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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 34 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्र में उत्पन्न होती है जहाँ राष्ट्रीय एकता का अभाव और राष्ट्र की अखण्डता पर कुठाराघात होता है। अतः हम कह सकते हैं कि तत्त्वचिन्तन और सत्य के उद्घाटन में राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता का अपना महत्त्वपूर्ण योगदान है। विषय की प्रासंगिकता राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का विषय पुरातन काल से आज तक सदैव प्रासंगिक विषय रहा है। आज के सन्दर्भ में भी राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का विषय अत्यधिक प्रासंगिक है। आज भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अधिकतम राष्ट्र इसका अत्यधिक अभाव अनुभव कर रहे हैं। आज भौतिकवादी प्रवृत्ति ने मनुष्य को बहुत ही स्वार्थी बना दिया है जिससे नैतिकता, सदाचार एवं मानव मूल्यों का अत्यधिक ह्रास हुआ है। जिसके कारण मनुष्य अपने शारीरिक सुख- सुविधा के लिए धन जुटाने में लगा रहता है और लौकिक सुखों को प्राप्त करने हेतु वह किसी भी अविवेकपूर्ण कार्य करने में तनिक भी संकोच नहीं करता, चाहे उसमें उसका अपना व्यक्तिगत, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय अहित ही क्यों न हो रहा हो। स्वार्थ-भावना की प्रबलता के कारण ही असहिष्णुता एवं अहंभाव को बढ़ावा मिलता है। इस भावना के कारण ही मनुष्य में मनुष्य से, अन्य प्रान्तों से, अन्य सम्प्रदायों तथा राष्ट्रों के प्रति घृणा की भावना जन्म लेती है और वह सबसे घृणा करने लगता है, जिससे समस्त मानव-जाति का अकल्याण होता है। मानवता का विस्तृत स्वरूप स्वार्थ-भावना की प्रबलता के कारण सिमट कर संकीर्ण हो जाता है। जब मानव-मानव का शत्रु हो जाता है, तब एक उन्नत, समृद्ध तथा शक्तिशाली राष्ट्र निर्बल तथा असहाय हो जाता है। जब राष्ट्र निर्बल तथा असहाय हो जाता है तब लोग अपनी मनमानी करने लगते हैं। धनिक तथा शक्तिशाली वर्ग निर्धन तथा कमजोर वर्ग पर शोषण करने लगता है। "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाली कहावत चरितार्थ होने लगती है। जिससे मानवों में पाश्विकवृत्ति का प्रादुर्भाव होता है। मानवता की नैतिकता का ह्रास होने लगता है। विश्व शांति भंग होती है और यही पशुता मानव कल्याण की भावना की विध्वंसक बन जाती है, जिसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर नहीं वरन् अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पड़ता है। आज बारूद के ढेर पर बैठा हुआ यह विश्व अपनी ही प्राण रक्षा के लिए मृत्यु के दर्पण में विवश होकर ताक रहा है और इसे कहीं कोई ऐसा मार्ग ही नहीं सूझ रहा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar