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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri नवम अध्याय 309 राष्ट्रभक्त आदर्श नागरिक राष्ट्र से भी कुछ अपेक्षा कर सकते हैं और आशा करते हैं कि उन्हें अपने कार्य के लिए विस्तृत क्षेत्र प्राप्त होगा। स्वाधीन राष्ट्र में ही इस प्रकार की परिस्थितियाँ होती हैं कि प्रत्येक नागरिक जिस दिशा में चाहे उसे सम्यक् उन्नति करने का अवसर मिले। यदि अवसर प्राप्त हो तो साधारण प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति भी वैज्ञानिक, कवि, राजनीतिक, दार्शनिक और समाज के अनुकरणीय-चरित्र बन सकते हैं। यां रक्ष॑न्त्यस्व॒प्ना विश्व॑दानीं॑ देवा भूमिं॑ पृथि॒वीमप्र॑मादम्। सा नो॒ मधु॑ प्रि॒यं दु॑हामथो॑ उक्षतु वर्च॑सा॥१ अर्थात् निद्रा, तंद्रा, आलस्य एवं अज्ञान से रहित कुशल, वीर एवं संयमी व्यक्ति, दुर्गुणों को त्याग कर, कार्यकुशलता, वीरता एवं आत्मोन्नति करते हैं। समाज और राष्ट्र भी उनकी उन्नति में प्रयत्नशील रहता है और उनकी सतत उन्नति होती रहती है। वे ही राष्ट्र के सच्चे सेवक कहे जा सकते हैं और उन्हीं पर राष्ट्र का कल्याण निर्भर रहता है। ऐसी भावनाओं से युक्त व्यक्ति के प्रयासों से ही राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की भावना विकसित हो सकती है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के प्रसंग में राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बल विशेष रूप से प्राप्त होता है। यही वह शक्ति है जो सबको आपस में जोड़कर रखती है। अपने देश की परम्पराओं, रीति-रिवाजों एवं नैतिक मूल्यों का महत्त्वपूर्ण स्थान है— इला सरस्वती मही तिस्रो देवीमयो भुवः। बर्हिः सीदन्त्व स्निधः॥२ राष्ट्रभक्तों में समानता की भावना को आवश्यक बतलाते हुए इस तथ्य का निरूपण इस मंत्र द्वारा किया गया है कि प्रत्येक राष्ट्र की भाषा, संस्कृति एवं भूमि सुख-प्रदाता एवं श्रेयस्कर देवता है। इनकी उन्नति करने से ही राष्ट्र की वास्तविक उन्नति हो सकती है और सामूहिक सुख की प्राप्ति की जा सकती है। भाषा एवं संस्कृति राष्ट्र को एकता व अखण्डता प्रदान करने वाले देवता हैं। भाषा के द्वारा ही संस्कृति की रक्षा हो सकती है, यदि भाषा और संस्कृति संरक्षित रहें तो मातृभूमि या राष्ट्र पर कोई बाह्य शक्ति या शत्रु अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता। १. अथर्ववेद १२/१/७ २. अथर्ववेद १/१३/९ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar