वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 33 एकता की भावना के कारण जब प्रत्येक व्यक्ति परोपकार, दया, नैतिकता समानता और मानवता की भावना को हृदय में रखकर मूल आदर्शों के पथ पर अग्रसर होता है, तब उसे अपना भविष्य भी प्रकाशमान दिखाई देने लगता है क्योंकि उसके द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य सत्य की ओर ले जाता है। जिससे उसे असीम सुख की प्राप्ति होती है। उसमें धैर्य, संतोष तथा विश्वास की भावना जाग्रत होती है, जिससे उसमें राष्ट्र के प्रति कार्य करने का अर्थात् एकता तथा अखण्डता को बनाये रखने का उत्साह बना रहता है तथा राष्ट्र के प्रति प्राण तक न्यौछावर करने में वह संकोच नहीं करता। राष्ट्र हित के समक्ष वह अपने भूत, भविष्य और वर्तमान की तनिक भी चिन्ता नहीं करता। राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता के महत्त्व से परिचित हो जाने के पश्चात् क्षेत्रीयता, प्रान्तीयता, साम्प्रदायिकता, जातिवाद तथा भाषावाद की समस्या स्वतः ही समाप्त हो जाती है। अर्थात् हम इस क्षेत्र के है, इस प्रान्त के, इस सम्प्रदाय के, जाति के तथा इस भाषावाद के हैं, हमारी सभ्यता अन्य क्षेत्रों, प्रान्तों, सम्प्रदायों, जातियों तथा भाषावादियों से भिन्न है, इसलिए हम दूसरे क्षेत्रों, प्रान्तों, सम्प्रदायों, जातियों, भाषावादियों से भिन्न हैं, इनसे हमारा कोई सम्बन्ध ही नहीं है, यह विवाद स्वतः ही समाप्त हो जायेगा। तत्त्वचिन्तन एवं सत्य के उद्घाटन की दिशा में योगदान :- राष्ट्रीयएकता व अखण्डता से रहित देशवासी जीवन, प्रकृति और सत्य का तत्त्वचिन्तन कर पाने मे सर्वथा असफल रहते हैं। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के अभाव में सम्पूर्ण राष्ट्र का वातावरण भय, उपद्रव, आतंक और असुरक्षा एवं स्वार्थ की भावना से ओत-प्रोत होता है। ऐसे वातावरण में राष्ट्र का कोई भी नागरिक जीवन से सम्बन्धित असत्य आवश्यकताओं एवम् वस्तुओं के विषय में ही चिन्तन करता है और जीवन के सत्य के उद्घाटन की ओर अपना ध्यान ही नहीं कर पाता है और वह सत्य के स्वरूप से अपरिचित ही रह जाता है। तत्त्वचिन्तन और सत्य के उद्घाटन के लिए मनुष्य को शान्त और सद्भावनापूर्ण वातावरण की आवश्यकता होती है जिसमें रहते हुए वह अपनी चिन्तन-प्रक्रिया को सही दिशा में जारी रख सके। द्वेष-पूर्ण परस्पर कलह से परिपूर्ण वातावरण में मानव मन कुंठित हो जाता है और ऐसी दशा में सत्य की अति सूक्ष्म अवधारणा का चिन्तन कर पाना दुष्कर ही नहीं असम्भव सा प्रतीत होता है। द्वेषपूर्ण और परस्पर संघर्ष, कलह, जातिवाद, आतंकवाद आदि के कारण दूषित वातावरण की स्थिति उसी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar