भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 353 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अभिमत डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा संस्कृत वाङ्मय जगत् का गौरव हैं। उन्होंने वैदिक एवं लौकिक संस्कृत वाङ्मय का विशेष अध्ययन कर महत्त्वपूर्ण शोधकार्य किये हैं। उनका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ "वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता" प्रकाशित हो रहा है, यह अत्यधिक प्रसन्नता की बात है। मैं उसका हार्दिक स्वागत करता हूँ। वैदिक वाङ्मय अपनी अनेक मौलिक विशेषताओं के कारण विश्वविश्रुत है। वेदों का सर्वत्र समादर है। वेद आर्यों की सभ्यता, संस्कृति एवं साहित्य का आदि स्रोत है। यह भारत की अमूल्य निधि है। ज्ञान की तरह वेद भी अनन्त, अखण्ड एवं ब्रह्मरूप है। वैदिक वाङ्मय के पाश्चात्य प्रकाण्ड विद्वान् मनीषी विण्टरनिट्स का यह कथन पूर्णतया सत्य है- "यदि हम अपनी संस्कृति की आदिम अवस्था को जानना चाहते हैं या पुरातन भारतीय संस्कृति को समझना चाहते हैं, तो हमें भारत की शरण में जाना होगा, जहाँ भारतीय जाति का पुरातन साहित्य सुरक्षित है।" इस प्रकार हम देखते हैं कि वेद का महत्त्व-गान केवल भारतवर्ष तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु अनेक विदेशी विद्वान् भी वेदों में निहित ज्ञान-विज्ञान से अत्यधिक प्रभावित हुए। भारतीय एवं पाश्चात्य सभी विद्वानों के मत में वेद मानवजाति के प्राचीनतम साहित्य हैं। इसमें राष्ट्रीयएकता व अखण्डता तथा सकल विश्व के अभ्युदय एवं कल्याण का वह दिव्य आलोक सम्भृत है, जिसकी मानव जाति को आज भी आवश्यकता है और सदैव रहेगी। वेदों में अनेक स्थानों पर अपने राष्ट्र तथा मातृभूमि के प्रति श्रद्धा प्रकट की गई है। स्वराज्य रक्षा के लिए प्रार्थना की गयी है। वेदों में हमें सम्पूर्ण विश्व के लिए एक राष्ट्र की कल्पना मिलती है। राजा के लिए स्पष्ट निर्देश है कि उसे ईमानदार, जनप्रिय और प्रजापालक होना चाहिए। यथा निम्न मन्त्र में कहा गया है कि "राजा को पर्वत के समान स्थिर होकर राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए"- "इहैवैधि माप च्योष्ठाः पर्वत इवाचलिः। इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमुपधारय॥" डॉ० अन्नपूर्णा मिश्रा वैदिक वाङ्मय की अधीती विदुषी हैं। वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता व अखण्डता के विवेचन की दृष्टि से डॉ० मिश्रा का यह मौलिक बृहत्शोधग्रन्थ विशेष महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने संहिताओं, ब्राह्मण, आरण्यक और CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar