वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 336, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 308 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
प्रस्तुत कर दिया गया था। सिर्फ सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिवेश का ही वर्णन इसमें नहीं है अपितु राजनीति का भी विशद विवेचन किया गया है। राष्ट्र की सुरक्षा, नागरिकों के प्रति राजा के कर्त्तव्य, राजा का चयन, प्रजा का धर्म— सभी का सम्यक् विवेचन इन वैदिक ग्रन्थों में पाया जाता है। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का पर्याय हर युग में एक ही रहा है। राष्ट्र को सुदृढ़, सुरक्षित और सशक्त सैन्य शक्ति से युक्त बनाना ही एक समृद्धशाली राष्ट्र के लिए आवश्यक होता है। प्रजा के निजी प्रयासों से ही राष्ट्र एकता और अखण्डता के भाव से युक्त हो सकता है। वैदिकवाङ्गमय में निरूपित स्वराज्य की अवधारणा ही आज के समय में स्वअनुशासित, स्वशिक्षित एवं स्वनियंत्रित समाज की रचना का सन्देश देती है। वैदिक काल में मानव की विचारधारा, भावनाएँ और प्रवृत्तियाँ स्वभावतः सात्विक होती थीं। काल के चक्र के साथ सभी चीजों में हो रहे परिवर्तन से वह सभी चीजें भी परिवर्तित हो गई। राजनीति का अर्थ बदल गया लेकिन भाव वही है। राष्ट्र वही है, उसकी आवश्यकताएँ वही हैं। आदर्श राष्ट्र की परिकल्पना आज भी लोगों में शेष है और साकार देखने की इच्छा आज भी शेष है। वैदिक काल में प्रस्तुत स्वराज्य का अर्थ अपने ऊपर शासन या नियंत्रण करना था। वास्तविक स्वराज्य उसी स्थिति में संभव है जबकि मानव को सर्वप्रथम अपने शरीर, इन्द्रियों, मस्तिष्क एवं मन पर पूर्ण नियंत्रण हो। एक मानव के नियंत्रण से ही परिवार, मुहल्ला, गाँव, नगर, प्रदेश, राष्ट्र और विश्व सभी नियंत्रित हो सकते हैं। नाम् नामा॑ जोहवीति पुरा सूर्या॒त् पुरोषस॑ः। यदुजः प्रथ॒मं संब॒भूव॑ स हु तत् स्व॒राज्य॑मियाय॒ यस्मा॒न्नान्यत् पर॒मस्ति भूतम्॥१ इस मंत्र में राष्ट्र के संचालन के बारे में उत्तम ढंग से वर्णन किया गया है। वे राष्ट्रभक्त जो प्रातः काल ब्राह्ममुहूर्त में निद्रा त्याग कर उषाकाल में परमेश्वर की उपासना एवं विधिवत् यज्ञ करते हैं और किसी दिन विलम्ब होने पर भी सूर्योदय से पूर्व यह दैनिक कृत्य अवश्य ही निपटा देते है, वे ही स्वराज्य संचालन में सक्षम हो सकते हैं। इस प्रकार परमेश्वर एवं राष्ट्रभक्ति से प्रेरित होकर वे संगठित होते हैं। राष्ट्र की गम्भीर समस्याओं पर चिन्तन का विधान है। इन विषयों पर विचार करके स्वशासन के अनुरूप अनुगमन करने से आज के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर सुलझाया जा सकता है।
१. अथर्ववेद १०/७/३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar