वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 338, कुल 353 में से
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310 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता वैदिकवाङ्मय में प्रस्तुत संस्कृति एवं भाषा की सुरक्षा का महत्त्व उतना ही सत्य है जितना कि दिन व रात्रि। आज भी इनका स्थायित्व देश की एकता और अखण्डता के लिए सदैव दृढ़ आधार बना हुआ है। सा नो॒ भूमि॒रा दि॑शतु॒ यद्धनं॑ का॒मया॑महे। भगो॑ अनु॒प्रयु॑ङ्क्ता॒मिन्द्र॑ एतु पुरोग॒वः॥१ अर्थात् राष्ट्रभक्त परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमको जिस ऐश्वर्य अथवा धन की आवश्यकता हों, मातृभूमि वह सब हमको प्रदान करे। स्वतंत्र राष्ट्र का यह सबसे महत्त्वपूर्ण गुण होता है कि यहाँ के स्रोतों से सभी की आजीविका सरलतापूर्वक चलती रहे। राजकीय व्यवस्थाओं से सभी आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयास होना चाहिये। इसके अभाव में विघटनकारी तत्त्व देश के असंतुष्ट नागरिकों को बहकाकर राष्ट्र के विरुद्ध प्रयोग कर सकते हैं। ऐसे शत्रुओं का नाश होना चाहिए। आज की आतंकवादी ताकतों की ओर यह मंत्र इंगित कर रहा है। जब हम देशवासियों को भर पेट भोजन नहीं दे सकेंगे, तो विघटनकारी आतंकवादी शक्तियाँ उनका गलत प्रयोग करने लगती हैं। अत इन परिस्थितियों से निपटने का हमेशा प्रयास करना चाहिए। हमारे देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए वाङ्मय से प्राप्त प्रेरणाएँ और दिशाएँ एक नया सन्देश देती है कि उनसे प्राप्त शिक्षाओं को ही आज भी जीवन में उतार लिया जाय तो कुछ प्राप्त किया सकता है। यह सब प्राचीन वैदिक वाङ्मय की देन है जो हमें आज के परिप्रेक्ष्य में एक शक्ति प्रदान कर सकता है। इससे प्रेरणा लेकर ही यह अखण्ड भारत आज ही नहीं अपितु आगे भी सदियों तक एकता के सूत्र में आबद्ध रहेगा। १. अथर्ववेद १२/१/४०
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar