वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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प्रथम अध्याय 35
है जिसमें शान्ति और स्थायी सुख-समृद्धि हो। आज विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में ऐसे ऐसे भयानक शस्त्र थमा दिये हैं जिससे वह किसी छोटे-मोटे देश को ही नहीं वरन् सम्पूर्ण पृथ्वी को पल भर में नष्ट कर सकता है। ऐसी स्थिति में आज मनुष्य बहुत अहंकारी हो गया है और वह बल का गलत उपयोग करने में बहुत ही निर्लज्ज होता जा रहा है, जिसके कारण विश्व के अधिकतम राष्ट्रों में आतंकवाद, हत्याएँ, लूट, डकैती, बलात्कार, तस्करी, चोर-बाज़ारी, मूल्यविहीन राजनीति तथा साम्राज्यवाद का बाज़ार गर्म है। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के विषय की प्रासंगिकता को लेकर हम अपने भारत की वर्तमान स्थिति पर एक दृष्टि डाले तो हमें अनुभव होगा कि आज भारत में राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता की कितनी आवश्यकता है? भारत आज जातिवाद, आतंकवाद एवम् साम्प्रदायिकता की आग में इस तरह झुलस रहा है कि उसके लिए राष्ट्रीय एकता के जल की बूँदें खोज पाना अत्यधिक कठिन प्रतीत हो रहा है। आज भारत में किसी भी समय साम्प्रदायिक दंगे हो जाना सामान्य बात हो गयी है क्योंकि राष्ट्र, धर्म से बढ़कर है इस भावना का नागरिकों में लोप सा होता जा रहा है। इसी कारण वह स्वयं को हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि पहले समझता है और भारतीय बाद में। जबकि प्राचीन काल से ही व्यक्तिगत धर्म, जाति और संस्कारों से बढ़कर अपने राष्ट्र को महत्त्व दिया जाता रहा है। परन्तु आज भारत में इसके विपरीत घटित हो रहा है। उदाहरण के लिए जैसे— एक हिन्दू और मुसलमान में व्यापारिक सम्बन्ध हैं, और धर्म के लेन-देन को लेकर परस्पर झगड़ा हो जाता है और इन दोनों में से एक को चोट आ जाती है, तभी अवसरवादी तत्त्व इस प्रकरण को इस तरह तूल देते हैं कि यह साम्प्रदायिक दंगें का रूप धारण कर लेती है। जिससे दोनों सम्प्रदायों के लोगों के प्राण जाते हैं, आर्थिक हानि होती है। इस सबके पीछे जातिगत भावनाएँ प्रमुख होती है और राष्ट्रीय भावना नगण्य। ऐसे झगड़ों में लड़ने वाले लोग मात्र यह सोचते हैं कि उनके सम्प्रदाय के व्यक्ति को हानि पहुँची है, अतः वह विरोधी सम्प्रदाय के व्यक्तियों को हानि पहुँचाकर उसका प्रतिशोध अवश्य लेगें। कोई भी व्यक्ति इस बात पर तनिक भी विचार नहीं करता कि उनके इस कृत्य से राष्ट्र को कितनी क्षति होगी। कितने निर्दोष लोगों के समक्ष रोजगार, चिकित्सा, खाद्य-सामग्री, शिक्षा, आवागमन एवम् सुरक्षा की समस्या खड़ी हो जायेगी। इस प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण दंगों के निवारण का एक-मात्र साधन राष्ट्रीय एकता की अनुरक्षा ही है जिसके अभाव में भारत राष्ट्र ने अपने अतीत में बहुत ही भयावह स्थितियों का सामना किया है। इतिहास साक्षी है कि भारतीयों की आपसी फूट के
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