भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xii साथ-साथ, इस भौतिक-जगत् का भी कोई विषय इनसे अछूता नहीं है। अतः यदिहास्ति तदत्र कथन की सार्थकता पर पूर्ण आश्वस्त होकर, मैंने अपनी बृहत्सोधयोजना हेतु, “राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में वैदिकवाङ्मय का समीक्षात्मक अनुशीलन" को अपने शोध का शीर्षक बनाकर 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' को स्वीकृति हेतु नयी दिल्ली भेज दिया, जो वहाँ से सहर्ष स्वीकृत होकर आ गया। मेरी यह प्रबल-जिज्ञासा थी कि उल्लिखित राष्ट्रीयसमस्या के समाधान में वैदिक वाङ्मय ने अपना कितना योगदान प्रदान किया हैं। अभी तक अनेक दृष्टियों से संस्कृत-साहित्य का मूल्याङ्कन किया जा चुका था, किन्तु राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में संस्कृत-वैदिक साहित्य का अनुशीलन नहीं किया गया था। वैदिकवाङ्मय विश्वविश्रुत हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य सभी विद्वान् एक स्वर से इसका महत्त्व स्वीकार करते हैं। वेदों में ऐहिक एवं आमुष्मिक दोनों ही प्रकार का ज्ञान-विज्ञान पुष्कल मात्रा में विद्यमान है। प्राचीन भारतीयों का धर्म, दर्शन, आचार, रहन-सहन तथा परम्पराएँ आदि सब वैदिक-वाङ्मय में सुरक्षित हैं। अतः उक्त विषय की जानकारी के लिए वेदों का अध्ययन एवं अनुशीलन अत्यावश्यक था। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता किसी भी राष्ट्र का मूल आधार है। इसके बिना राष्ट्र का सर्वाङ्गीण विकास सम्भव ही नहीं है। वैदिकवाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के महत्त्वपूर्ण सूत्र विद्यमान हैं। राष्ट्रीय एकता के सन्दर्भ में वेदों का स्पष्ट निर्देश है कि हम सभी के लक्ष्य, कार्य व हृदय समान हों, हम सब मिलकर राष्ट्र के कल्याणकारी कार्यों में लगें— संगच्छध्वम्, संवदध्वम्, सं वो मनांसि जानताम्। देवाभागं यथापूर्वे, संजानाना उपासते॥ निस्सन्देह, परस्पर मिलकर राष्ट्रीय कार्यों को करते हुए ही लोककल्याण सम्भव है। पारस्परिक राग-द्वेष, इर्ष्या-कलह आदि से राष्ट्र विखण्डित होता है। अतः वेद हमें सावधान करता हुए कहता है कि हम भाई परस्पर द्वेष न करें, परस्पर मिलकर राष्ट्र के कार्यों में संलग्न होवें— मा भ्राता भ्रातरम् द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा, वाचं वदत भद्रया॥ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar