ऋक्संहिता, यजुःसंहिता, सामसंहिता तथा अथर्वसंहिता। ऋक्संहिता के मन्त्रों का लक्ष्य देवताओं का आह्वान है। इस संहिता का विस्तृत विवेचन पिछले अध्याय में किया जा चुका है। यहाँ पर यजुर्वेद का विस्तारपूर्वक विवेचन किया जा रहा है। यजुर्वेद में यजुषों का संग्रह है। विद्वानों ने 'यजुष' शब्द की भिन्न-भिन्न व्युत्पत्तियाँ की है। कतिपय निम्नलिखित हैं- (क) यास्कानुसार यज् (यज्ञ करना) धातु से यजुष शब्द निर्मित हुआ- 'यजुर्यजतेः।' तात्पर्य यह है कि यज्ञ के लिए जो मन्त्र सर्वाधिक उपयोगी हैं, उनका अभिधान 'यजुष्' है। (ख) 'इज्यतेऽनेनेति यजुः' जिसके द्वारा यज्ञ किया जाय, वह 'यजुष्' कहलाता है। (ग) जैमिनि के अनुसार- 'शेषे यजुः शब्दः', इसका तात्पर्य यह है कि ऋक् तथा साम से भिन्न मन्त्र 'यजुष्' है। (घ) 'गद्यात्मको यजुः' अर्थात् गद्यात्मक मन्त्रों की संज्ञा 'यजुष्' है। उपर्युक्त 'यजुष्' शब्द की व्याख्याएँ भले ही अनेक हों किन्तु उनका अभिप्राय लगभग समान है। अतः यज्ञ की दृष्टि से यजुर्वेद का विशेष महत्त्व है। यह 'अध्वर्युवेद' कहलाता है क्योंकि 'यज्ञ' में 'अध्वर्युः' संज्ञक पुरोहित की यह अपनी संहिता है। याग के चारों पुरोहितों में अध्वर्यु का श्रेष्ठ स्थान है। वही यज्ञ का निर्माता है। निम्नलिखित मन्त्र में यही तथ्य प्रकट किया गया है- ऋचां॒ त्वः पोष॑मास्ते पुपु॒ष्वान्‍गाय॒त्रं त्वो॑ गायति॒ शक्व॑रीषु। ब्रह्मा॒ त्वो व॑दति जातवि॒द्यां य॒ज्ञस्य॑ मा॒त्रां वि मि॑मीत उ॒ त्वः॥ (ऋ० १०/७१/११) अर्थात् कोई विद्वान् वेद मन्त्रों के पोषण को पुष्ट करता हुआ रहता है। कोई शक्वरी नामक ऋचाओं में गाने योग्य मन्त्रों (साम) को गाता है। कोई यज्ञ का ब्रह्म या अथर्ववेद का ज्ञाता शिल्प विद्या को कहता है और कोई यज्ञ की विधि को विशेष रीति से बतलाता है। अध्वर्यु शब्द का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ यांस्क ने इस प्रकार से किया है- 'अध्वरं युनक्ति, अध्वरस्य नेता'। इसका अभिप्राय यह है कि अध्वर्यु ही यज्ञ का सम्पादक तथा नेता है। कतिपय दृष्टियों से भले ही ऋग्वेद अधिक महत्त्वशाली हो परन्तु यज्ञ में सर्वाधिक उपयोगी यजुर्वेद ही है। प्रख्यात भाष्यकार CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

136 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता आचार्य सायण ने भी इसीलिए ऋग्वेद से भी पूर्व यजुर्वेद की तैत्तरीय संहिता पर भाष्य लिखा। इसका कारण बतलाते हुए उन्होंने स्वयं कहा- "एवं सति अध्वर्युसम्बन्धिनि यजुर्वेद निष्पन्नं यज्ञशरीरमुपजीव्यं तदपेक्षितौ स्तोत्रशास्त्ररूपौ अवयवौ इतरेण वेदद्वयेन पूर्य्यते इत्युपजीव्यस्य यजुर्वेदस्य प्रथयतो व्याख्यानं युक्तम्।" तथा आध्वर्यवस्य यज्ञेषु प्राधान्याद् व्याकृतः पुरा। यजुर्वेदोऽथ होत्रार्थमृग्वेदो व्याकरिष्यते॥' अर्थात् यज्ञ में आध्वर्यव की प्रधानता होने के कारण पहले यजुर्वेद की व्याख्या की गई, तत्पश्चात् होत्र के लिए ऋग्वेद की व्याख्या की गई। ऋग्वेदीय ऋचाओं की पुनरावृत्ति :- प्राचीन काल में यजुर्वेद के प्रमुख विषयों का ऋचाओं में ही प्रतिपादन हुआ। तत्पश्चात् विषयों के स्पष्टीकरण के लिए इसमें गद्यांशों का भी समावेश हो गया। अतः इसे 'यजुः' के नाम से सम्बोधित किया गया और इसी आधार पर इस वेद को 'यजुर्वेद' कहा जाने लगा। यजुर्वेद में उपलब्ध गद्यभाग काव्य, लय तथा ताल से अनुगत होता है। ध्यान दिए जाने पर यह ज्ञात होता है कि यजुर्वेद में उपलब्ध अधिकांश ऋचाएँ ऋग्वेद में भी दृष्टिगोचर होती हैं। इन समान ऋचाओं के यजुर्वेद में मात्र पाठान्तर ही प्राप्त होते हैं। यजुर्वेद की ऋचाएँ ऋग्वेदीय मन्त्रों से पूर्वकालीन तो नहीं है, किन्तु फिर इस सामान्य परिवर्तन के साथ ऋचाओं की पुनरावृत्ति का कारण क्या है? विचार करने पर विदित होता है कि यह सब अकारण नहीं है अपितु इसमें कोई विशेष उद्देश्य निहित है। इनका उद्देश्य याज्ञिक नियमों को निकट ऋचाओं की स्थापना करना है। इसीलिए यजुर्वेद में ऋग्वेद का कोई सम्पूर्ण सूक्त नहीं उद्धृत किया गया, अपितु ऋचाओं की पृथक्-पृथक् आवृत्ति ही दृष्टिगत होती है। सम्प्रदाय :- यजुर्वेद कर्मकाण्ड का वेद है। यह दो सम्प्रदायों से सम्बद्ध है। इन सम्प्रदायों की संज्ञा निम्नलिखित है- (१) ब्रह्म सम्प्रदाय, (२) आदित्य सम्प्रदाय। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार :- 'आदित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते' (शत०- १४/९/५/३३) अर्थात् आदित्ययजुः शुक्लःयजुष् के नाम से जाना जाता है और यह याज्ञवल्क्य ऋषि के द्वारा व्याख्यात है। इसीलिए शुक्लयजुर्वेद को आदित्य सम्प्रदाय का प्रतिनिधि माना जाता है। कृष्णयजुर्वेद को ब्रह्म-सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व प्राप्त है। यह दक्षिण में अधिक प्रचलित है।

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 137 कृष्ण तथा शुक्ल यजुर्वेद :- कृष्ण यजुर्वेद के कृष्णत्व का तथा शुक्ल यजुर्वेद के शुक्लत्व का क्या कारण है ? यह भेद किस आधार पर किया गया है ? इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर विदित होता है कि शुक्ल यजुर्वेद में केवल प्रार्थनाओं एवं याज्ञिक नियमों से सम्बन्धित वे मन्त्र हैं जो यज्ञ के अवसर पर पुरोहित द्वारा उच्चारित होते हैं। इसके विपरीत कृष्ण यजुर्वेदीय शाखाओं में मन्त्रों के साथ याज्ञिक विधियों तथा उन विधियों पर वाद-विवाद युक्त अंशों का भी समावेश हुआ है। यही पृथक्-पृथक् प्रकार का संयोजन तथा रचनाक्रम कृष्ण यजुर्वेद के कृष्णत्व का तथा शुक्ल यजुर्वेद के शुक्लत्व का हेतु है तथापि यजुर्वेद के कृष्ण एवं शुक्ल रूप में विभाजन के आधार को लेकर भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किए हैं। इनमें से कतिपय प्रमुख मत निम्नलिखित हैं- मैक्डानल का मत :- प्रो० मैक्डानल का मत है कि शुक्ल यजुर्वेद का वर्ण्यविषय निर्मल, स्पष्ट तथा सुबोध है, अतः वह शुक्ल है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद का वर्ण्यविषय सांकर्य युक्त है। कृष्ण यजुर्वेद में पद्य के साथ गद्य का भी सम्मिश्रण है। यह शैली पाठकों को क्लिष्ट प्रतीत होती है, अतः यह कृष्ण है। डॉ० मङ्गलदेव शास्त्री का मत :- डॉ० मङ्गलदेव शास्त्री ने भी इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उनका मत है कि शुक्ल यजुर्वेद का उत्तर भारत में व्यापक प्रसार तथा प्रचार है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद दाक्षिणात्यों में अधिक प्रचलित है। दक्षिण में अधिक प्रचलित होने के कारण कृष्ण यजुर्वेद में वैदिकेतर विचार धारा का भी पर्याप्त समावेश उपलब्ध होता है। शुक्ल यजुर्वेद इस प्रभाव से वंचित है। उसमें विशुद्ध वैदिक तत्त्वों का निरूपण हुआ है। अतः शास्त्री जी के विचार से शुद्ध विचार धारा से सज्जित होने के कारण शुक्ल यजुर्वेद को 'शुक्ल' तथा मिश्रित विचार धारा के संयोजन से कृष्ण यजुर्वेद को 'कृष्ण' अभिधान प्राप्त हुआ। विन्टरनिट्ज का मत :- विन्टरनिट्ज ने कृष्ण तथा शुक्ल यजुर्वेद के इस प्रकार के विभाजनों को स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने इनके विभाजन को सामान्य भाव से निरूपित किया है। उनके अनुसार कृष्ण यजुर्वेद के सापेक्ष में शुक्ल यजुर्वेद अधिक प्रचलित है, इसीलिए अधिक महत्त्वपूर्ण भी है। इसके अतिरिक्त इनके विभाजन का कोई विशेष कारण नहीं है। पं० बलदेव उपाध्याय का मत :- उपाध्याय जी ने पुराणों में प्राप्त एक साम्प्रदायिक कथा को कृष्ण तथा शुक्ल के नामकरण का आधार बतलाया है। इन्हीं के शब्दों में यह कथा निम्नलिखित है- "वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को यजुर्वेद सिखलाया जिन्होंने इसे याज्ञवल्क्य ऋषि को पढ़ाया। किसी कारण गुरु अपने शिष्य से CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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138 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता रुष्ट हो गए और पठित विद्या को उनसे माँगने लगे। याज्ञवल्क्य ने पठित यजुषों का वमन कर दिया। तब अन्य शिष्यों ने तित्तिर रूप धारण कर उन्हें चुग लिया। यही कृष्ण यजुः हुआ, उधर याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना कर नवीन यजुषों को उत्पन्न किया, वही हुआ शुक्ल यजुर्वेद। इन दोनों के रूप में महान् अन्तर है। शुक्ल यजुः में केवल मन्त्रों का ही संग्रह है जिसमें विनियोग वाक्य नहीं है। अतः ब्राह्मण से अभिश्रित होने के कारण यह शुक्ल कहा जाता है। परन्तु 'कृष्ण यजुर्वेद' में छन्दोबद्ध मन्त्रों तथा गद्यात्मक विनियोगों का मिश्रण है। इसी मिलावट के कारण इसे कृष्ण यजुर्वेद कहते हैं। शुक्ल यजुर्वेद की संहिता वाजसनेयी संहिता कहलाती है क्योंकि सूर्य ने वाजी (घोड़े) का रूप धारण कर इसका उपदेश दिया था।'' शुक्ल यजुर्वेद की श्रेष्ठता- पाश्चात्य तथा पौरस्तय वेदज्ञों ने कृष्ण यजुर्वेद की तुलना में शुक्ल यजुर्वेद को अधिक महत्त्वपूर्ण तथा उत्तम बतलाया है। इसीलिए यजुर्वेद के वर्ण्य विषय के विवेचन में शुक्ल यजुर्वेद को ही सर्वत्र आधार बनाया है। यजुर्वेद में मुख्यतः यज्ञ का ही प्रतिपादन हुआ है। यज्ञ के सम्पादन से ही मानव राक्षसी शक्तियों तथा अमानवीय प्रवृत्तियों को परास्त कर अमृतत्व को प्राप्त करता है- 'उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्य्यगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥' अर्थात् अज्ञान से प्रकाश की ओर अग्रसर होना, मृत्यु से अमरता की ओर अग्रसर होना, आत्मा की निरन्तर समुन्नति ही अमृतत्व है। कृष्ण यजुर्वेद की अपेक्षा शुक्ल यजुर्वेद में मानवीय जीवन के शुक्ल पक्ष को अधिक स्थान मिला है। उसमें जीवन का उदात्त तथा समुज्ज्वल पक्ष के महत्त्व को स्वीकार किया गया है- 'अस्माकं सन्त्वाशिषः सत्यावः सन्त्वाशिषः॥' (२१६) अर्थात् हमारे नेक विचार तथा श्रेष्ठ मनोकामनाएँ पूर्णता को प्राप्त हों। यजुर्वेद में दीर्घ जीवन की कामना की गई है- 'कुर्वन्नेवेह कर्माणिजिजीविषेच्छतं समाः।' अर्थात् यहाँ हम कर्मरत होकर सौ वर्ष तक जीवित रहें। शुक्ल यजुर्वेद में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का स्पष्ट उद्घोष किया गया है-

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 139 ‘मित्रास्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।’ (३६/१८) अर्थात् मैं मित्र की दृष्टि से समस्त प्राणियों को सम्यक देखूँ। वर्णाश्रम व्यवस्था के बारे में भी यजुर्वेद मन्त्रों में किंचित जानकारी दी गई है— ‘ब्राह्मणे॑ ब्राह्मणं क्षत्राय राजन्य मरुते वैश्य तपसे शूद्रम्।’ शुक्ल यजुर्वेद में सूर्य देव की भी अति मनोहर स्तुति की गई है— ‘आकृष्णेन रजसा वर्तमानोनिवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्येन सविता रथेनादेवो ययाति भुवनानि पश्यन्॥’ (अ.३३/ म०४३) अर्थात् हे मानवों! जो अपने ज्योतिःस्वरूप व रमणीय स्वरूप के आकर्षण से परस्पर सम्बद्ध लोक या मात्रा के साथ अपने भ्रमण की आवृत्ति करता हुआ, सब लोकों को दिखाता हुआ, प्रकाशमान सूर्यदेव, जल या अविनाशी आकाशादि और मरणधर्मा प्राणियों को अपने-अपने प्रदेश में स्थापित करता हुआ उदयास्त समय में आता जाता है वह ईश्वर-निर्मित सूर्यलोक है। यजुर्वेद में ओषधियों का भी सुन्दर निरूपण हुआ है। यथा— यत्रौषधीः॒ सम॒ग्म॑त राजा॑नः॒ समि॑ताविव। विप्रः॒ स उ॑च्यते भि॒षग्र॑क्षो॒हामी॑व॒चात॑नः॥ (यजु० १२/८०) अर्थात् हे मानवों! तुम लोग जिन स्थानों में सोमलतादि ओषधि होती हो, उनको जैसे राजधर्म से युक्त वीरपुरुष युद्ध में शत्रुओं को प्राप्त करते हैं, वैसे प्राप्त हो, जो दुष्ट लोगों का विनाशक रोगों को निवृत्त करने वाला बुद्धिमान वैद्य हो, वह तुम्हारे प्रति औषधियों के गुण का उपदेश करे और औषधियों का तथा उस वैद्य का सेवन करो। तथा या फलिनीः या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। वृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चत्वं हंसः॥ (अ०१२/म०८९) अर्थात् हे मानवों! जो अतिफलसम्पन्न, जो फलहीन, जो पुष्पहीन तथा जो अतिपुष्पसम्पन्न वेदवाणी के स्वामी ईश्वर से उत्पन्न की हुई औषधि से हम को दुःखदायी रोग से जैसे छुड़ावें, वे तुम लोगों को भी वैसे रोगों से छुड़ावें। अतः उपर्युक्त उत्कृष्ट विषय सामग्री के समावेश होने के कारण शुक्ल यजुर्वेद, कृष्ण यजुर्वेद की तुलना में श्रेष्ठ कहलाता है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 140 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यजुर्वेद की शाखाएँ - यजुर्वेद की शाखाओं की निश्चित संख्या के निर्धारण में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने 'एकशत यजुः' के द्वारा यजुर्वेद की १०१ शाखाओं का उल्लेख किया है। शौनक ने चरणव्यूह में यजुर्वेद की ८६ शाखाएँ बतलाई हैं। इस वेद की सूतसंहिता, ब्रह्माण्डपुराण तथा स्कन्दपुराण के अनुसार १०७ तथा मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार १०९ शाखाएँ थीं। सम्प्रति यजुर्वेद की कुल ६ शाखाएँ प्राप्त होती हैं। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएँ इस प्रकार हैं- (१) तैत्तिरीय शाखा, (२) मैत्रायणी शाखा, (३) कठ शाखा, (४) कठ कपिष्ठल शाखा। शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएँ उपलब्ध हैं- (१) वाजसनेयी शाखा (२) काण्व शाखा विषय विवेचन - शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है। वाजसेनी के पुत्र याज्ञवल्क्य इसके द्रष्टा हैं, इसीलिए इसका शुक्ल यजुष्, यह नाम पड़ा। यह भी प्रचलित है कि वाजी का रूप धारण करके याज्ञवल्क्य को शुक्ल यजुष् की प्राप्ति वरदान रूप में हुई, अतः इसकी वाजसनेयी संहिता संज्ञा हुई। इस संहिता में कुल ४० अध्याय हैं जिनमें से अन्तिम १५ अध्याय खिलरूप से प्रसिद्ध हैं और इन्हें अवान्तरयुगीय माना जाता है। सम्पूर्ण यजुर्वेद में मुख्य रूप से कर्मकाण्ड का प्रतिपादन हुआ है अतः समस्त शाखाओं में विषयवस्तु प्रायः समान है। इसलिए वाजसनेयी संहिता के विषयों का विस्तृत विवेचन यहाँ प्रस्तुत है। यही विवेचन अन्य यजुर्वेदीय संहिताओं के विषयों के परिचयार्थ भी पर्याप्त है। वाजसनेयी संहिता के समस्त चालीस अध्यायों में विशाल यज्ञों के प्रार्थना सम्बन्धी मन्त्रों का संग्रह है। इनमें यज्ञों के महत्व तथा याज्ञिक-क्रियाओं के विषय में में सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है। जिन प्रमुख यज्ञों का इसमें निरूपण है, उनके नाम निम्नलिखित हैं- (१) दर्शयज्ञ (२) पौर्णमास यज्ञ (३) चातुर्मास्ययज्ञ (४) सोमयाग (५) वाजपेययज्ञ (६) राजसूय यज्ञ (७) शतरुद्रीययज्ञ (८) सौत्रामणी यज्ञ (९) अश्वमेधयज्ञ (१०) पुरुषमेधयज्ञ (११) सर्वमेधयज्ञ (१२) पितृमेधयज्ञ (१३) प्रवर्ग्य यज्ञ आदि। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 141 जो अन्य विषय इसमें निरूपित हैं— (१) अग्निवेदी का निर्माण, (२) मन की महिमा, (३) प्रहेलिकाएँ, (४) देवों की विविध उपाधियाँ आदि। २६ अध्याय से २९ अध्याय तक खिलसूक्त तथा ४०वाँ अध्याय ईशावास्योपनिषद् है। इन सबका विस्तृत विवरण निम्नलिखित है— दर्शयज्ञ :- दर्शयज्ञ से सम्बन्धित मन्त्रों का विन्यास प्रथम अध्याय में मिलता है। वस्तुतः दर्श, अमावस्या है जिसमें रात्रि में आकाश में चन्द्र दर्शन नहीं होता। अतः पृथ्वीवासी चन्द्र अदर्शन से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिए ही ज्योत्सना की कामना करते हैं। यह दोष सविता दूर कर सकता है तथा शीतलता प्रदान करने की शक्ति जल में है। औषधियाँ चन्द्रमा द्वारा पोषित होती हैं। दर्श-यज्ञ इन सबको भोज्य पदार्थ प्रदान करता है। यही संक्षेप में दर्श-यज्ञ का विषय है। प्रथम अध्याय के अन्तिम मन्त्रों में देव यज्ञ की ओर संकेत किया गया है— स॒वि॒तुस्त्वा॑ प्र॒सव॑ उत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॑:। तेजो॑ऽसि शु॒क्रम॑स्य॒मृत॑मसि॒ धाम॒ नामा॑सि प्रि॒यं दे॒वाना॒मना॑धृष्टं देव॒यज॑नमसि।। (यजु० १/३१) अर्थात् जो यज्ञ परमेश्वर द्वारा उत्पन्न किए गए विश्व में सदैव पवित्र एवं प्रकाशवान् सूर्य की रश्मियों के साथ मिलकर समस्त पदार्थों को शुद्ध करता है, वह यज्ञ, यज्ञकर्ता को उत्कृष्टता के साथ पवित्र करता है। हे ब्रह्मन्! जिस कारण आप स्वयं प्रकाशवान् शुक्र नाशरहित समस्त पदार्थों के आधार वन्दनीय विद्वानों के प्रीतिकारक एव अन्य विद्वानों के पूज्य हैं, इससे मैं आपका ही आश्रय करता हूँ। पौर्णमास-यज्ञ :- पौर्णमास-यज्ञ विषयक मन्त्रों का संग्रह द्वितीय अध्याय में प्राप्त होता है। यह यज्ञ पूर्णमासी से सम्बन्धित है। द्वितीय अध्याय के प्रथम मन्त्रों में पूर्णिमा के आकर्षण का संकेत मिलता है। यह संकेत हमें ‘कृष्णोऽसि’ पद से मिलता है। इस अध्याय के अन्तिम मन्त्रों में पितरों का वर्णन है। जो व्यक्ति अपनी स्वार्थ पूर्ति को त्यागकर जनहित के कार्य करते हैं, वे ‘पितर’ होते हैं। मृत्यु के पश्चात् ये चन्द्रलोक के वासी बनते हैं। पितरों को किन पदार्थों से सत्कार करना चाहिए, इस विषय में निम्नलिखित मन्त्र में उपदेश निहित है— ऊर्जं॒ वह॑न्तीर॒मृतं॑ घृ॒तं पय॑: की॒लालं॑ प॒रिस्रु॒तम्। स्व॒धा स्थ॑ त॒र्पय॑त मे पि॒तॄन्।। (यजु० २/३४) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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142 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् हे पुत्रों! तुम मेरे पितरों को अनेक प्रकार के उत्तम रस, सुख प्राप्त करने वाले स्वादिष्ट जल, सभी व्याधियों की नाशक औषधि, मिष्ठानादि पदार्थ, दूध, घी, उत्तम विधि से पकाया गया अन्न तथा रस से परिपूर्ण फल प्रदान करके तृप्त करो। अग्निहोत्र एवं चातुर्मास्य यज्ञ :- तीसरा अध्याय अग्निहोत्र तथा चातुर्मास्य यज्ञ का विवरण प्रस्तुत करता है। अग्नि की स्थापना एवं प्रतिदिन प्रातः एवं सायं यज्ञ का सम्पादन 'अग्निहोत्र' कहलाता है। इस अध्याय की प्रथम ऋचा में ही अग्निहोत्र के सम्पादन का उपदेश दिया गया है। इसी अध्याय में चातुर्मास्य यज्ञ से सम्बन्धित मन्त्रों में याजक प्रार्थना करता है- इन्धा॑नास्त्वा श॒तमिं॑ हिमा॑ द्यु॒मन्त॒ समि॑धीमहि। वय॑स्वन्तो वय॒स्कृतँ॑ सह॑स्वन्तः सह॒स्कृतम्। अग्ने॑ सपत्न॒दम्भ॑नमदब्धासो अदा॒भ्यम्। चि॒त्राव॑सो स्व॒स्ति ते॑ पारम॑शीय॥ (३/१८) हे अग्निदेवता! आप अनन्त प्रकाश वाले, तेजस्वी, शत्रुविनाशक, सहनशील, आश्चर्यरूप धनसम्पन्न एवं अहिंसक हैं। सौ वर्षों तक आपको प्रकाशित करते हुए, अग्निहोत्रादि करते हुए, हम भी पूर्ण आयु वाले, शक्तिसम्पन्न एवं अदब्ध, अविजेय बने रहें। हे परमेश्वर! हमें पाप से दूर करो। हमारा जीवन मङ्गलमय बने। जो यज्ञ प्रत्येक चार मास के पश्चात् किया जाता है, वह 'चातुर्मास्य' यज्ञ कहलाता है। इसके लिए धनधान्य से परिपूर्ण गृहस्थाश्रम की आवश्यकता होती है। सोमयाग :- सोमयगों का वर्णन चतुर्थ से लेकर अष्टम अध्याय तक उपलब्ध होता है। अग्निष्टोम के प्रकृतियाग होने से विस्तृत विवेचन किया गया है। इन यज्ञों में सोम को पत्थरों से कूटकर, रस निकाल कर दूध में मिलाया जाता है। उससे प्रातः काल, मध्याह्न तथा सांयकाल अग्नि से हवन किया जाता है। इसकी 'सवन' संज्ञा है जो तीनों कालों के अनुसार विभिन्न संज्ञाओं से प्रसिद्ध है। सोम यागों का उद्देश्य जीवन को संयत क्रम में बाँधना है। इनसे हमारे संकल्पों को शक्ति प्रदान होती है। सोमरस तो शारीरिक शक्ति को प्राण देता है तो मानसिक शक्ति को ऋक्-यजु-साम का ज्ञान भी प्रदान करता है। वाजपेययज्ञ :- नवम अध्याय का सम्बन्ध 'वाजपेय यज्ञ' से है। 'एकाह' अर्थात् एक दिन में समाप्त सोमयागों में 'वाजपेय' अन्यतम है। याजक अन्न, बल, ज्ञान अथवा किसी भी प्रकार की शक्ति ग्रहण करना चाहता है तो उसको इन सबको

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 143 आत्मसात् करना पड़ता है। तब वह वाजपेयी बनने का अधिकारी होता है। जो वाज को पेयरूप में ग्रहण कर लें तथा उसे व्यर्थ न जाने दें, वही वाजपेय यज्ञ का कर्ता कहलाता है। यह यज्ञ मूलतः योद्धाओं तथा राजाओं द्वारा किया जाता था। इसका सम्बन्ध घोड़ों की धावन प्रतियोगिता से जोड़ा जाता है। इसमें सुरामिश्रित सोमरस का पान होता था। इस सुरापान का ब्राह्मण-ग्रन्थों के काल में निषेध किया गया था। राजसूय यज्ञ :- दशम अध्याय में राजसूय यज्ञ वर्णित है। यह राजा जनक के राज्याभिषेक के अवसर पर किया गया था। राज्याभिषेकोपरान्त राज्य का भार राजा के शिर पर आ जाता है जिसका उसे सफलतापूर्वक निर्वाह करना पड़ता है। इसीलिए इस अध्याय में राजनीति, राजतन्त्र तथा राजोपयोगी शिक्षा का निरूपण हुआ है। अन्तिम मन्त्र में राजा तथा प्रजा के सम्बन्ध का निर्देश है- पु॒त्रमि॑व पि॒तरा॑वि॒श्विनो॒भेन्द्रा॑वथुः का॒व्यैर्ऋधं॒ सना॑भिः। यत्सु॒रामं॒ व्यपि॑बः॒ शची॑भिः॒ सर॑स्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्॥ (१०/३४) हे विशिष्ट धन से सम्माननीय समस्त सभाओं के स्वामी! आप बुद्धिबल से आरामदायक रस को विविध प्रकार से पीवें, आप विद्या से उत्तम शिक्षा प्राप्त वाणी के समान स्त्री सेवन करे। राजा से आज्ञा प्राप्त (तुम दोनों) सेनापति तथा न्यायाधीश, परम विद्वानों द्वारा किए कर्मों से जैसे माता-पिता अपने सन्तान की रक्षा करते हैं वैसे समस्त राज्य की रक्षा करें। अग्निचयन :- अध्याय ११ से १८ तक 'अग्निचयन' का विस्तारपूर्वक वर्णन है। अग्निचयन का अभिप्राय है- 'याज्ञीय होमाग्नि के लिए वेदिका निर्माण।' यह गृहस्थ के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके निर्माण में १०,८०० ईंटों का प्रयोग होता है। यज्ञकुण्ड पंख खोले पक्षी के आकार का बनाया जाता था। वैखानस गृह्यसूत्र तथा शतपथ ब्राह्मण में वेदि तथा उसके विविध ईंटों के आध्यात्मिक रूप का व्याख्यान बड़ी मार्मिकता के साथ किया गया है। ११वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में अग्निचयन का स्पष्ट उल्लेख है। यह न केवल पार्थिव अग्निचयन का ही अपितु मानसिक एवं आध्यात्मिक अग्निचयनों का भी निर्देश कर रहा है- यु॒ञ्जानः प्र॑थ॒मं मन॑स्त॒त्त्वाय॑ सवि॒ता धियः॑। अ॒ग्नेर्ज्योति॑र्नि॒चाय्य॑ पृथि॒व्या अध्याऽभ॑रत्॥ (११/१) अर्थात् जो ऐश्वर्य का इच्छुक मनुष्य उन परमेश्वरादि पदार्थों के ज्ञान के लिए प्रथम विचार स्वरूप अन्तःकरण की वृत्तियों को योगाभ्यास तथा भूगर्भविद्या में युक्त CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 144 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता हुआ पृथिवी आदि में निवास करने वाली बिजली के प्रकाश को निश्चय करके भूमि के ऊपर धारण करे वह योगी तथा भूगर्भविद्या का ज्ञाता होवे। शतरूद्रीययज्ञ :- १६वें अध्याय में शतरूद्रीय-यज्ञ का विवेचन है। इसमें रुद्र की कल्पना का अत्यन्त साङ्गोपाङ्ग विवरण प्राप्त होता है। वेदज्ञों में यह रुद्राध्याय अत्यन्त उपयोगी होने से अतिप्रसिद्ध है। इस अध्याय के देवता 'रुद्र' ही है। सौत्रामणी यज्ञ :- १९वें अध्याय से लेकर २१वें अध्याय तक उपलब्ध मन्त्रों में उत्सवरूपी सौत्रामणी यज्ञ का वर्णन है। इस यज्ञ में सोमरस के साथ सुरापान का भी उल्लेख है। कहा भी गया है- “सौत्रामण्यां सुरां पिबेत्।” सोमरस को निचोड़कर सुरा मिलाकर पान करना बलवर्द्धक होता है। यह सुरा अश्विनीकुमार सरस्वती तथा इन्द्र को आहुति द्वारा दी जाती है। इस यज्ञ को अश्विनी कुमार ने इन्द्र के रोग दूर करने के लिए किया था क्योंकि अधिक सोमपान से इन्द्र रोगग्रस्त हो गए थे। यह यज्ञ किसी भी प्रकार के व्यक्ति द्वारा अपनी सफलता के लिए किया जाता था। यथा राजा द्वारा राज सिंहासन की पुनः प्राप्ति के लिए, विजयेच्छु योद्धा के लिए, ऐश्वर्याभिलाषी वैश्य के लिए इस यज्ञ का अनुष्ठान विहित है। अश्वमेध यज्ञ :- अध्याय २२ से २५ तक अश्वमेध यज्ञ से सम्बन्धित प्रार्थनाओं का संग्रह है। यह यज्ञ सार्वभौम आधिपत्य के अधिकारी सम्राट द्वारा किए जाते रहे हैं। इस यज्ञ का सम्पादन चक्रवर्ती सम्राट द्वारा ही किया जा सकता है। अध्याय २० के प्रथम १३ मन्त्रों में राजतन्त्र की उपमा मानवीय शरीर से दी गई है। इस यज्ञ में घोड़ा छोड़ा जाता है। जिस राज्य में घोड़ा निर्वाद रूप से अतिक्रमण कर लेता है, वह राज्य अश्वमेध यज्ञ के कर्ता के अधीन हो जाता है। जहाँ अश्व को बाधा पहुँचाई जाती है, वहाँ संग्राम होता है तथा संग्राम का परिणाम ही चक्रवर्ती सम्राट के पद का निर्णायक होता है। अध्याय २२ का प्रथम मन्त्र ही अश्व छोड़े जाने की प्रक्रिया बतलाता है। अश्व छोड़े जाने के समय निम्नलिखित ऋचा का पाठ किया जाता है- स्वगा॒ त्वा दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ ब्रह्म॒न्नश्वं॑' भुन्त्स्यामि दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ तेनं॑ राध्यासम्। तं ब॑धान दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ तेनं॑ राध्नुहि।। (२२/४) इस मन्त्र में प्रजा की ओर से पुरोहित सम्राट् को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह प्रजा के अभ्युदय तथा रक्षा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करे। सभी स्वतन्त्रता तथा ऐश्वर्य का उपभोग करें। दूसरे के हितों का सभी ध्यान रखें। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 145 खिलसूक्त :- २६वें अध्याय से ४० अध्याय तक के मन्त्रों को निःसन्देह रूप से परवर्तीकालीन रचना स्वीकार किया जाता है। इनमें से २६ से २९ अध्याय तक का अंश खिलसूक्त के नाम से जाना जाता है। विषयवस्तु की दृष्टि से खिल सूक्तों में कोई नवीन वस्तु नहीं है, अपितु पिछले अध्यायों में कथित अनुष्ठानों के सम्बन्ध में नवीन मन्त्रों द्वारा वर्णन किया गया है। पुरुषमेध यज्ञ :- पुरुषमेध यज्ञ का वर्णन ३०वें अध्याय में किया गया है। यह अध्याय एक जोड़ के सदृश प्रतीत होता है क्योंकि इस अध्याय में एक भी प्रार्थना नहीं उपलब्ध होती है। इस अध्याय में १८४ पदार्थों व व्यक्तियों का आलम्भन उपलब्ध होता है। यह आलम्भन यथार्थ आलम्भन नहीं है बल्कि पुरुष मेध यज्ञ के अवसर पर प्रतीक रूप में किया जाता था। भारत में कभी भी पुरुषमेध यज्ञ हुआ हो, ऐसा वर्णन कहीं भी इतिहास पुराणादि में उपलब्ध नहीं होता। यह यज्ञ कल्पनाप्रसूत है, इसमें पुरुष की विभिन्न प्रतिनिधिभूत वस्तुओं के लिए पृथक्-पृथक् पदार्थों में दान का विधान था। जैसे नृत्तार्थ सूत की, गीत के लिए नट की, धर्म के लिए समाचार की, पुरोहित के लिए ब्राह्मण की, राजवंश के लिए वीर योद्धा की, मरुताणों के लिए वैश्य की, संन्यासी के लिए शूद्र की, अन्धकार के लिए चोर की, नरकार्थ हत्यारे की, कामार्थ वाराङ्गना की, कोलाहलार्थ गायक की, अक्षार्थ द्यूतकर की, निद्रार्थ नेत्रहीन की, अन्यायार्थ बधिर की, यथार्थ रजक पत्नी की, कामनार्थ रजक पत्नी की, यथार्थ वन्ध्या की, आनन्दार्थ वीणा वादक की, क्रन्दनार्थ मुरली वादक की, स्वर्गार्थ खल्वाट् की तथा पृथ्वी के लिए पंगु की आलम्भन की विधि विहित है। पुरुषसूक्त :- ३१वाँ अध्याय प्रसिद्ध पुरुष-सूक्त है। यहाँ पुरुष को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में उपस्थित किया गया है। इस अध्याय को एक 'उपनिषद्' भी कहा जाता है। पुरुष-मेध-यज्ञ करते समय पुरोहित द्वारा इसी के मन्त्रों का सस्वर पाठ किया जाता है। ऋग्वेद में दशम मण्डलान्तर्गत उपलब्ध ९०वें सूक्त में संसार की उत्पत्ति पुरुषबलि के द्वारा बतलाई गई है तथा विश्व व पुरुष को अभिन्न निरूपित किया गया है। यजुर्वेदीय पुरुष सूक्त में ऋग्वेदीय पुरुष सूक्त से ८ मन्त्र अधिक मिलते हैं। सर्वमेध यज्ञ :- ३२वें तथा ३३वें अध्याय में सर्वमेध यज्ञ का वर्णन किया गया है। ३२वें अध्याय में केवल १६ तथा ३३वें अध्याय में कुल ९६ मन्त्र हैं। यह वह सर्वोत्कृष्ट यज्ञ है जिसके समाप्त होने पर यज्ञ करने वाला यजमान पुराहित को यज्ञ के पश्चात् अपना सब कुछ दक्षिणा के रूप में समर्पित करता है और शेष जीवन के निर्वाह हेतु वानप्रस्थ ग्रहण कर लेता है। यही इस यज्ञ का वैशिष्ट्य है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 146 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन की महिमा :- ३४वें अध्याय के प्रारम्भ में 'शिवसंकल्प उपनिषद्' नामक ६ मन्त्रों का सङ्कलन दृष्टिगोचर होता है। यह संकलन तथा उसकी वृत्तियों के स्वरूप निरूपण में अत्यन्त उपयोगी है। इसमें मन की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। इस मन में वेग है, कर्म को प्रेरणा देने वाली शक्तियाँ हैं, चेतना है, धृति है, त्रिकाल का ज्ञान है। इसमें तीनों वेद विद्यमान है और यह स्वयं हृदय में स्थित है। इसके अन्त में मन को 'शिव सङ्कल्प' होने की प्रार्थना की गई है, जिससे उसकी इच्छा सदैव मंगलदायक बने— सु॒षारथिरश्वा॑नि॒व॒ यन्म॑नु॒ष्या॒न्नेनीयते॒ऽभीशु॑भि॒र्वाजि॑न इव। हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यदजिरं॒ जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मन॑: शि॒वस॑न्कल्पम॑स्तु।। (३४/५) अर्थात् जो मन, जैसे सुन्दरचतुरसारथि गाड़ीवान लगाम से घोड़ों को सभी ओर से चलाता है, वैसे मनुष्यादि प्राणियों को शीघ्रतापूर्वक इधर-उधर घुमाता है तथा जैसे रस्सियों से वेग वाले घोड़ों को सारथि वश में करता तथा नियम में रखता है, जो हृदयस्थ विषयादि में प्रेरक या वृद्धादि अवस्था रहित तथा अत्यन्त वेगवान् है, वह मेरा मन मङ्गलमय नियम में इष्ट होवे। पितृमेधयज्ञ :- ३६वें अध्याय में पितृमेध सम्बन्धी मन्त्रों का संग्रह है। इसमें पितरों की संतुष्टि के लिए ऋचाएँ संगृहीत है। इसके कतिपय मन्त्र अन्त्येष्टि क्रिया से सम्बन्धित हैं। इन मन्त्रों को ऋग्वेद से ग्रहण किया गया है। प्रवर्ग्य यज्ञ :- ३६वें अध्याय से लेकर ३९वें अध्याय तक प्रवर्ग्य यज्ञ की प्रार्थनाओं का संकलन है। इन अध्यायों में प्रवर्ग्ययज्ञ का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस यज्ञ में एक थाली को यज्ञाग्नि पर खूब गर्म किया जाता है। यह थाली सूर्य की प्रतिनिधि के रूप में मानी जाती है। इस दहकती हुई अग्नि में दूध को उबाला जाता है। इस प्रकार उष्ण किया गया दूध अश्विनी कुमारों द्वारा मिलाया जाता है। इस यज्ञ में एक गूढ़ रहस्य निहित है। इसमें यज्ञ के पात्र ऐसे क्रम से रखे जाते हैं कि वह सब मिलकर एक पुरुष की आकृति का रूप धारण कर लेते हैं। यथा— दूध की थाली मस्तक हो, पावन तृण से निर्मित शिखा केशपाश हो, दो लघु दुग्धपात्र कान हों, दो छोटे सुनहले पत्ते आँखें हों, दो पात्र ऐडी हों, माड़ा हुआ आटा मेद तथा मज्जाएँ हो, दूध से मिला शहद ही रुधिर हो आदि। इसी प्रकार अन्य अंगों की भी कल्पना की गई है। यह समस्त विधान रहस्यात्मक है। ईशावास्योपनिषद् :- ४०वाँ अथवा अन्तिम अध्याय 'ईशावास्योपनिषद्' के रूप में विख्यात है। इसका यह अभिधान अपने प्रारम्भिक दो शब्दों के कारण पड़ा। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar