भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३४ )

विधायताने हिंसा-रहित और बिना उद्योगके मिलनेवाली हवाका भोजन साँपोंकी जीविका बनाई, पशुओंका घास खाना और जमीन पर सोना बताया ; किन्तु जो मनुष्य अपनी बुद्धिके बलसे भव-सागरके पार हो सकते हैं, उनकी जीविका ऐसी बनाई, कि जिसकी खोजमें उनके सारे गुणोंकी समाप्ति हो जाय, पर वह न मिले ॥ १० ॥

विधायता या रचयिताने साँपोंके लिये तो हवाका भोजन बता दिया है, जिसके हासिल करनेमें किसी प्रकारकी हिंसा भी नहीं करनी पड़ती और वह बिना किसी प्रकारकी चेष्टा या उद्योगके उन्हें अपने वासस्थानोंमें ही मिल सकता है। जानवरोंके लिये घास चरनेको और जमीन सोनेको बतादी, इससे उनको भी अपने खानेके लिये किसी प्रकारकी विशेष चेष्टा नहीं करनी पड़ती, वे जड़ूलमें उगी-उगाई घास तैयार पाते हैं और इच्छा करते ही पेट भर लेते हैं। उन्हें सोनेके लिये पल्लों और गह-तकियोंको फिक नहीं करनी पड़ती, ज़मोन पर ही जहाँ जी चाहता है पड़ रहते हैं। सर्प और पशुओंके साथ भगवान्ने पक्षपात किया, उन्हें बेफिकीकी ज़िन्दगी भोगनेके उपाय बता दिये, किन्तु मनुष्योंके साथ ऐसा नहीं किया ! उन बेचारोंको बुद्धि तो ऐसी दी, कि जिससे वे संसार-सागरसे पार हो सकें अथवा दुर्लभ मोक्षपदको प्राप्त कर सकें ; पर उन्हें जीविका ऐसी बताई, कि जिसको