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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xiii ऋग्वेद में धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हुए 'पारस्परिक-प्रेम' को 'राष्ट्रीयएकता' का मूल माना गया है। यही 'मानवधर्म' है— यथा, विश्वदानी सुमनसः स्याम्। (ऋग्वेद ६/५२/५) अर्थात् "हम मर्यादा सम्पन्न रहें, प्रसन्न रहें क्योंकि मन के प्रसाद से समस्त आपदाएँ शान्त होती हैं।" ऋग्वेद में अन्यत्र कहा गया है— पुमान् पुमांसं परिपातु विश्वतः अर्थात् "मानव मानव की रक्षा करे, यही मानवधर्म का मूल मन्त्र है।" अर्थात् धर्म की रक्षा करने में अपनी रक्षा है, और धर्म के हनन में अपना ही विनाश है। धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः (मनुस्मृति ८/१५) वैदिकवाङ्मय में 'विश्वधर्म' से लेकर 'व्यक्तिधर्म' तक, समष्टि से व्यष्टि तक, सभी धर्मों का निरूपण सन्निहित है। उदाहरणार्थ, यजुर्वेद का निम्नलिखित मन्त्र राष्ट्रधर्म का साङ्गोपाङ्ग वर्णन करता है— आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् आ राष्ट्रे राजन्यः शूरइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्। दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रियोंषा जिष्णू रथेष्ठाः, सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्। निकाने निकाने नः पर्जन्यो वर्षतु। फलवत्यो नः ओषधयः पचन्ताम्। योगक्षेमो नः कल्पताम्॥ (यजुर्वेद २२/२२) भाव यह है कि विश्वभावन-ब्राह्मण ब्रह्मतेज से सम्पन्न हों। राष्ट्र में क्षत्रियगण शूरवीर, धनुर्धर, लक्ष्यवेधी और महारथी हों। गायें दुधारू, बैल भारवहन में सक्षम, अश्व शीघ्रगामी, स्त्रियाँ शोभामयी, रथी विजयशील हों, और इस यजमान का युवा पुत्र निर्भय व वीर हो। आवश्यकतानुसार वर्षा हो, वनस्पतियाँ फलवती हों। हमारा योगक्षेम हो। यजुर्वेद के उक्त मन्त्र की व्याख्या से राष्ट्रधर्म का स्वरूप निर्दिष्ट होता है। अथर्ववेद में भी राष्ट्रोन्नति के उपाय बताये गये हैं, जो उपर्युक्त यजुर्वेद के मन्त्र के ही अधिपूरक हैं। पृथिवीसूक्त का वचन है कि बृहत्-सत्य, उग्र ऋतु अर्थात् (सत्यकर्म व CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar